Friday, 17 August 2018, 8:47 AM

साहित्य

हे माँ .. तू बड़ी निराली

Updated on 4 July, 2018, 8:42
/ सरिता  काला क्यों  मैं  इस  धरती  पर  जन्मी क्यों  इतना  दर्द  सहा इस  पापी  दुनिया  में  क्यों  लायी सरकार  से  क्यों  डरी मेरी  हत्या  क्यों  नही  की हे मां, मुझे  क्यों  जन्म  दिया अब हर बेटी  की  रक्षा करना इन दरिंदों से  बचाना मां  वादा  कर हर  बेटी  को  न्याय  दिलाना ... आगे पढ़े

ऐसे बनी बात

Updated on 3 July, 2018, 2:54
संगीता काला विद्यालय में छुट्टी हो चुकी थी और सभी विद्यार्थी अपने-अपने घरों को जा चुके थे। कक्षाएं खाली थीं परन्तु स्टाफ रूम में सभी अध्यापक बैठे प्राचार्य के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे थे क्योंकि आज एक विशेष गोष्ठी होनी थी जिसके लिए अध्यापक वर्ग को छुट्टी के बाद रूकने... आगे पढ़े

हम आदि हो गए हैं….

Updated on 3 July, 2018, 2:29
मीना गोदरे ‘अवनि’ कहीं ऐसा तो नहीं ऩिरंतर घटती  घटनाओं की तरह हम भी आदि हो गए हैं  सुनने-देखने के, तभी तो अनदेखा  कर देते हैं  जानकर सुनकर, पर आम नहीं विशेष कहे जाते हैं हम, समाज का प्रतिबिंब  दर्शाने वाले , संवेदनाओं, संस्कारों  के पोषक  शोषण अन्याय पर कलम  चलाने वाले और परिवर्तन के पुरोधा, क्या कलम की धार तलवार की धार से  मोटी हो गई है या  संवेदना... आगे पढ़े

"आहत है मन "

Updated on 30 June, 2018, 9:02
मंजुला भूतड़ा   काँप उठती है  भीतर तक रूह  थम जाती है कलम  आहत है मन ।   अखबार के मुखपृष्ठ की प्रथम पंक्ति  शर्मसार करती खबर  मासूम से दुष्कर्म  मानवता तार- तार    क्यों इतना उछ्छृंखल उद्दण्ड  हो गया  मन,  ताक पर रख दिए  सारे संस्कार मापदंड ।     अधर्मी  इन्सान     लूट रहा अस्मत  तोड़ डाली सभी वर्जनाएं  यह कैसी प्रगति है?    बलात्कार पर फांसी की सजा  सुकून तो... आगे पढ़े

मां धरती पिता आकाश

Updated on 28 June, 2018, 12:21
// शोभारानी तिवारी मां जलती लौ पिता प्रकाश है बच्चों के क़दमों का विश्वास है खुशनसीब हैं वे पिता जिनके पास है परिवार रूपी नाव की पतवार है पिता से उपवन में बहार है दुनिया में पिता से व्यवहार है पिता अनुशासन है व संस्कार है  परिवार का संरक्षक पत्नी का स्वाभिमान है मंगलसूत्र की शान बच्चों की पहचान... आगे पढ़े

नदी और माँ ..

Updated on 28 June, 2018, 11:56
प्रियंका बाजपेयी  ‘अद्वैता’  मुनिया आज पूरे अठ्ठारह वर्ष की हो गई... पिछले सत्रह बरस पंख लगाऐ न जाने कहाँ उड़ गये । गत वर्षों में, यही तो एक जगह थी जहाँ  मुनिया बिना चूके , प्रतिदिन आया करती थी, घंटा दो घंटा इसी किनारे पर बैठ मन का सुख दुख अपनी... आगे पढ़े

मैं भी इंसान हूँ

Updated on 23 June, 2018, 0:52
 डॉ. संध्या जैन मैं भी इंसान हूँ   जीना चाहती हूँ लेकिन लोग सीना तानकर खड़े हैं।   मैं भी इंसान हूँ कर्म करना चाहती हूँ     पर शर्मसार हो जाती हूँ जब लोग कर्म नहीं करने देते।               मैं भी इंसान हूँ धर्ममय हो जाना चाहती हूँ पर अधर्म के नाम पर                दुकान चलाने वालों से भयभीत हो जाती हूँ।... आगे पढ़े

गौरैया मन

Updated on 19 June, 2018, 0:30
प्रतिमा अखिलेश   बाबा के अंगना में छूटा बचपन का गौरैया मन।   नैहर की यादों में डूबा अब तक औंटे में बैठा, रहा चूमता देहरी ,आंसू चुगता रहा चिरैया मन।   माँ की हरी चूड़ियां गिनता, थपकी पा अलसाया सा। झूल रहा लोरी के झूले, बौर बना अमरैया मन।   तुलसी में टेसू महकाता, पीली सरसों से मतवाला। स्मृतियों की धुन पर नाचे, मेरा छन्न पकैया... आगे पढ़े

कीमती पल

Updated on 19 June, 2018, 0:07
अंजू निगम  दस दिन की लंबी  अवधि बिता मैं वापस चलने को हुई|लंबी इसलिए की मेरी भरी-पूरी गृहस्थी है और उससे ज्यादा दिन विलग मेरा कही मन नहीं लगता|   जब चलने को हुई तो मौसी ने कस कर मेरा हाथ पकड़ लिया,"बिन्नी,जल्दी आना!!जाने अगली बार मिलूं,न मिलुं|"चलते समय कही ऐसी बातें... आगे पढ़े

मेरे सारे सपने आप से

Updated on 18 June, 2018, 6:14
ऋतु मिश्र पापा मेरे सारे दिन मेरे सारे सपने आप से  आप ही से हैं मेरे शब्द मेरे मौन आपसे आप से ही तो है मेरा वजूद मेरा गरूर आप से आप से ही तो है मेरी जिद मेरी जीत आप से आपने ही तो दिए हर कदम मेरी मंजिल आप से आप से ही है मेरा बड़प्पन और मेरा बचपन आप से ... आगे पढ़े

मेरे पापा

Updated on 17 June, 2018, 0:20
फादर्स डे पर विशेष / सुधा चौहान मैं उस समय कालेज में पढ़ रहा था। अक्सर दोस्तों के साथ बैठ कर गपशप करने में घर पर आने में देर हो जाती थी। कभी कभी सिनेमा भी चले जाया करते थे पर यह सब चुपचाप तरीके से होता था। मेरे पापा बहुत... आगे पढ़े

पसीने की बूंद

Updated on 15 June, 2018, 12:18
वन्दना पुणतांबेकर जेठ का महीना तपती धूप मे मधु स्कूल से लौटकर पैदल घर जा रही थी।आज उसकी बस नहीं आई थी।उसे अपने घर के रास्ता एक किलोमीटर पैदल चलकर तय करना था। वह एक टीचर थी। रास्ते से गुजरते वक्त उसने देखा कि एक मकान बन रहा था।इतनी गर्मी में... आगे पढ़े

हाइकू

Updated on 15 June, 2018, 12:00
डॉ. अंजुल कंसल "कनुप्रिया" सूरज तपा रोम रोम पसीना गरम हवा धूप तपन बरसती अगन करुं जतन चिरैय्या उड़ी देखती सूनी प्याली हां नीर नहीं नदी पोखर प्यास बुझती नहीं रीति सूखी सी भीषण गर्मी खेत और खलिहान किसान दुखी वर्षा फुहार धरती झूम उठी बुझाए प्यास कैरी का पना तरावट दे रहा आम रसीला ... आगे पढ़े

ज़िंदगी

Updated on 13 June, 2018, 9:00
..देवेन्द्र बंसल ज़िंदगी भी क्या है कभी रोती हैं कभी हँसती है यूँ ही मस्त चलती रहती है रास्तों की कठिनाइयों को निभाती चलती है वक़्त बेवक्त अचानक  रुक जाती है आँखें दिखती हैं पारिवारिक उल्लास में ख़लल कर डालती हैं आनंद के ख़ुशबूदार फलों को पल मैं बिखरा जाती हैं टूटे अनमने मन से मैं गिरता पड़ता उठता हूँ फिर उखड़ती साँसों के सहारे बिखरी... आगे पढ़े

पर्यावरण सपने में

Updated on 11 June, 2018, 16:29
    कुसुम सोगानी    नहीं जगाओ सुबह सबेरे, सो लेने दो जी लूँ सपने में कोयल कूके पक्षी कलरव सुन लूँ पौ अब है फटने में मलय पवन नारंगी अंबर सविता के हँसने से तनमन हर्षित हरित धरा के सजने और सँवरने से पीले पीले सूर्य तपन को रोका उन्नत वृक्षों ने हरी भरी शाख़ पत्ती व लहराती बेलाओं ने कल कल करती सरिता बहते... आगे पढ़े

डर

Updated on 11 June, 2018, 16:15
    आशा जाकड़   हैलो रानू ," बच्चों की छुट्टियां कब हो रही हैं। तुम्हारे पापा तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं" ।    मम्मा बस 15 अप्रैल से छुट्टियां हो रही हैं । हम यहां से 15 को ही चलेंगे,आर्या  भी  आप सब को बहुत याद करती है । अभी तो वह खेलने गई... आगे पढ़े

नानी का दुलारा

Updated on 8 June, 2018, 8:40
/ प्रमोद त्रिवेदी ‘पुष्प’ बहुत समय पहले की बात है। कीर्तिपुर नामक गांव में लामचे नाम का एक लड़का अपने गरीब माता-पिता के साथ रहा करता था। वे जंगल से लकड़ियां काटकर, उन्हें बाजार में बेचकर बड़ी मुश्किल से अपना गुजारा कर रहे थे। एक दिन लामचे अपने मां-बाप के साथ... आगे पढ़े

देश अब बदला बदला सा लग रहा है

Updated on 8 June, 2018, 0:20
देवेंद्र बंसल देश अब बदला बदला सा लग रहा है जातिवाद मैं बँटा बँटा सा लग रहा हैं ज़ख़्मों पर मरहम नहीं मिर्ची डाली जा रही हैं आरोप प्रत्यारोप से खाईं पैदा की जा रही हैं सच और झूठ की परिभाषा ख़त्म हो रही हैं इंसान की इंसानियत की हत्या हो रही है मेरी माटी की खिलखिलाहट... आगे पढ़े

नास्तिक

Updated on 7 June, 2018, 9:42
        " सुखी । चल जल्दी से नहा धोकर तैयार हो जा।आज ग्यारस है, आज तो चला चल मंदिर।"    मां की रोज रोज की ऐसी बात सुनकर सुखी हंसा, पर बोला कुछ नहीं।      मां बड़बड़ाते हुए मंदिर जाने की तैयारी करने लगी।" कितना ही बोलूं इसे,... आगे पढ़े

इस बार कुछ यूं लिखा मैंने...

Updated on 7 June, 2018, 9:36
कि आसमां तक शब्द ही शब्द बिखर गए कि जैसे एक मात्रा बोई हो और पेड़ पर हज़ारों मात्राओं की लड़ियाँ उग आई हों... कि जैसे एक झील में एक कंकर नही किसी कवि का मन फेंका हो और कविताओं की धारा बह चली हो। कि जब भी तुम्हें याद किया हज़ारों गुलाब... आगे पढ़े

इंसान हमसे प्रेम करो

Updated on 5 June, 2018, 6:52
जितेंद्र शिवहरे  नदी, वन , झरने, पहाड़ है पुकारते इंसान हमसे प्रेम करो वनराज सिंह है दहाड़ते, इंसान हमसे प्रेम करो वृक्ष की लताओं में पुष्प प्रस्फुटित हो रहे अंकुरित बीज से फल फलित हो रहे साख पे समृद्ध पुष्प है निहारते इंसान हमसे प्रेम करो शाखाओं पर पक्षी सभी घोसलें संवारते मजबूत तने की बाह में चूजें बचपन... आगे पढ़े

पर्यावरण पर दोहे

Updated on 5 June, 2018, 6:42
रश्मि सक्सेना जंगल को मत काटिए , ये प्रभु की सौग़ात । होता है जलवायु पर , इससे भी आघात ।। पॉलीथिन उपयोग को , कर दो फौरन बंद । धरती की होने लगीं , देखो साँसें मंद ।। ताल-तलैया जल बिना , पंक्षी खोते जान । किस विकास की है भला , बोलो ये पहचान... आगे पढ़े

मां , मेरे जीवन की मधुमास हो

Updated on 4 June, 2018, 5:44
शोभारानी तिवारी मां तुम धरती हो आकाश हो मेरे जीवन की मधुमास हो जिंदा हूं क्योंकि दिल धड़कता है मेरे हर धड़कन की श्वास हो। गीली मिट्टी को आकार दे जो चाहे गढ़ लेती हो बिना पढ़ी पर मन के भावों को पढ़ लेती हो सूत्रधार बन रिश्तों मेंमिठास भर पतझर खुद सहकर बहार देती हो युगों  युगों से सृष्टि का... आगे पढ़े

मेहंदी रचाई

Updated on 3 June, 2018, 19:36
मैंने तेरे नाम की मेहंदी रचाई है  इसमें आशिकी तेरे प्यार की  समाई है  सुखाने के बहाने बैठी हूँ  तन्हाई में तेरी याद  गले लगाने को फिर आई है ढूंढ ले सजना! सूर्ख रंग में नाम  अपना  कसमें , वादे , प्यार , वफ़ा के  संग लाई है  दिल के आशियाने में अंकित हो गए... आगे पढ़े

एक थी गौरा

Updated on 2 June, 2018, 9:07
अमरकांत लंबे कद और डबलंग चेहरे वाले चाचा रामशरण के लाख विरोध के बावजूद आशू का विवाह वहीं हुआ। उन्होंने तो बहुत पहले ही ऐलान कर दिया था कि ‘लड़की बड़ी बेहया है।’ आशू एक व्यवहार-कुशल आदर्शवादी नौजवान है, जिस पर मार्क्स और गांधी दोनों का गहरा प्रभाव है। वह स्वभाव से... आगे पढ़े

रोहिणी बहन का पीहर आगमन

Updated on 1 June, 2018, 9:29
सुषमा व्यास ‘राजनिधि’ गरमी भाभी ने अपनी पड़ोसन पसीना को कहा--- बहन तुमने देखा? हर साल की तरह ये रोहिणी बहन फिर से अपने नवतपा भाई के यहां नौ दिन रहने आयी है। पसीना पड़ोसन बोली--- हां गरमी बहन, ये रोहिणी जब भी आती है, हम तो परेशान हो जाते हैं।इतनी तेज है कि अपनी... आगे पढ़े

आंख

Updated on 30 May, 2018, 8:01
    मंजुला भूतड़ा  आंख का आना   आंख का चले जाना या उठना- बैठना सब बुरा है।   आंख का भीगना  आंख का सूख जाना या आंखे तरेरना सब बुरा है।   आंख का तिरछा होना आंख का स्थिर हो जाना या आंख मचलना सब बुरा है।   आंखों को तो सहेजना सम्हाल करना मरने के बाद भी जिन्दा रखना यही अच्छा है।   तुरंत आंख का दान प्रण लेना सबको जानकारी देना आंखों के रूप में... आगे पढ़े

मौन

Updated on 30 May, 2018, 0:05
प्रियंका बाजपेई "अद्वैता"   मौन……….. कैसे परिभाषित करेंगें आप मौन को…… नवजात शिशु की आँखों से पढ़ लेती मन की आवाज़ माँ…. मौन है….   पहली बार स्कूल जाता बच्चा सहमा सहमा सा नैन सजल पलट पलट के माँ पिता को देखता….. मौन है……   कभी ज़ोर से पड़ी डाँट पर मुँह छुपाता नैनों में मासूमियत भरे रो लेने के बाद सूजे सूजे चेहरे लिये सोता हुआ मासूम…. मौन है…..   विदा होती बेटी सामने... आगे पढ़े

रिश्ते

Updated on 27 May, 2018, 13:49
केवल तिवारी ‘आपकी मम्मा मुझे बहुत डांटती थीं।’ ‘अच्छा फिर आप किससे शिकायत करती थीं।’ ‘किसी से नहीं, मैं इतना चिल्लाती थी कि उन्हें खुद ही बड़ों की डांट पड़ जाती।’ हा, हा, हा (सब खिलखिलाकर हंस पड़े)। ‘एक बार तो मैंने दीदी यानी आपकी मम्मा की एक किताब छिपा दी। वह रोने लगीं।... आगे पढ़े

मान भी जाओ गोरय्या

Updated on 27 May, 2018, 13:31
 सुषमा दुबे लौट भी आओ चिरय्या कि मुनिया जिद पे अड़ी हैं लौट भी आओ कि टहनियाँ बांह फैलाये खड़ी है मान भी जाओ कि दादू रोज किस्से तुम्हारे ही सुनाते हैं नाना अब भी तुम्हारी कहानियों से ही दिल बहलाते हैं रख मुंडेर पर रोज दाने , चाची इंतजार कर... आगे पढ़े