Wednesday, 21 November 2018, 4:08 PM

साहित्य

मेरे सारे सपने आप से

Updated on 18 June, 2018, 6:14
ऋतु मिश्र पापा मेरे सारे दिन मेरे सारे सपने आप से  आप ही से हैं मेरे शब्द मेरे मौन आपसे आप से ही तो है मेरा वजूद मेरा गरूर आप से आप से ही तो है मेरी जिद मेरी जीत आप से आपने ही तो दिए हर कदम मेरी मंजिल आप से आप से ही है मेरा बड़प्पन और मेरा बचपन आप से ... आगे पढ़े

मेरे पापा

Updated on 17 June, 2018, 0:20
फादर्स डे पर विशेष / सुधा चौहान मैं उस समय कालेज में पढ़ रहा था। अक्सर दोस्तों के साथ बैठ कर गपशप करने में घर पर आने में देर हो जाती थी। कभी कभी सिनेमा भी चले जाया करते थे पर यह सब चुपचाप तरीके से होता था। मेरे पापा बहुत... आगे पढ़े

पसीने की बूंद

Updated on 15 June, 2018, 12:18
वन्दना पुणतांबेकर जेठ का महीना तपती धूप मे मधु स्कूल से लौटकर पैदल घर जा रही थी।आज उसकी बस नहीं आई थी।उसे अपने घर के रास्ता एक किलोमीटर पैदल चलकर तय करना था। वह एक टीचर थी। रास्ते से गुजरते वक्त उसने देखा कि एक मकान बन रहा था।इतनी गर्मी में... आगे पढ़े

हाइकू

Updated on 15 June, 2018, 12:00
डॉ. अंजुल कंसल "कनुप्रिया" सूरज तपा रोम रोम पसीना गरम हवा धूप तपन बरसती अगन करुं जतन चिरैय्या उड़ी देखती सूनी प्याली हां नीर नहीं नदी पोखर प्यास बुझती नहीं रीति सूखी सी भीषण गर्मी खेत और खलिहान किसान दुखी वर्षा फुहार धरती झूम उठी बुझाए प्यास कैरी का पना तरावट दे रहा आम रसीला ... आगे पढ़े

ज़िंदगी

Updated on 13 June, 2018, 9:00
..देवेन्द्र बंसल ज़िंदगी भी क्या है कभी रोती हैं कभी हँसती है यूँ ही मस्त चलती रहती है रास्तों की कठिनाइयों को निभाती चलती है वक़्त बेवक्त अचानक  रुक जाती है आँखें दिखती हैं पारिवारिक उल्लास में ख़लल कर डालती हैं आनंद के ख़ुशबूदार फलों को पल मैं बिखरा जाती हैं टूटे अनमने मन से मैं गिरता पड़ता उठता हूँ फिर उखड़ती साँसों के सहारे बिखरी... आगे पढ़े

पर्यावरण सपने में

Updated on 11 June, 2018, 16:29
    कुसुम सोगानी    नहीं जगाओ सुबह सबेरे, सो लेने दो जी लूँ सपने में कोयल कूके पक्षी कलरव सुन लूँ पौ अब है फटने में मलय पवन नारंगी अंबर सविता के हँसने से तनमन हर्षित हरित धरा के सजने और सँवरने से पीले पीले सूर्य तपन को रोका उन्नत वृक्षों ने हरी भरी शाख़ पत्ती व लहराती बेलाओं ने कल कल करती सरिता बहते... आगे पढ़े

डर

Updated on 11 June, 2018, 16:15
    आशा जाकड़   हैलो रानू ," बच्चों की छुट्टियां कब हो रही हैं। तुम्हारे पापा तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं" ।    मम्मा बस 15 अप्रैल से छुट्टियां हो रही हैं । हम यहां से 15 को ही चलेंगे,आर्या  भी  आप सब को बहुत याद करती है । अभी तो वह खेलने गई... आगे पढ़े

नानी का दुलारा

Updated on 8 June, 2018, 8:40
/ प्रमोद त्रिवेदी ‘पुष्प’ बहुत समय पहले की बात है। कीर्तिपुर नामक गांव में लामचे नाम का एक लड़का अपने गरीब माता-पिता के साथ रहा करता था। वे जंगल से लकड़ियां काटकर, उन्हें बाजार में बेचकर बड़ी मुश्किल से अपना गुजारा कर रहे थे। एक दिन लामचे अपने मां-बाप के साथ... आगे पढ़े

देश अब बदला बदला सा लग रहा है

Updated on 8 June, 2018, 0:20
देवेंद्र बंसल देश अब बदला बदला सा लग रहा है जातिवाद मैं बँटा बँटा सा लग रहा हैं ज़ख़्मों पर मरहम नहीं मिर्ची डाली जा रही हैं आरोप प्रत्यारोप से खाईं पैदा की जा रही हैं सच और झूठ की परिभाषा ख़त्म हो रही हैं इंसान की इंसानियत की हत्या हो रही है मेरी माटी की खिलखिलाहट... आगे पढ़े

नास्तिक

Updated on 7 June, 2018, 9:42
        " सुखी । चल जल्दी से नहा धोकर तैयार हो जा।आज ग्यारस है, आज तो चला चल मंदिर।"    मां की रोज रोज की ऐसी बात सुनकर सुखी हंसा, पर बोला कुछ नहीं।      मां बड़बड़ाते हुए मंदिर जाने की तैयारी करने लगी।" कितना ही बोलूं इसे,... आगे पढ़े

इस बार कुछ यूं लिखा मैंने...

Updated on 7 June, 2018, 9:36
कि आसमां तक शब्द ही शब्द बिखर गए कि जैसे एक मात्रा बोई हो और पेड़ पर हज़ारों मात्राओं की लड़ियाँ उग आई हों... कि जैसे एक झील में एक कंकर नही किसी कवि का मन फेंका हो और कविताओं की धारा बह चली हो। कि जब भी तुम्हें याद किया हज़ारों गुलाब... आगे पढ़े

इंसान हमसे प्रेम करो

Updated on 5 June, 2018, 6:52
जितेंद्र शिवहरे  नदी, वन , झरने, पहाड़ है पुकारते इंसान हमसे प्रेम करो वनराज सिंह है दहाड़ते, इंसान हमसे प्रेम करो वृक्ष की लताओं में पुष्प प्रस्फुटित हो रहे अंकुरित बीज से फल फलित हो रहे साख पे समृद्ध पुष्प है निहारते इंसान हमसे प्रेम करो शाखाओं पर पक्षी सभी घोसलें संवारते मजबूत तने की बाह में चूजें बचपन... आगे पढ़े

पर्यावरण पर दोहे

Updated on 5 June, 2018, 6:42
रश्मि सक्सेना जंगल को मत काटिए , ये प्रभु की सौग़ात । होता है जलवायु पर , इससे भी आघात ।। पॉलीथिन उपयोग को , कर दो फौरन बंद । धरती की होने लगीं , देखो साँसें मंद ।। ताल-तलैया जल बिना , पंक्षी खोते जान । किस विकास की है भला , बोलो ये पहचान... आगे पढ़े

मां , मेरे जीवन की मधुमास हो

Updated on 4 June, 2018, 5:44
शोभारानी तिवारी मां तुम धरती हो आकाश हो मेरे जीवन की मधुमास हो जिंदा हूं क्योंकि दिल धड़कता है मेरे हर धड़कन की श्वास हो। गीली मिट्टी को आकार दे जो चाहे गढ़ लेती हो बिना पढ़ी पर मन के भावों को पढ़ लेती हो सूत्रधार बन रिश्तों मेंमिठास भर पतझर खुद सहकर बहार देती हो युगों  युगों से सृष्टि का... आगे पढ़े

मेहंदी रचाई

Updated on 3 June, 2018, 19:36
मैंने तेरे नाम की मेहंदी रचाई है  इसमें आशिकी तेरे प्यार की  समाई है  सुखाने के बहाने बैठी हूँ  तन्हाई में तेरी याद  गले लगाने को फिर आई है ढूंढ ले सजना! सूर्ख रंग में नाम  अपना  कसमें , वादे , प्यार , वफ़ा के  संग लाई है  दिल के आशियाने में अंकित हो गए... आगे पढ़े

एक थी गौरा

Updated on 2 June, 2018, 9:07
अमरकांत लंबे कद और डबलंग चेहरे वाले चाचा रामशरण के लाख विरोध के बावजूद आशू का विवाह वहीं हुआ। उन्होंने तो बहुत पहले ही ऐलान कर दिया था कि ‘लड़की बड़ी बेहया है।’ आशू एक व्यवहार-कुशल आदर्शवादी नौजवान है, जिस पर मार्क्स और गांधी दोनों का गहरा प्रभाव है। वह स्वभाव से... आगे पढ़े

रोहिणी बहन का पीहर आगमन

Updated on 1 June, 2018, 9:29
सुषमा व्यास ‘राजनिधि’ गरमी भाभी ने अपनी पड़ोसन पसीना को कहा--- बहन तुमने देखा? हर साल की तरह ये रोहिणी बहन फिर से अपने नवतपा भाई के यहां नौ दिन रहने आयी है। पसीना पड़ोसन बोली--- हां गरमी बहन, ये रोहिणी जब भी आती है, हम तो परेशान हो जाते हैं।इतनी तेज है कि अपनी... आगे पढ़े

आंख

Updated on 30 May, 2018, 8:01
    मंजुला भूतड़ा  आंख का आना   आंख का चले जाना या उठना- बैठना सब बुरा है।   आंख का भीगना  आंख का सूख जाना या आंखे तरेरना सब बुरा है।   आंख का तिरछा होना आंख का स्थिर हो जाना या आंख मचलना सब बुरा है।   आंखों को तो सहेजना सम्हाल करना मरने के बाद भी जिन्दा रखना यही अच्छा है।   तुरंत आंख का दान प्रण लेना सबको जानकारी देना आंखों के रूप में... आगे पढ़े

मौन

Updated on 30 May, 2018, 0:05
प्रियंका बाजपेई "अद्वैता"   मौन……….. कैसे परिभाषित करेंगें आप मौन को…… नवजात शिशु की आँखों से पढ़ लेती मन की आवाज़ माँ…. मौन है….   पहली बार स्कूल जाता बच्चा सहमा सहमा सा नैन सजल पलट पलट के माँ पिता को देखता….. मौन है……   कभी ज़ोर से पड़ी डाँट पर मुँह छुपाता नैनों में मासूमियत भरे रो लेने के बाद सूजे सूजे चेहरे लिये सोता हुआ मासूम…. मौन है…..   विदा होती बेटी सामने... आगे पढ़े

रिश्ते

Updated on 27 May, 2018, 13:49
केवल तिवारी ‘आपकी मम्मा मुझे बहुत डांटती थीं।’ ‘अच्छा फिर आप किससे शिकायत करती थीं।’ ‘किसी से नहीं, मैं इतना चिल्लाती थी कि उन्हें खुद ही बड़ों की डांट पड़ जाती।’ हा, हा, हा (सब खिलखिलाकर हंस पड़े)। ‘एक बार तो मैंने दीदी यानी आपकी मम्मा की एक किताब छिपा दी। वह रोने लगीं।... आगे पढ़े

मान भी जाओ गोरय्या

Updated on 27 May, 2018, 13:31
 सुषमा दुबे लौट भी आओ चिरय्या कि मुनिया जिद पे अड़ी हैं लौट भी आओ कि टहनियाँ बांह फैलाये खड़ी है मान भी जाओ कि दादू रोज किस्से तुम्हारे ही सुनाते हैं नाना अब भी तुम्हारी कहानियों से ही दिल बहलाते हैं रख मुंडेर पर रोज दाने , चाची इंतजार कर... आगे पढ़े

अलका जैन की कविता

Updated on 22 May, 2018, 14:29
दान  चिल्लर दान करो हम नहीं कहते खजाने दान करो चिल्लर से मुफलिस की किस्मत चमक सकती है। शिक्षा का दान करो बालक का जीवन बदल सकता है पुराने कपड़े दान करो किसी सर्द रात गुजर सकती है आसानी से। जूठन दान करो पेट किसी का भर सकता है आंख दान करो जीवन में किसी के सूरज... आगे पढ़े

गोरैया जब मुझसे मिली

Updated on 22 May, 2018, 12:03
          वन्दना पुणतांबेकर             भीषण गर्मी की दोपहर घर  में कूलर की आवाज में कुछ सुनाई नही दे रहा था।तभी डोर बेल बजी।देखा तो कोरियर वाला था।  जैसे ही में दौड़कर अंदर आने के लिए पलटी तो सामने घर की मुंडेर पर एक गोरैया बैठी थी।उसके पैर जल रहे थे।जलन से वह उचक... आगे पढ़े

तीनों बंदर खो गए

Updated on 17 May, 2018, 11:05
  बृजेश नीरज आज़ादी के समय देश में हर तरफ दंगे फैले हुए थे। गांधी जी बहुत दुखी थे। उनके दुख के दो कारण थे - एक दंगे, दूसरा उनके तीनों बंदर खो गए थे। बहुत तलाश किया लेकिन वे तीन न जाने कहां गायब हो गए थे। एक दिन सुबह अपनी... आगे पढ़े

ऊँघता बैठा शहर

Updated on 17 May, 2018, 10:57
डॉ. हरीश निगम धूप ने ढाया कहर फूल घायल ताल सूखे हैं हवा के बोल रूखे, बो रहा मौसम ज़हर धूप ने ढाया कहर हर गली हर मोड़ धोखे बंद कर सारे झरोखे, ऊँघता बैठा शहर धूप ने ढाया कहर ... आगे पढ़े

बासी रोटी पर साैंधी चटनी जैसी मां

Updated on 17 May, 2018, 10:35
 क्षमा शर्मा मदर्स डे पर हम सब अपनी-अपनी मांओं को याद कर रहे होंगे। वे माएं जिन्होंने हमें जन्म तो दिया मगर हमने कभी उनके दुख और तकलीफों को समझने की ज्यादा कोशिश नहीं की। मां के बारे में सोचती हूं तो एक फिरकनी जैसा चित्र नजर आता है, जो सवेरे... आगे पढ़े

डॉ.हरीश निगम के नवगीत

Updated on 14 May, 2018, 0:52
दुख नदी-भर सुख अंजुरि-भर दुख नदी-भर जी रहे दिन-रात सीकर! ढही भीती उड़ी छानी मेह सूखे आँख पानी फड़फड़ाते मोर-तीतर! हैं हवा के होंठ दरके फटे रिश्ते गाँव-घर के एक मरुथल उगा भीतर! आक हो- आए करौंदे आस के टूटे घरौंदे घेरकर बैठे शनीचर!        ... आगे पढ़े

अर्थ खोजते हुए

Updated on 13 May, 2018, 12:24
सुधाकर आशावादी महानगर के प्रमुख चौराहे पर भारी भीड़ एकत्र थी। चौराहे के बीचोंबीच बने फौव्वारे के चबूतरे पर कुछ खद्दरधारी काले बैनर और झंडे लहरा रहे थे। अधिकांश के हाथों में जलती हुई मोमबत्तियां थी। भीड़ में आक्रोश था। धर्म विशेष की बालिका के साथ किसी अत्याचार को लेकर कानून... आगे पढ़े

सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना

Updated on 13 May, 2018, 12:18
अवतार ‘पाश’ मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती बैठे-बिठाए पकड़े जाना – बुरा तो है सहमी-सी चुप में जकड़े जाना – बुरा तो है पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना – बुरा तो... आगे पढ़े

मन की पीड़ा : उस दिन भी इतवार था

Updated on 13 May, 2018, 11:39
अरुण सब्बरवाल उस दिन भी इतवार था. अब न वह था न उस की मां, न उस के पिता न पंचम की मां और न ही पंचम के पिता. केवल थी तो पंचम. इतवार को कुछ भी बुरा नहीं कहूंगी, जो होना था सो हो गया. न जाने कितने इतवारों को... आगे पढ़े