Wednesday, 20 June 2018, 5:15 AM

कविताएं

गौरैया मन

Updated on 19 June, 2018, 0:30
प्रतिमा अखिलेश   बाबा के अंगना में छूटा बचपन का गौरैया मन।   नैहर की यादों में डूबा अब तक औंटे में बैठा, रहा चूमता देहरी ,आंसू चुगता रहा चिरैया मन।   माँ की हरी चूड़ियां गिनता, थपकी पा अलसाया सा। झूल रहा लोरी के झूले, बौर बना अमरैया मन।   तुलसी में टेसू महकाता, पीली सरसों से मतवाला। स्मृतियों की धुन पर नाचे, मेरा छन्न पकैया... आगे पढ़े

मेरे सारे सपने आप से

Updated on 18 June, 2018, 6:14
ऋतु मिश्र पापा मेरे सारे दिन मेरे सारे सपने आप से  आप ही से हैं मेरे शब्द मेरे मौन आपसे आप से ही तो है मेरा वजूद मेरा गरूर आप से आप से ही तो है मेरी जिद मेरी जीत आप से आपने ही तो दिए हर कदम मेरी मंजिल आप से आप से ही है मेरा बड़प्पन और मेरा बचपन आप से ... आगे पढ़े

हाइकू

Updated on 15 June, 2018, 12:00
डॉ. अंजुल कंसल "कनुप्रिया" सूरज तपा रोम रोम पसीना गरम हवा धूप तपन बरसती अगन करुं जतन चिरैय्या उड़ी देखती सूनी प्याली हां नीर नहीं नदी पोखर प्यास बुझती नहीं रीति सूखी सी भीषण गर्मी खेत और खलिहान किसान दुखी वर्षा फुहार धरती झूम उठी बुझाए प्यास कैरी का पना तरावट दे रहा आम रसीला ... आगे पढ़े

ज़िंदगी

Updated on 13 June, 2018, 9:00
..देवेन्द्र बंसल ज़िंदगी भी क्या है कभी रोती हैं कभी हँसती है यूँ ही मस्त चलती रहती है रास्तों की कठिनाइयों को निभाती चलती है वक़्त बेवक्त अचानक  रुक जाती है आँखें दिखती हैं पारिवारिक उल्लास में ख़लल कर डालती हैं आनंद के ख़ुशबूदार फलों को पल मैं बिखरा जाती हैं टूटे अनमने मन से मैं गिरता पड़ता उठता हूँ फिर उखड़ती साँसों के सहारे बिखरी... आगे पढ़े

पर्यावरण सपने में

Updated on 11 June, 2018, 16:29
    कुसुम सोगानी    नहीं जगाओ सुबह सबेरे, सो लेने दो जी लूँ सपने में कोयल कूके पक्षी कलरव सुन लूँ पौ अब है फटने में मलय पवन नारंगी अंबर सविता के हँसने से तनमन हर्षित हरित धरा के सजने और सँवरने से पीले पीले सूर्य तपन को रोका उन्नत वृक्षों ने हरी भरी शाख़ पत्ती व लहराती बेलाओं ने कल कल करती सरिता बहते... आगे पढ़े

देश अब बदला बदला सा लग रहा है

Updated on 8 June, 2018, 0:20
देवेंद्र बंसल देश अब बदला बदला सा लग रहा है जातिवाद मैं बँटा बँटा सा लग रहा हैं ज़ख़्मों पर मरहम नहीं मिर्ची डाली जा रही हैं आरोप प्रत्यारोप से खाईं पैदा की जा रही हैं सच और झूठ की परिभाषा ख़त्म हो रही हैं इंसान की इंसानियत की हत्या हो रही है मेरी माटी की खिलखिलाहट... आगे पढ़े

इस बार कुछ यूं लिखा मैंने...

Updated on 7 June, 2018, 9:36
कि आसमां तक शब्द ही शब्द बिखर गए कि जैसे एक मात्रा बोई हो और पेड़ पर हज़ारों मात्राओं की लड़ियाँ उग आई हों... कि जैसे एक झील में एक कंकर नही किसी कवि का मन फेंका हो और कविताओं की धारा बह चली हो। कि जब भी तुम्हें याद किया हज़ारों गुलाब... आगे पढ़े

इंसान हमसे प्रेम करो

Updated on 5 June, 2018, 6:52
जितेंद्र शिवहरे  नदी, वन , झरने, पहाड़ है पुकारते इंसान हमसे प्रेम करो वनराज सिंह है दहाड़ते, इंसान हमसे प्रेम करो वृक्ष की लताओं में पुष्प प्रस्फुटित हो रहे अंकुरित बीज से फल फलित हो रहे साख पे समृद्ध पुष्प है निहारते इंसान हमसे प्रेम करो शाखाओं पर पक्षी सभी घोसलें संवारते मजबूत तने की बाह में चूजें बचपन... आगे पढ़े

पर्यावरण पर दोहे

Updated on 5 June, 2018, 6:42
रश्मि सक्सेना जंगल को मत काटिए , ये प्रभु की सौग़ात । होता है जलवायु पर , इससे भी आघात ।। पॉलीथिन उपयोग को , कर दो फौरन बंद । धरती की होने लगीं , देखो साँसें मंद ।। ताल-तलैया जल बिना , पंक्षी खोते जान । किस विकास की है भला , बोलो ये पहचान... आगे पढ़े

मां , मेरे जीवन की मधुमास हो

Updated on 4 June, 2018, 5:44
शोभारानी तिवारी मां तुम धरती हो आकाश हो मेरे जीवन की मधुमास हो जिंदा हूं क्योंकि दिल धड़कता है मेरे हर धड़कन की श्वास हो। गीली मिट्टी को आकार दे जो चाहे गढ़ लेती हो बिना पढ़ी पर मन के भावों को पढ़ लेती हो सूत्रधार बन रिश्तों मेंमिठास भर पतझर खुद सहकर बहार देती हो युगों  युगों से सृष्टि का... आगे पढ़े

मेहंदी रचाई

Updated on 3 June, 2018, 19:36
मैंने तेरे नाम की मेहंदी रचाई है  इसमें आशिकी तेरे प्यार की  समाई है  सुखाने के बहाने बैठी हूँ  तन्हाई में तेरी याद  गले लगाने को फिर आई है ढूंढ ले सजना! सूर्ख रंग में नाम  अपना  कसमें , वादे , प्यार , वफ़ा के  संग लाई है  दिल के आशियाने में अंकित हो गए... आगे पढ़े

आंख

Updated on 30 May, 2018, 8:01
    मंजुला भूतड़ा  आंख का आना   आंख का चले जाना या उठना- बैठना सब बुरा है।   आंख का भीगना  आंख का सूख जाना या आंखे तरेरना सब बुरा है।   आंख का तिरछा होना आंख का स्थिर हो जाना या आंख मचलना सब बुरा है।   आंखों को तो सहेजना सम्हाल करना मरने के बाद भी जिन्दा रखना यही अच्छा है।   तुरंत आंख का दान प्रण लेना सबको जानकारी देना आंखों के रूप में... आगे पढ़े

मौन

Updated on 30 May, 2018, 0:05
प्रियंका बाजपेई "अद्वैता"   मौन……….. कैसे परिभाषित करेंगें आप मौन को…… नवजात शिशु की आँखों से पढ़ लेती मन की आवाज़ माँ…. मौन है….   पहली बार स्कूल जाता बच्चा सहमा सहमा सा नैन सजल पलट पलट के माँ पिता को देखता….. मौन है……   कभी ज़ोर से पड़ी डाँट पर मुँह छुपाता नैनों में मासूमियत भरे रो लेने के बाद सूजे सूजे चेहरे लिये सोता हुआ मासूम…. मौन है…..   विदा होती बेटी सामने... आगे पढ़े

मान भी जाओ गोरय्या

Updated on 27 May, 2018, 13:31
 सुषमा दुबे लौट भी आओ चिरय्या कि मुनिया जिद पे अड़ी हैं लौट भी आओ कि टहनियाँ बांह फैलाये खड़ी है मान भी जाओ कि दादू रोज किस्से तुम्हारे ही सुनाते हैं नाना अब भी तुम्हारी कहानियों से ही दिल बहलाते हैं रख मुंडेर पर रोज दाने , चाची इंतजार कर... आगे पढ़े

अलका जैन की कविता

Updated on 22 May, 2018, 14:29
दान  चिल्लर दान करो हम नहीं कहते खजाने दान करो चिल्लर से मुफलिस की किस्मत चमक सकती है। शिक्षा का दान करो बालक का जीवन बदल सकता है पुराने कपड़े दान करो किसी सर्द रात गुजर सकती है आसानी से। जूठन दान करो पेट किसी का भर सकता है आंख दान करो जीवन में किसी के सूरज... आगे पढ़े

ऊँघता बैठा शहर

Updated on 17 May, 2018, 10:57
डॉ. हरीश निगम धूप ने ढाया कहर फूल घायल ताल सूखे हैं हवा के बोल रूखे, बो रहा मौसम ज़हर धूप ने ढाया कहर हर गली हर मोड़ धोखे बंद कर सारे झरोखे, ऊँघता बैठा शहर धूप ने ढाया कहर ... आगे पढ़े

डॉ.हरीश निगम के नवगीत

Updated on 14 May, 2018, 0:52
दुख नदी-भर सुख अंजुरि-भर दुख नदी-भर जी रहे दिन-रात सीकर! ढही भीती उड़ी छानी मेह सूखे आँख पानी फड़फड़ाते मोर-तीतर! हैं हवा के होंठ दरके फटे रिश्ते गाँव-घर के एक मरुथल उगा भीतर! आक हो- आए करौंदे आस के टूटे घरौंदे घेरकर बैठे शनीचर!        ... आगे पढ़े

सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना

Updated on 13 May, 2018, 12:18
अवतार ‘पाश’ मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती बैठे-बिठाए पकड़े जाना – बुरा तो है सहमी-सी चुप में जकड़े जाना – बुरा तो है पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना – बुरा तो... आगे पढ़े

मेरे जीवन में चले आना

Updated on 6 May, 2018, 9:26
हेमा शर्मा,चंडीगढ़ दबे पांव तुम मेरे जीवन में चले आना देखो ये राज तुम किसी को ना बताना ला पाओ तो खुशियों की सौगात लाना सूनी रातों का तुम चांद बन कर आना मेरी मन्नत का तुम लाल धागा बन जाना आशा का दीप बन रात में तुम जल जाना हाथों की चूड़ी की तुम खनक बन... आगे पढ़े

दिल का दीपक

Updated on 2 May, 2018, 13:41
रिशुप्रिया 1. गले लगा लो दो घड़ी के लिए सोने चाँदी की थाली जरूरी नहीं दिल का दीपक बहुत है आरती के लिए ऊब जाएं ज्यादा न हम कहीं खुशी से ग़म भी जरूरी है ज़िन्दगी के लिए तुम हवा को पकड़ना छोड़ दो वक्त रुकता नहीं किसी के लिए सब ग़लतफहमियाँ दूर हो जाएंगी अपनों से हंस मिल... आगे पढ़े

मौसम बेघर होने लगे

Updated on 26 April, 2018, 10:07
मौसम बेघर होने लगे बंजारे लगते हैं मौसम मौसम बेघर होने लगे हैं जंगल, पेड, पहाड़, समंदर इंसां सब कुछ काट रहा है छील-छील के खाल ज़मीं की टुकड़ा-टुकड़ा बांट रहा है आसमान से उतरे मौसम सारे बंजर होने लगे हैं मौसम बेघर… दरयाओं पे बांध लगे हैं फोड़ते हैं सर चट्टानों से ‘बांदी’ लगती है ये ज़मीन डरती है अब इनसानों से बहती... आगे पढ़े

जब ये शाम, हँसती थी मुस्कुराती थी

Updated on 22 April, 2018, 13:10
 चौखट पर बैठी है इक शाम उदासी ओढ़े हुए इक अर्सा हुआ , इसे मुस्कुराए हुए चुपचाप शून्य में ताकती है, व्यस्त लोगों के भीतर झाँकती है। व्यस्तता का कारण जानना चाहती है, फुर्सत के कुछ पल माँगती है इक समय था जब ये शाम, हँसती थी मुस्कुराती थी। बच्चों के साथ बच्ची बन जाती थी, अपनों के साथ सुख-दुख बाँटती... आगे पढ़े

बंजारे लगते हैं मौसम

Updated on 22 April, 2018, 12:58
मौसम बेघर होने लगे बंजारे लगते हैं मौसम मौसम बेघर होने लगे हैं जंगल, पेड, पहाड़, समंदर इंसां सब कुछ काट रहा है छील-छील के खाल ज़मीं की टुकड़ा-टुकड़ा बांट रहा है आसमान से उतरे मौसम सारे बंजर होने लगे हैं मौसम बेघर… दरयाओं पे बांध लगे हैं फोड़ते हैं सर चट्टानों से ‘बांदी’ लगती है ये ज़मीन डरती है अब इनसानों से बहती... आगे पढ़े

फुरसत मिलते ही.....

Updated on 20 April, 2018, 11:22
 पुरानी किताब के मुड़े पन्ने   क्यों खोलने लगता है दिल   फुरसत मिलते ही   जो गुजर गया, वो गुजर गया   यादों के नश्तर   क्यों घोंपने लगता है दिल   फुरसत मिलते ही   चिडि़यों सा चहके, फूलों सा खिले   रोकने लगता है   क्यों नहीं देखता है दिल   फुरसत मिलते ही   जिस ने हाथ में हाथ दिया नहीं   आस उसी से लगा के   जाने क्यों बैठा है... आगे पढ़े

ज़हन को गहराई देतीं गुलज़ार की 10 बड़ी नज़्में...

Updated on 15 April, 2018, 22:26
   1. "उस से कहना..." इतना कहा... और फिर गर्दन नीची कर के देर तलक वो पैर के अँगूठे से मिट्टी खोद-खोदके बात का कोई बीज था, शायद, ढूंढ़ रही थी देर तलक खामोश रही... नाक से सिसकी पोंछ के आख़िर गर्दन को कन्धे पर डाल के बोली, "बस... इतना कह देना!"   2. लॉस्ट एंड फ़ाउंड... अचानक तुमको देखा आज... आगे पढ़े

// अमित पांडे

Updated on 9 April, 2018, 1:44
अपना देश...  अपने देश में सभी सम्पदायें अपरंपार हैं उर्जा तकनीक इंजीनियर डॉक्टर बहुत मददगार हैं लेकिन मत भुलाना उन गऱीब भाईयों को क्यों कि हर विकास में मजदूर बराबर के भागीदार हैं अपने देश में सभी सम्पदायें अपरंपार हैं एक खासियत और यहाँ के लोकतंत्र में हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई हकदार बने जनतंत्र में मूल सिद्धांत देकर... आगे पढ़े

मेरे जीवन का अनुभव

Updated on 5 April, 2018, 23:44
मरने की अभिलाषा लेकर जीवन की भीख में मागूं क्यों जव तोड़ दिये बंधन सारे तो निद्रा से क्यों न जागूं मैं बस एक व्यथा जीवन को निज पथ से भटकाती रहती है स्व: त्व: के बंधन में बंधकर तम को दर्शाती रहती हैं। (२) हास्य और करूणा का जन्म मंथन करके देख लिया प्रेम और रति के झरनों का अस्वादन करके... आगे पढ़े