Thursday, 21 June 2018, 9:35 AM

साहित्य

ऊँघता बैठा शहर

Updated on 17 May, 2018, 10:57
डॉ. हरीश निगम धूप ने ढाया कहर फूल घायल ताल सूखे हैं हवा के बोल रूखे, बो रहा मौसम ज़हर धूप ने ढाया कहर हर गली हर मोड़ धोखे बंद कर सारे झरोखे, ऊँघता बैठा शहर धूप ने ढाया कहर ... आगे पढ़े

बासी रोटी पर साैंधी चटनी जैसी मां

Updated on 17 May, 2018, 10:35
 क्षमा शर्मा मदर्स डे पर हम सब अपनी-अपनी मांओं को याद कर रहे होंगे। वे माएं जिन्होंने हमें जन्म तो दिया मगर हमने कभी उनके दुख और तकलीफों को समझने की ज्यादा कोशिश नहीं की। मां के बारे में सोचती हूं तो एक फिरकनी जैसा चित्र नजर आता है, जो सवेरे... आगे पढ़े

डॉ.हरीश निगम के नवगीत

Updated on 14 May, 2018, 0:52
दुख नदी-भर सुख अंजुरि-भर दुख नदी-भर जी रहे दिन-रात सीकर! ढही भीती उड़ी छानी मेह सूखे आँख पानी फड़फड़ाते मोर-तीतर! हैं हवा के होंठ दरके फटे रिश्ते गाँव-घर के एक मरुथल उगा भीतर! आक हो- आए करौंदे आस के टूटे घरौंदे घेरकर बैठे शनीचर!        ... आगे पढ़े

अर्थ खोजते हुए

Updated on 13 May, 2018, 12:24
सुधाकर आशावादी महानगर के प्रमुख चौराहे पर भारी भीड़ एकत्र थी। चौराहे के बीचोंबीच बने फौव्वारे के चबूतरे पर कुछ खद्दरधारी काले बैनर और झंडे लहरा रहे थे। अधिकांश के हाथों में जलती हुई मोमबत्तियां थी। भीड़ में आक्रोश था। धर्म विशेष की बालिका के साथ किसी अत्याचार को लेकर कानून... आगे पढ़े

सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना

Updated on 13 May, 2018, 12:18
अवतार ‘पाश’ मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती बैठे-बिठाए पकड़े जाना – बुरा तो है सहमी-सी चुप में जकड़े जाना – बुरा तो है पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना – बुरा तो... आगे पढ़े

मन की पीड़ा : उस दिन भी इतवार था

Updated on 13 May, 2018, 11:39
अरुण सब्बरवाल उस दिन भी इतवार था. अब न वह था न उस की मां, न उस के पिता न पंचम की मां और न ही पंचम के पिता. केवल थी तो पंचम. इतवार को कुछ भी बुरा नहीं कहूंगी, जो होना था सो हो गया. न जाने कितने इतवारों को... आगे पढ़े

धूप का एक टुकड़ा

Updated on 8 May, 2018, 12:49
कालजयी रचना / निर्मल वर्मा क्या मैं इस बेंच पर बैठ सकती हूं? नहीं, आप उठिए नहीं – मेरे लिए यह कोना ही काफी है। आप शायद हैरान होंगे कि मैं दूसरी बेंच पर क्यों नहीं जाती? इतना बड़ा पार्क – चारों तरफ खाली बेंचें – मैं आपके पास ही क्यों... आगे पढ़े

दाल नहीं गली

Updated on 6 May, 2018, 9:45
नेहा को तेज बुखार था|विभोर देर रात तक उसके माथे की पट्टियाँ बदलता रहा|तड़के नेहा की आँख लगी तो विभोर भी सो गया|      सुबह माँ ने विभोर से दूसरे कमरे में आराम करने को कहा और खुद नेहा के पास बैठ उसके माथे की पट्टियाँ बदलने लगी|तभी पड़ोसन हाथ में... आगे पढ़े

मेरे जीवन में चले आना

Updated on 6 May, 2018, 9:26
हेमा शर्मा,चंडीगढ़ दबे पांव तुम मेरे जीवन में चले आना देखो ये राज तुम किसी को ना बताना ला पाओ तो खुशियों की सौगात लाना सूनी रातों का तुम चांद बन कर आना मेरी मन्नत का तुम लाल धागा बन जाना आशा का दीप बन रात में तुम जल जाना हाथों की चूड़ी की तुम खनक बन... आगे पढ़े

सुनो एक कहानी (इक प्यारी सखी के लिये) पंचायती शॉपिंग

Updated on 4 May, 2018, 9:40
सुषमा व्यास बात उन दिनों की है, जब मैं कॉलेज में पढती थी। शुरू से ही अपने में खोये रहने की आदत रही है। हर बात से बेपरवाह, किसी से कोई खास मतलब नहीं, अपनी ही धुन में मस्त मैं बेपरवाह सी जीती रही हूं यानी मैं झल्ली हूं मेरी सहेली भी मेरी ही... आगे पढ़े

दिल का दीपक

Updated on 2 May, 2018, 13:41
रिशुप्रिया 1. गले लगा लो दो घड़ी के लिए सोने चाँदी की थाली जरूरी नहीं दिल का दीपक बहुत है आरती के लिए ऊब जाएं ज्यादा न हम कहीं खुशी से ग़म भी जरूरी है ज़िन्दगी के लिए तुम हवा को पकड़ना छोड़ दो वक्त रुकता नहीं किसी के लिए सब ग़लतफहमियाँ दूर हो जाएंगी अपनों से हंस मिल... आगे पढ़े

क्या यही प्यार है? : जेबा और राहिल के प्यार की कहानी

Updated on 2 May, 2018, 13:08
जेबा की बरात आने वाली थी. सभी पूरी तैयारी के साथ बरात के आने का इंतजार कर रहे थे कि तभी जेबा का आशिक राहिल कहीं से अचानक आंगन में आ गया. मंजर मुजफ्फरपुरी जेबा की बरात आने वाली थी. सभी पूरी तैयारी के साथ बरात के आने का इंतजार कर रहे... आगे पढ़े

मां का सुरक्षा घेरा

Updated on 29 April, 2018, 10:13
 कुल्लू के पास जनसुख गाँवआसपास प्रकृति का सौंदर्य बिखरा हुआ|जंगल असीम विस्तार लिये|       गाँव से जरा हट कर कच्ची ईटों का छोटा सा घर|छत पर टिन की चादर टिकी हूई|दीमा अपनी बेटी और बापू के साथ यही रहती है|कहाँ से आई,इसका कोई ठिकाना नहीं|माँग भर-भर तो सिदूंर  डाले है, पर... आगे पढ़े

मौसम बेघर होने लगे

Updated on 26 April, 2018, 10:07
मौसम बेघर होने लगे बंजारे लगते हैं मौसम मौसम बेघर होने लगे हैं जंगल, पेड, पहाड़, समंदर इंसां सब कुछ काट रहा है छील-छील के खाल ज़मीं की टुकड़ा-टुकड़ा बांट रहा है आसमान से उतरे मौसम सारे बंजर होने लगे हैं मौसम बेघर… दरयाओं पे बांध लगे हैं फोड़ते हैं सर चट्टानों से ‘बांदी’ लगती है ये ज़मीन डरती है अब इनसानों से बहती... आगे पढ़े

रमादेवी ने अपनी जिद को दी तिलांजलि

Updated on 25 April, 2018, 15:30
नरेंद्र कौर रमादेवी ने बहू सुलभा को बेफिक्र हो कर नौकरी करने का आदेश दे तो दिया लेकिन कुछ समय बाद उन्हें ही क्यों लगने लगा कि अब उन्हें अपनी जिद को तिलांजलि देनी होगी?  पूरा घर ही रमादेवी को अस्तव्यस्त महसूस हो रहा है. सोफे के कुशन बिखरे हुए, दीवान की... आगे पढ़े

छम्मकछल्लो

Updated on 24 April, 2018, 8:32

छम्मक छल्लो

Updated on 22 April, 2018, 13:18
छम्मक छल्लो ... आगे पढ़े

जब ये शाम, हँसती थी मुस्कुराती थी

Updated on 22 April, 2018, 13:10
 चौखट पर बैठी है इक शाम उदासी ओढ़े हुए इक अर्सा हुआ , इसे मुस्कुराए हुए चुपचाप शून्य में ताकती है, व्यस्त लोगों के भीतर झाँकती है। व्यस्तता का कारण जानना चाहती है, फुर्सत के कुछ पल माँगती है इक समय था जब ये शाम, हँसती थी मुस्कुराती थी। बच्चों के साथ बच्ची बन जाती थी, अपनों के साथ सुख-दुख बाँटती... आगे पढ़े