Monday, 19 November 2018, 12:13 PM

साहित्य

धूप का एक टुकड़ा

Updated on 8 May, 2018, 12:49
कालजयी रचना / निर्मल वर्मा क्या मैं इस बेंच पर बैठ सकती हूं? नहीं, आप उठिए नहीं – मेरे लिए यह कोना ही काफी है। आप शायद हैरान होंगे कि मैं दूसरी बेंच पर क्यों नहीं जाती? इतना बड़ा पार्क – चारों तरफ खाली बेंचें – मैं आपके पास ही क्यों... आगे पढ़े

दाल नहीं गली

Updated on 6 May, 2018, 9:45
नेहा को तेज बुखार था|विभोर देर रात तक उसके माथे की पट्टियाँ बदलता रहा|तड़के नेहा की आँख लगी तो विभोर भी सो गया|      सुबह माँ ने विभोर से दूसरे कमरे में आराम करने को कहा और खुद नेहा के पास बैठ उसके माथे की पट्टियाँ बदलने लगी|तभी पड़ोसन हाथ में... आगे पढ़े

मेरे जीवन में चले आना

Updated on 6 May, 2018, 9:26
हेमा शर्मा,चंडीगढ़ दबे पांव तुम मेरे जीवन में चले आना देखो ये राज तुम किसी को ना बताना ला पाओ तो खुशियों की सौगात लाना सूनी रातों का तुम चांद बन कर आना मेरी मन्नत का तुम लाल धागा बन जाना आशा का दीप बन रात में तुम जल जाना हाथों की चूड़ी की तुम खनक बन... आगे पढ़े

सुनो एक कहानी (इक प्यारी सखी के लिये) पंचायती शॉपिंग

Updated on 4 May, 2018, 9:40
सुषमा व्यास बात उन दिनों की है, जब मैं कॉलेज में पढती थी। शुरू से ही अपने में खोये रहने की आदत रही है। हर बात से बेपरवाह, किसी से कोई खास मतलब नहीं, अपनी ही धुन में मस्त मैं बेपरवाह सी जीती रही हूं यानी मैं झल्ली हूं मेरी सहेली भी मेरी ही... आगे पढ़े

दिल का दीपक

Updated on 2 May, 2018, 13:41
रिशुप्रिया 1. गले लगा लो दो घड़ी के लिए सोने चाँदी की थाली जरूरी नहीं दिल का दीपक बहुत है आरती के लिए ऊब जाएं ज्यादा न हम कहीं खुशी से ग़म भी जरूरी है ज़िन्दगी के लिए तुम हवा को पकड़ना छोड़ दो वक्त रुकता नहीं किसी के लिए सब ग़लतफहमियाँ दूर हो जाएंगी अपनों से हंस मिल... आगे पढ़े

क्या यही प्यार है? : जेबा और राहिल के प्यार की कहानी

Updated on 2 May, 2018, 13:08
जेबा की बरात आने वाली थी. सभी पूरी तैयारी के साथ बरात के आने का इंतजार कर रहे थे कि तभी जेबा का आशिक राहिल कहीं से अचानक आंगन में आ गया. मंजर मुजफ्फरपुरी जेबा की बरात आने वाली थी. सभी पूरी तैयारी के साथ बरात के आने का इंतजार कर रहे... आगे पढ़े

मां का सुरक्षा घेरा

Updated on 29 April, 2018, 10:13
 कुल्लू के पास जनसुख गाँवआसपास प्रकृति का सौंदर्य बिखरा हुआ|जंगल असीम विस्तार लिये|       गाँव से जरा हट कर कच्ची ईटों का छोटा सा घर|छत पर टिन की चादर टिकी हूई|दीमा अपनी बेटी और बापू के साथ यही रहती है|कहाँ से आई,इसका कोई ठिकाना नहीं|माँग भर-भर तो सिदूंर  डाले है, पर... आगे पढ़े

मौसम बेघर होने लगे

Updated on 26 April, 2018, 10:07
मौसम बेघर होने लगे बंजारे लगते हैं मौसम मौसम बेघर होने लगे हैं जंगल, पेड, पहाड़, समंदर इंसां सब कुछ काट रहा है छील-छील के खाल ज़मीं की टुकड़ा-टुकड़ा बांट रहा है आसमान से उतरे मौसम सारे बंजर होने लगे हैं मौसम बेघर… दरयाओं पे बांध लगे हैं फोड़ते हैं सर चट्टानों से ‘बांदी’ लगती है ये ज़मीन डरती है अब इनसानों से बहती... आगे पढ़े

रमादेवी ने अपनी जिद को दी तिलांजलि

Updated on 25 April, 2018, 15:30
नरेंद्र कौर रमादेवी ने बहू सुलभा को बेफिक्र हो कर नौकरी करने का आदेश दे तो दिया लेकिन कुछ समय बाद उन्हें ही क्यों लगने लगा कि अब उन्हें अपनी जिद को तिलांजलि देनी होगी?  पूरा घर ही रमादेवी को अस्तव्यस्त महसूस हो रहा है. सोफे के कुशन बिखरे हुए, दीवान की... आगे पढ़े

जब ये शाम, हँसती थी मुस्कुराती थी

Updated on 22 April, 2018, 13:10
 चौखट पर बैठी है इक शाम उदासी ओढ़े हुए इक अर्सा हुआ , इसे मुस्कुराए हुए चुपचाप शून्य में ताकती है, व्यस्त लोगों के भीतर झाँकती है। व्यस्तता का कारण जानना चाहती है, फुर्सत के कुछ पल माँगती है इक समय था जब ये शाम, हँसती थी मुस्कुराती थी। बच्चों के साथ बच्ची बन जाती थी, अपनों के साथ सुख-दुख बाँटती... आगे पढ़े

बंजारे लगते हैं मौसम

Updated on 22 April, 2018, 12:58
मौसम बेघर होने लगे बंजारे लगते हैं मौसम मौसम बेघर होने लगे हैं जंगल, पेड, पहाड़, समंदर इंसां सब कुछ काट रहा है छील-छील के खाल ज़मीं की टुकड़ा-टुकड़ा बांट रहा है आसमान से उतरे मौसम सारे बंजर होने लगे हैं मौसम बेघर… दरयाओं पे बांध लगे हैं फोड़ते हैं सर चट्टानों से ‘बांदी’ लगती है ये ज़मीन डरती है अब इनसानों से बहती... आगे पढ़े

मुफ्त की कीमत ...

Updated on 22 April, 2018, 12:52
मां! बिग सेल लगी है… एक के साथ एक फ्री… चलो न! लेखा ने जिद की।’ ‘दुनिया में कोई भी चीज मुफ्त नहीं मिलती… और जो मुफ्त मिलती है, उसकी एक दिन बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।’ मां ने उसे टाल दिया था। आज बरसों बाद अपने आप को इस मुकाम पर... आगे पढ़े

वादियों का प्यार

Updated on 20 April, 2018, 11:51
- शारदा छाबड़ा नैशनल कैडेट कोर यानी एनसीसी की लड़कियों के साथ जब मैं  कालका से शिमला जाने के लिए टौय ट्रेन में सवार हुई तो मेरे मन में सहसा पिछली यादों की घटनाएं उमड़ने लगीं. 3 वर्षों पहले ही तो मैं साकेत के साथ शिमला आई थी. तब इस गाड़ी में बैठ... आगे पढ़े

फुरसत मिलते ही.....

Updated on 20 April, 2018, 11:22
 पुरानी किताब के मुड़े पन्ने   क्यों खोलने लगता है दिल   फुरसत मिलते ही   जो गुजर गया, वो गुजर गया   यादों के नश्तर   क्यों घोंपने लगता है दिल   फुरसत मिलते ही   चिडि़यों सा चहके, फूलों सा खिले   रोकने लगता है   क्यों नहीं देखता है दिल   फुरसत मिलते ही   जिस ने हाथ में हाथ दिया नहीं   आस उसी से लगा के   जाने क्यों बैठा है... आगे पढ़े

|पैसों की नहीं अपनों की कमी है

Updated on 18 April, 2018, 10:30
सो गयी क्या"?सरदारजी बोले|   "नहीं!!इस उम्र में नींद बैरन होगी|जल्द आती भी नहीं |"बीबी बोली|"आपको भी नींद नहीं आयी"     "कोशिश कर रहा हूँ|"     "आज ठंड लगता ज्यादा है|आपको भी लग रही"|   "नहीं तो!!!रोज जैसी है|कहो तो पंखा कम कर दूँ|"   आप लेटो|मैं कर देती हूँ कम|आपके भी तो घुटने चटकते हैं|"  ... आगे पढ़े

टूटे हुए पंखों की उड़ान : क्या अर्चना अपने सपने पूरे कर पाई

Updated on 15 April, 2018, 23:59
ममता रैना  गली में घुसते ही शोरगुल के बीच लड़ाईझगड़े और गालीगलौज की आवाजें अर्चना के कानों में पड़ीं. सड़ांध भरी नालियों के बीच एक संकरी गली से गुजर कर उस का घर आता था, जहां बरसात में मारे बदबू के चलना मुश्किल हो जाता था. दुपट्टे से नाक ढकते हुए अर्चना... आगे पढ़े

ज़हन को गहराई देतीं गुलज़ार की 10 बड़ी नज़्में...

Updated on 15 April, 2018, 22:26
   1. "उस से कहना..." इतना कहा... और फिर गर्दन नीची कर के देर तलक वो पैर के अँगूठे से मिट्टी खोद-खोदके बात का कोई बीज था, शायद, ढूंढ़ रही थी देर तलक खामोश रही... नाक से सिसकी पोंछ के आख़िर गर्दन को कन्धे पर डाल के बोली, "बस... इतना कह देना!"   2. लॉस्ट एंड फ़ाउंड... अचानक तुमको देखा आज... आगे पढ़े

दो लघु कथाएं

Updated on 15 April, 2018, 14:10
 मां ‘मां, हम दोनों ने फैसला कर लिया है कि हमारा बच्चा किसी और की कोख से पैदा होगा ।’ ‘क्या कह रही हो, पागल तो नहीं हो गई? तुम्हारा बच्चा किसी और की कोख से ?’ ‘मां, हम किराये की कोख का इंतज़ाम कर रहे हैं।’ ‘…पर लोग क्या कहेंगे?’ ‘लोगों को कह दूंगी,... आगे पढ़े

भिखारिन / रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी

Updated on 11 April, 2018, 14:06
अन्धी प्रतिदिन मन्दिर के दरवाजे पर जाकर खड़ी होती, दर्शन करने वाले बाहर निकलते तो वह अपना हाथ फैला देती और नम्रता से कहती- "बाबूजी, अन्धी पर दया हो जाए।" वह जानती थी कि मन्दिर में आने वाले सहृदय और श्रद्धालु हुआ करते हैं। उसका यह अनुमान असत्य न था। आने-जाने... आगे पढ़े

बीमार बच्चा

Updated on 10 April, 2018, 0:08
/ बेला जैन                                    छः महीने से मेरा बच्चा बहुत बीमार था। मैं और मेरी पत्नी सभी सरकारी अस्पतालों में बच्चे को लेकर इलाज के लिये घूम चुके थे। पर सभी सरकारी अस्पतालों के डाक्टरों ने मुझे कहा कि आप अपने बच्चे को किसी अच्छे प्रायवेट अस्पताल में दिखाईयें जहां इलाज... आगे पढ़े

// अमित पांडे

Updated on 9 April, 2018, 1:44
अपना देश...  अपने देश में सभी सम्पदायें अपरंपार हैं उर्जा तकनीक इंजीनियर डॉक्टर बहुत मददगार हैं लेकिन मत भुलाना उन गऱीब भाईयों को क्यों कि हर विकास में मजदूर बराबर के भागीदार हैं अपने देश में सभी सम्पदायें अपरंपार हैं एक खासियत और यहाँ के लोकतंत्र में हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई हकदार बने जनतंत्र में मूल सिद्धांत देकर... आगे पढ़े

ऊँचाई

Updated on 9 April, 2018, 1:26
           ..रामेश्वर काम्बोज "हिमांशु" पिताजी के अचानक आ धमकने से पत्नी तमतमा उठी, "लगता है बूढ़े को पैसों की ज़रूरत आ पड़ी है, वर्ना यहाँ कौन आने वाला था। अपने पेट का गड्‌ढा भरता नहीं, घर वालों का कुआँ कहाँ से भरोगे?" मैं नज़रें बचाकर दूसरी ओर देखने लगा। पिताजी नल पर... आगे पढ़े

सबसे सुन्दर लड़की / रचनाकार: विष्णु प्रभाकर

Updated on 7 April, 2018, 1:23
समुद्र के किनारे एक गाँव था । उसमें एक कलाकार रहता था । वह दिन भर समुद्र की लहरों से खेलता रहता, जाल डालता और सीपियाँ बटोरता ।  रंग-बिरंगी कौड़ियां, नाना रूप के सुन्दर-सुन्दर शंख चित्र-विचित्र पत्थर, न जाने क्या-क्या समुद्र जाल में भर देता ।  उनसे वह तरह-तरह के... आगे पढ़े

कथाओं से भरे इस देश में मैं भी एक कथा हूँ

Updated on 6 April, 2018, 13:57
  वो मिट्टी के दिन, वो घरौंदों की शाम, वो तन-मन में बिजली की कौंधों की शाम, मदरसों की छुट्टी, वो छंदों की शाम, वो घर भर में गोरस की गंधों की शाम वो दिन भर का पढ़ना, वो भूलों की शाम, वो वन-वन के बाँसों-बबूलों की शाम, झिड़कियाँ पिता की, वो डाँटों की शाम, वो बंसी, वो... आगे पढ़े

कथाओं से भरे इस देश में मैं भी एक कथा हूँ

Updated on 6 April, 2018, 13:54
http://कविता वो मिट्टी के दिन, वो घरौंदों की शाम, वो तन-मन में बिजली की कौंधों की शाम, मदरसों की छुट्टी, वो छंदों की शाम, वो घर भर में गोरस की गंधों की शाम वो दिन भर का पढ़ना, वो भूलों की शाम, वो वन-वन के बाँसों-बबूलों की शाम, झिड़कियाँ पिता की, वो डाँटों की शाम, वो बंसी, वो... आगे पढ़े

कथाओं से भरे इस देश में मैं भी एक कथा हूँ

Updated on 6 April, 2018, 13:50
वो मिट्टी के दिन, वो घरौंदों की शाम, वो तन-मन में बिजली की कौंधों की शाम, मदरसों की छुट्टी, वो छंदों की शाम, वो घर भर में गोरस की गंधों की शाम वो दिन भर का पढ़ना, वो भूलों की शाम, वो वन-वन के बाँसों-बबूलों की शाम, झिड़कियाँ पिता की, वो डाँटों की शाम, वो बंसी, वो... आगे पढ़े

ठण्डी रोटी

Updated on 5 April, 2018, 23:53
एक लड़का था. उसकी माँ ने उसका विवाह कर दिया. लेकिन लड़का कुछ नहीं कमाता था. माँ जब भी उसको रोटी परोसती थी, तब वह कहती कि बेटा, ठंडी रोटी खा  लो. लड़के की समझ में यह नहीं आया कि माँ ऐसा क्यों कहती है. फिर भी वह चुप रहा.... आगे पढ़े

मेरे जीवन का अनुभव

Updated on 5 April, 2018, 23:44
मरने की अभिलाषा लेकर जीवन की भीख में मागूं क्यों जव तोड़ दिये बंधन सारे तो निद्रा से क्यों न जागूं मैं बस एक व्यथा जीवन को निज पथ से भटकाती रहती है स्व: त्व: के बंधन में बंधकर तम को दर्शाती रहती हैं। (२) हास्य और करूणा का जन्म मंथन करके देख लिया प्रेम और रति के झरनों का अस्वादन करके... आगे पढ़े