Thursday, 15 November 2018, 7:52 AM

साहित्य

मन विचलित

Updated on 30 July, 2018, 13:34
कभी कभी मन बड़ा विचलित होता हैं हरपल अच्छा सा नहीं लगता हैं  शरीर के संचालित मन मस्तिक मैं विचारों की गंगा का प्रवाह तेज़ हो जाता हैं इधर उधर हम भटकते से लगते हैं स्थिरता की नाव डगमगाती है कोशिशों की सीमा बिखर जाती है  कुछ ही पल मैं बहुत कुछ हो जाएगा  अरे इंसान ,ठहर जा... आगे पढ़े

सलाम

Updated on 27 July, 2018, 10:35
/ आशा जाकड़ उन सपूतों  को  सलाम जिन्होंने  झेली हैं अपने  सीने पर गोलियां मिट गई जिनकी  कहानियाँ रह गई  केवल अमर स्मृतियाँ । उन माताओं  को सलाम जिनकी  कोख धन्य  हो गई , पुत्र  बलिदान  कर ममता  धन्य  हो गई रह गए  आंसू   और  मुस्कान । उन बहिनों  को  सलाम, जिनकी राखी सिसकती रहेगी अपनों  की याद ताजा  करती रहेगी सूख... आगे पढ़े

गुरु का महत्व

Updated on 27 July, 2018, 10:34
/ शोभारानी तिवारी गीली मिट्टी के थे पुतले हरपल गुरु ने हमें संभाला हाथों से आकृति बनाई फिर सांचों में हमको ढाला सबसे ऊपर है उनका  पद वही मेरे भगवान इसीलिए तो सब करते हैं गुरुओं का सम्मान खुशबू के बिना फूल अधूरा हरियाली के बिना चमन जल के बिना अधूरी मछली गुरु के बिना अधूरा जीवन कल्पतरु के जैसे हैं वह हमें बनाया... आगे पढ़े

हाइकु, माहिया, तांका, दोहा, डायरी लेखन की विधाओं से हुआ परिचय

Updated on 27 July, 2018, 8:40
/ इंदौर लेखिका संघ के कार्यक्रम में सदस्य ही गुरु और सदस्य ही शिष्याएं इंदौर। इंदौर लेखिका संघ की मासिक गोष्ठी इस बार सबसे अलग लेकिन बेहद सकारात्मक रूप में संपन्न हुई। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर संस्था की ही सदस्य गुरु के तौर पर थीं और बाकी सदस्य उनकी शिष्याएं... आगे पढ़े

शादी से पहले तलाक

Updated on 22 July, 2018, 11:52
/ के. एल दीवान मैं ऑटो रिक्शा स्टैंड पर खड़ा था। आगरा बस स्टैंड जाना था मुझे। इन्तज़ार था कुछ और सवारियों का। तभी वहां एक युवक और युवती आते हैं। युवती ऑटो वाले से कहती है, आगरा बस स्टैंड फुल ऑटो। तभी युवक कहता है,’ देखो शिमला चलेंगे, मंदिर में... आगे पढ़े

मैंनू लै चले बाबुला लै चले वे

Updated on 22 July, 2018, 11:49
/ ख़दीजा मस्तूर पतली-सी नाली में पानी की धार रेंग रही थी और साबुन का फूला-फूला झाग पानी पर गिलाफ की तरह चढ़ा हुआ मालूम हो रहा था। वह अभी-अभी अंधेरे गुसलखाने से नहाकर निकला था और तौलिये से बाल खुश्क करता हुआ सहन में पड़ी आरामकुर्सी को धूप में घसीटकर... आगे पढ़े

शोखियों में घोलकर...मेघा छाए आधी रात

Updated on 20 July, 2018, 14:52
 नमन / सीमा शिवहरे" सुमन " मेघा छाये आधी रात और कारवाँ गुजर गया ..... दिल की कलम से लिखने वाला  वो महाकवि अब किधर गया। शोखियों में घोलकर फूलों का शबाब  आखिर वो लौट ही गये  देखो ना सावन की तरह। ए भाई जरा देख के चलो..... एक दिन सबको चले जाना  गोपाल दास" नीरज" की तरह। आंसुओं को सम्मानित... आगे पढ़े

बरसाती हाइकु

Updated on 17 July, 2018, 9:32
/आशा  जाकड़ बरसात  में रिमझिम फुहार लाए बहार मेघा गरजे भयंकर  बरसे सर्वत्र  पानी बारिश  हुई सूरज छिप गया अंधेराहुआ पानी  बरसा नव जीवन आया जग हरषा भरेगी नाली चले कागज-नाव बजेगी  ताली वर्षा होने से धरती  खिल उठी मन हरषे बरखा  आई खुशियाँ  संग लाई जीवन दायी बदरा घिरे झमाझम  पानी में छाते निकले बारिश हुई पेड़-पौधे जी उठे नदियाँ  बहे घटाएँ  घिरी बदरा बरसते मन खिलते इन्द्रधनुष मन को  दे सुकून मिटे कलुष आसमान  में बिजली   चमकती और कड़कती वर्षा को देख बच्चे  हो रहे खुश होगा ... आगे पढ़े

सलाम

Updated on 17 July, 2018, 9:28
/ वन्दना पुणतांबेकर बारह साल का छोटू अपनी माँ का इकलौता बेटा था।हमेशा से गरीबी ,भुखमरी औऱ ज़िल्लत की जिंदगी जी रहा था। झुग्गी- झोपड़ी में उनका जीवन बीत रहा था।जब से आँख खोली कभी पिता को नहीं देखा ।जब भी माँ से पूछता ,तो उनके नाम पर माँ दो,चार गालियां सुना... आगे पढ़े

वक़्त के पहले क्यों चले जाते हैं लोग

Updated on 15 July, 2018, 17:54
यह कैसा सिलसिला है ज़िंदगी का  वक़्त के पहले क्यों चले जाते हैं लोग  दिल मैं बसे रिश्ते तोड़ जाते हैं लोग  मिलते महकते तो है, हम अपना बनकर  फिर चल रहे रास्ते से क्यों अलग हो जाते है  महफ़िलो मैं अब वो नज़र नहीं आएँगे  जो लिख गए अपनी किताब ज़िंदगी की  जो सजाया करते थे... आगे पढ़े

संस्कार

Updated on 14 July, 2018, 15:01
मीना गोदरे “अवनि”  उस दिन स्कूल में रिजल्ट की घोषणा हुई बेटी हर बार की तरह फिर स्कूल में प्रथम आई , हम सब बहुत खुश थे कल मार्कशीट लेने जाने लगी तो मैंने कहा-- 'मार्कशीट लेकर तुम अपनी टीचर के चरण स्पर्श कर लेना '               'माम्मा वहां कोई पैर नहीं... आगे पढ़े

पवित्र प्रेम

Updated on 14 July, 2018, 14:52
/ मीनू मांणक अंजु और शेखर एक ही मौहल्ले में रहते थे ।एक दिन अंजु की माँ ने शेखर से कहा--बेटा हमारी अंजु को गणित समझा दोगे ?परीक्षा आने वाली है गणित थोड़ा कमजोर है अंजु का।        शेखर ने हाँ कर दी। अगले दिन से शेखर अंजु को पढ़ाने लगा।अंजु... आगे पढ़े

"उड़ जायेगा हंस"

Updated on 14 July, 2018, 14:34
/प्रियंका “अद्वैता” नैनों के पीछे छिपे हुए हैं राज़ कई हम उलझे हैं दुनियादारी के मसलों में आज कहीं मैं अकसर ही खुद को पाता हूँ बँटा हुआ लगता जैसे एक हिस्सा मेरे जिस्म का है और दूजा  मेरी भूति का इक हिस्सा दुनियावी है और दूजा है  दूर गगन बसता स्वछंद है जो जो बंधा नहीं है सवालों में......... जो विचर रहा आकाश की गूढ़ बयारों में..... जो मुक्त रूप जो पहने ना बेड़ी कोई जो... आगे पढ़े

दो पहलू

Updated on 14 July, 2018, 14:30
दो पहलू    /अंजू निगम  1) बेटा बीमार है उसकी हालत नाजुक  है|बाप डाक्टर के पैरों पर गिर जाता है|अपने इकलौते बेटे को बचा लेने की भीख माँगता है।डॉक्टर इलाज का खर्च ३ लाख बताते हैं।"डॉक्टर साब,आप इलाज शुरु करें,मैं दो दिन में कहीं से भी पैसों का इंतजाम करता हूँ|"    सब तरफ... आगे पढ़े

एकता के संग

Updated on 11 July, 2018, 20:11
 /  मनु जोशी      एक साँस एक आस विश्वास सबके एक हो ।  कठिन कर्म नींव बने आवाज सबकी एक हो । ताकत पुरुषार्थ बूढ़े जीत मगर एक हो । हम सब एक हों । एकता के रंग मेंरंगे विश्वमति एक हो । गीता कुरान एक, फागुन की फाग एक गुरुग्रंथ गान एक , बाइबिल और जीसस के, त्यागों के गान... आगे पढ़े

*अंत तुम बने सदा आरम्भ*

Updated on 10 July, 2018, 9:39
/प्रतिमा अखिलेश टूटी आस लुटा विश्वास किन्तु रुका नहीं ये विकास                अंत तुम बने सदा आरंभ।   निशा के अन्तिम तम के कण, बने ऊषा की प्रथम किरण                हुआ जीवन का प्रत्यारंभ।                अंत तुम बने सदा आरंभ।   अतल... आगे पढ़े

माँ की सीख

Updated on 10 July, 2018, 9:19
मंजू गुप्ता, नवी मुंबई   डोली में विदा होते हुए आधुनिकता में रंगी  बेटी माँ से गले मिलकर यूँ बोली -  " माँ  ! इन कीमती आंसुओं को छलका कर  दुखी न हो .मैं तो 21 वीं सदी में पली - बढ़ी हुई हूँ . तेरे ही संस्कारों का प्रतिरूप  हूँ . " माँ ... आगे पढ़े

कह दो हवाओं से

Updated on 8 July, 2018, 10:08
देवेंद्र बंसल हवाओं से कह दो की वो धक्का देकर बात ना किया करे जो सच्चे  दिल के हैं उन्हें गहरी ठेस पहुँचती हैं ये झूठ फ़रेब की दुनिया मुझे रास नहीं आती ये मन  के आँचल को मटमैला किए देती हैं ख़ूब दिया है इंसानों को धरती के सागर ने कब तक तू इसे पाकर मुस्करता रहेगा है इंसान तू अकेला ही... आगे पढ़े

पुलिस अधिकारियों ! वेतन लेने से पहले स्वयं से करो प्रश्न

Updated on 6 July, 2018, 15:06
महू के पुलिस अधिकारियों ! वेतन लेने से पहले स्वयं से करो प्रश्न क्यों नहीं पकड़ आ रहे चोर, लुटरे? कैसे हाथ से छूट गया ईश्वर भील? डॉक्टर दंपत्ति के घर किसने की चोरी? आर्मी दंपत्ति को मारने वाले हमलावर  अब तक क्यों नहीं धराये? बच्चे नशे के शिकार क्यों हो रहे कोचिंग की लड़कियों के साथ  बगीचों... आगे पढ़े

“बुआ”

Updated on 6 July, 2018, 10:13
/ रीता माणके तेलंग   मेरे माँ और पिताजी  शासकीय सेवक थे | हम   तीन बहनें थीं |एक मुझसे  बड़ी “ताई” और दूसरी मुझसे  छोटी ‘बेटू’, मैं मंझली थी | संयुक्त परिवार होते हुए भी सबकी रसोई अलग अलग थी | साल भर की हुई तो दादी चल बसी और रह... आगे पढ़े

मासूमों की क्या खता…

Updated on 4 July, 2018, 8:50
//कुसुम सोगानी दिल रो रहा है जार जार क्यों होता ऐसा बार बार हर शब्द लिखने पे वमन हो रही हे विष के घूँट पी रहे हैं सांसे उगल रहीं हैं छोटी सी मासूम को ना पता कुछ भी शरीर का स्वयं कपड़े  पहनना ठीक से आता नहीं बिना माता छाती से लग ठीक से... आगे पढ़े

हे माँ .. तू बड़ी निराली

Updated on 4 July, 2018, 8:42
/ सरिता  काला क्यों  मैं  इस  धरती  पर  जन्मी क्यों  इतना  दर्द  सहा इस  पापी  दुनिया  में  क्यों  लायी सरकार  से  क्यों  डरी मेरी  हत्या  क्यों  नही  की हे मां, मुझे  क्यों  जन्म  दिया अब हर बेटी  की  रक्षा करना इन दरिंदों से  बचाना मां  वादा  कर हर  बेटी  को  न्याय  दिलाना ... आगे पढ़े

ऐसे बनी बात

Updated on 3 July, 2018, 2:54
संगीता काला विद्यालय में छुट्टी हो चुकी थी और सभी विद्यार्थी अपने-अपने घरों को जा चुके थे। कक्षाएं खाली थीं परन्तु स्टाफ रूम में सभी अध्यापक बैठे प्राचार्य के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे थे क्योंकि आज एक विशेष गोष्ठी होनी थी जिसके लिए अध्यापक वर्ग को छुट्टी के बाद रूकने... आगे पढ़े

हम आदि हो गए हैं….

Updated on 3 July, 2018, 2:29
मीना गोदरे ‘अवनि’ कहीं ऐसा तो नहीं ऩिरंतर घटती  घटनाओं की तरह हम भी आदि हो गए हैं  सुनने-देखने के, तभी तो अनदेखा  कर देते हैं  जानकर सुनकर, पर आम नहीं विशेष कहे जाते हैं हम, समाज का प्रतिबिंब  दर्शाने वाले , संवेदनाओं, संस्कारों  के पोषक  शोषण अन्याय पर कलम  चलाने वाले और परिवर्तन के पुरोधा, क्या कलम की धार तलवार की धार से  मोटी हो गई है या  संवेदना... आगे पढ़े

"आहत है मन "

Updated on 30 June, 2018, 9:02
मंजुला भूतड़ा   काँप उठती है  भीतर तक रूह  थम जाती है कलम  आहत है मन ।   अखबार के मुखपृष्ठ की प्रथम पंक्ति  शर्मसार करती खबर  मासूम से दुष्कर्म  मानवता तार- तार    क्यों इतना उछ्छृंखल उद्दण्ड  हो गया  मन,  ताक पर रख दिए  सारे संस्कार मापदंड ।     अधर्मी  इन्सान     लूट रहा अस्मत  तोड़ डाली सभी वर्जनाएं  यह कैसी प्रगति है?    बलात्कार पर फांसी की सजा  सुकून तो... आगे पढ़े

मां धरती पिता आकाश

Updated on 28 June, 2018, 12:21
// शोभारानी तिवारी मां जलती लौ पिता प्रकाश है बच्चों के क़दमों का विश्वास है खुशनसीब हैं वे पिता जिनके पास है परिवार रूपी नाव की पतवार है पिता से उपवन में बहार है दुनिया में पिता से व्यवहार है पिता अनुशासन है व संस्कार है  परिवार का संरक्षक पत्नी का स्वाभिमान है मंगलसूत्र की शान बच्चों की पहचान... आगे पढ़े

नदी और माँ ..

Updated on 28 June, 2018, 11:56
प्रियंका बाजपेयी  ‘अद्वैता’  मुनिया आज पूरे अठ्ठारह वर्ष की हो गई... पिछले सत्रह बरस पंख लगाऐ न जाने कहाँ उड़ गये । गत वर्षों में, यही तो एक जगह थी जहाँ  मुनिया बिना चूके , प्रतिदिन आया करती थी, घंटा दो घंटा इसी किनारे पर बैठ मन का सुख दुख अपनी... आगे पढ़े

मैं भी इंसान हूँ

Updated on 23 June, 2018, 0:52
 डॉ. संध्या जैन मैं भी इंसान हूँ   जीना चाहती हूँ लेकिन लोग सीना तानकर खड़े हैं।   मैं भी इंसान हूँ कर्म करना चाहती हूँ     पर शर्मसार हो जाती हूँ जब लोग कर्म नहीं करने देते।               मैं भी इंसान हूँ धर्ममय हो जाना चाहती हूँ पर अधर्म के नाम पर                दुकान चलाने वालों से भयभीत हो जाती हूँ।... आगे पढ़े

गौरैया मन

Updated on 19 June, 2018, 0:30
प्रतिमा अखिलेश   बाबा के अंगना में छूटा बचपन का गौरैया मन।   नैहर की यादों में डूबा अब तक औंटे में बैठा, रहा चूमता देहरी ,आंसू चुगता रहा चिरैया मन।   माँ की हरी चूड़ियां गिनता, थपकी पा अलसाया सा। झूल रहा लोरी के झूले, बौर बना अमरैया मन।   तुलसी में टेसू महकाता, पीली सरसों से मतवाला। स्मृतियों की धुन पर नाचे, मेरा छन्न पकैया... आगे पढ़े

कीमती पल

Updated on 19 June, 2018, 0:07
अंजू निगम  दस दिन की लंबी  अवधि बिता मैं वापस चलने को हुई|लंबी इसलिए की मेरी भरी-पूरी गृहस्थी है और उससे ज्यादा दिन विलग मेरा कही मन नहीं लगता|   जब चलने को हुई तो मौसी ने कस कर मेरा हाथ पकड़ लिया,"बिन्नी,जल्दी आना!!जाने अगली बार मिलूं,न मिलुं|"चलते समय कही ऐसी बातें... आगे पढ़े