Sunday, 19 August 2018, 3:41 AM

कविताएं

वाह कचोरी !

Updated on 13 August, 2018, 9:39
/ मंजुला भूतड़ा (अध्यक्ष, इन्दौर लेखिका संघ, इन्दौर ) मेरे शहर की शान कचोरी,  हर जीभ का स्वाद कचोरी । मूंग कचोरी  मटर कचोरी  आलू कचोरी  प्याज कचोरी  हींग कचोरी  भुट्टा कचोरी  और होती है 'छोड़' कचोरी । चटपटा जायकेदार मसाला  भरकर बनती कचोरी,  तली जाती तभी बनती  क्रिस्पी क्रिस्पी खस्ता कचोरी । एक होती  राज कचोरी  सेव दही चटनी के साथ कचोरी  बहुत बड़ी तो राज कचोरा  कोई... आगे पढ़े

देशभक्त

Updated on 13 August, 2018, 9:37
/ शोभा रानी तिवारी जन्म से मृत्यु तक मैं फर्ज निभा ऊंगा अपना जीवन मां को अर्पण कर जाऊंगा मां तुम ना रोना, उदास ना होना विश्वास तुम रखना ,मैं फिर से आऊंगा   जो वीर वतन पर ,शहीद हो गए आंचल छोड़ मां की गोद में सो गए खून के कतरे कतरे से इतिहास जो... आगे पढ़े

नारी जीवन

Updated on 13 August, 2018, 8:59
 /मनोरमा जोशी सहे जुल्म जिसने सदियों से अब तक, उनको उबारो यह जी चाहता है । करते रहे आदिशक्ति की पूजा मगर मातृशक्ति कुंठित हो रही है। हुआ मान जिनका नहीं भूलकर भी, वही आज व्याकुल विवश हो रही है । तड़पती तिरस्कृत है आज ममता, उसे अपनाने को जी चाहता है । दुर्गा लक्ष्मी अहिल्या सीता सावित्री मीरा अनसुइया गार्गी मैयत्री सारंगा... आगे पढ़े

‘मैं’

Updated on 8 August, 2018, 9:23
/ किरण यादव सड़क के किनारे बंजर बियाबान में गहन अधंकार में सपनों की चादर ओढ़े सोया ना जाने कितनी रातें घेरते उदासी के बादल जहाँ मैं मापता धरती आकाश की गहराई को धुँधला गई है मन की रोशनी ओर चमकते तारों के मध्य मैं लुप्त हो गया हूँ जहाँ ढूँढने लगता हूँ , मैं अपना घर जो कही... आगे पढ़े

बगिया

Updated on 8 August, 2018, 8:54
/मीनू मांणक हाँ ये बगिया है । यहाँ बहार है , पतझड़ भी आते हैं ।। धूप - छाँव साथ चलते हैं । सुख-दुख  साथ रहते हैं ।।   बाबूल का अंगना छोड़ गोरी सपने संजोए आती है । बन कर बहू दुखों को सहती भीगी पलके लिये होंठों को सी लेती है ।।   वृद्ध आश्रम में ये बुजुर्ग सास खून... आगे पढ़े

मित्रों को समर्पित दोहे

Updated on 6 August, 2018, 1:21
 /रश्मि सक्सेना कृष्ण-सुदामा की यहाँ , देते सभी मिसाल । लेकिन वैसी मित्रता , अब है एक कमाल ।।    बिना झिझक हम बोल दें , जिनसे मन की बात । मित्र ज़िंदगी के लिए , होते वो सौग़ात ।।   दुख को हर कर आपके , सुख जो करते सेंड । होते हैं सच्चे वही , इस... आगे पढ़े

मन विचलित

Updated on 30 July, 2018, 13:34
कभी कभी मन बड़ा विचलित होता हैं हरपल अच्छा सा नहीं लगता हैं  शरीर के संचालित मन मस्तिक मैं विचारों की गंगा का प्रवाह तेज़ हो जाता हैं इधर उधर हम भटकते से लगते हैं स्थिरता की नाव डगमगाती है कोशिशों की सीमा बिखर जाती है  कुछ ही पल मैं बहुत कुछ हो जाएगा  अरे इंसान ,ठहर जा... आगे पढ़े

सलाम

Updated on 27 July, 2018, 10:35
/ आशा जाकड़ उन सपूतों  को  सलाम जिन्होंने  झेली हैं अपने  सीने पर गोलियां मिट गई जिनकी  कहानियाँ रह गई  केवल अमर स्मृतियाँ । उन माताओं  को सलाम जिनकी  कोख धन्य  हो गई , पुत्र  बलिदान  कर ममता  धन्य  हो गई रह गए  आंसू   और  मुस्कान । उन बहिनों  को  सलाम, जिनकी राखी सिसकती रहेगी अपनों  की याद ताजा  करती रहेगी सूख... आगे पढ़े

गुरु का महत्व

Updated on 27 July, 2018, 10:34
/ शोभारानी तिवारी गीली मिट्टी के थे पुतले हरपल गुरु ने हमें संभाला हाथों से आकृति बनाई फिर सांचों में हमको ढाला सबसे ऊपर है उनका  पद वही मेरे भगवान इसीलिए तो सब करते हैं गुरुओं का सम्मान खुशबू के बिना फूल अधूरा हरियाली के बिना चमन जल के बिना अधूरी मछली गुरु के बिना अधूरा जीवन कल्पतरु के जैसे हैं वह हमें बनाया... आगे पढ़े

शोखियों में घोलकर...मेघा छाए आधी रात

Updated on 20 July, 2018, 14:52
 नमन / सीमा शिवहरे" सुमन " मेघा छाये आधी रात और कारवाँ गुजर गया ..... दिल की कलम से लिखने वाला  वो महाकवि अब किधर गया। शोखियों में घोलकर फूलों का शबाब  आखिर वो लौट ही गये  देखो ना सावन की तरह। ए भाई जरा देख के चलो..... एक दिन सबको चले जाना  गोपाल दास" नीरज" की तरह। आंसुओं को सम्मानित... आगे पढ़े

बरसाती हाइकु

Updated on 17 July, 2018, 9:32
/आशा  जाकड़ बरसात  में रिमझिम फुहार लाए बहार मेघा गरजे भयंकर  बरसे सर्वत्र  पानी बारिश  हुई सूरज छिप गया अंधेराहुआ पानी  बरसा नव जीवन आया जग हरषा भरेगी नाली चले कागज-नाव बजेगी  ताली वर्षा होने से धरती  खिल उठी मन हरषे बरखा  आई खुशियाँ  संग लाई जीवन दायी बदरा घिरे झमाझम  पानी में छाते निकले बारिश हुई पेड़-पौधे जी उठे नदियाँ  बहे घटाएँ  घिरी बदरा बरसते मन खिलते इन्द्रधनुष मन को  दे सुकून मिटे कलुष आसमान  में बिजली   चमकती और कड़कती वर्षा को देख बच्चे  हो रहे खुश होगा ... आगे पढ़े

वक़्त के पहले क्यों चले जाते हैं लोग

Updated on 15 July, 2018, 17:54
यह कैसा सिलसिला है ज़िंदगी का  वक़्त के पहले क्यों चले जाते हैं लोग  दिल मैं बसे रिश्ते तोड़ जाते हैं लोग  मिलते महकते तो है, हम अपना बनकर  फिर चल रहे रास्ते से क्यों अलग हो जाते है  महफ़िलो मैं अब वो नज़र नहीं आएँगे  जो लिख गए अपनी किताब ज़िंदगी की  जो सजाया करते थे... आगे पढ़े

"उड़ जायेगा हंस"

Updated on 14 July, 2018, 14:34
/प्रियंका “अद्वैता” नैनों के पीछे छिपे हुए हैं राज़ कई हम उलझे हैं दुनियादारी के मसलों में आज कहीं मैं अकसर ही खुद को पाता हूँ बँटा हुआ लगता जैसे एक हिस्सा मेरे जिस्म का है और दूजा  मेरी भूति का इक हिस्सा दुनियावी है और दूजा है  दूर गगन बसता स्वछंद है जो जो बंधा नहीं है सवालों में......... जो विचर रहा आकाश की गूढ़ बयारों में..... जो मुक्त रूप जो पहने ना बेड़ी कोई जो... आगे पढ़े

एकता के संग

Updated on 11 July, 2018, 20:11
 /  मनु जोशी      एक साँस एक आस विश्वास सबके एक हो ।  कठिन कर्म नींव बने आवाज सबकी एक हो । ताकत पुरुषार्थ बूढ़े जीत मगर एक हो । हम सब एक हों । एकता के रंग मेंरंगे विश्वमति एक हो । गीता कुरान एक, फागुन की फाग एक गुरुग्रंथ गान एक , बाइबिल और जीसस के, त्यागों के गान... आगे पढ़े

*अंत तुम बने सदा आरम्भ*

Updated on 10 July, 2018, 9:39
/प्रतिमा अखिलेश टूटी आस लुटा विश्वास किन्तु रुका नहीं ये विकास                अंत तुम बने सदा आरंभ।   निशा के अन्तिम तम के कण, बने ऊषा की प्रथम किरण                हुआ जीवन का प्रत्यारंभ।                अंत तुम बने सदा आरंभ।   अतल... आगे पढ़े

कह दो हवाओं से

Updated on 8 July, 2018, 10:08
देवेंद्र बंसल हवाओं से कह दो की वो धक्का देकर बात ना किया करे जो सच्चे  दिल के हैं उन्हें गहरी ठेस पहुँचती हैं ये झूठ फ़रेब की दुनिया मुझे रास नहीं आती ये मन  के आँचल को मटमैला किए देती हैं ख़ूब दिया है इंसानों को धरती के सागर ने कब तक तू इसे पाकर मुस्करता रहेगा है इंसान तू अकेला ही... आगे पढ़े

पुलिस अधिकारियों ! वेतन लेने से पहले स्वयं से करो प्रश्न

Updated on 6 July, 2018, 15:06
महू के पुलिस अधिकारियों ! वेतन लेने से पहले स्वयं से करो प्रश्न क्यों नहीं पकड़ आ रहे चोर, लुटरे? कैसे हाथ से छूट गया ईश्वर भील? डॉक्टर दंपत्ति के घर किसने की चोरी? आर्मी दंपत्ति को मारने वाले हमलावर  अब तक क्यों नहीं धराये? बच्चे नशे के शिकार क्यों हो रहे कोचिंग की लड़कियों के साथ  बगीचों... आगे पढ़े

मासूमों की क्या खता…

Updated on 4 July, 2018, 8:50
//कुसुम सोगानी दिल रो रहा है जार जार क्यों होता ऐसा बार बार हर शब्द लिखने पे वमन हो रही हे विष के घूँट पी रहे हैं सांसे उगल रहीं हैं छोटी सी मासूम को ना पता कुछ भी शरीर का स्वयं कपड़े  पहनना ठीक से आता नहीं बिना माता छाती से लग ठीक से... आगे पढ़े

हे माँ .. तू बड़ी निराली

Updated on 4 July, 2018, 8:42
/ सरिता  काला क्यों  मैं  इस  धरती  पर  जन्मी क्यों  इतना  दर्द  सहा इस  पापी  दुनिया  में  क्यों  लायी सरकार  से  क्यों  डरी मेरी  हत्या  क्यों  नही  की हे मां, मुझे  क्यों  जन्म  दिया अब हर बेटी  की  रक्षा करना इन दरिंदों से  बचाना मां  वादा  कर हर  बेटी  को  न्याय  दिलाना ... आगे पढ़े

हम आदि हो गए हैं….

Updated on 3 July, 2018, 2:29
मीना गोदरे ‘अवनि’ कहीं ऐसा तो नहीं ऩिरंतर घटती  घटनाओं की तरह हम भी आदि हो गए हैं  सुनने-देखने के, तभी तो अनदेखा  कर देते हैं  जानकर सुनकर, पर आम नहीं विशेष कहे जाते हैं हम, समाज का प्रतिबिंब  दर्शाने वाले , संवेदनाओं, संस्कारों  के पोषक  शोषण अन्याय पर कलम  चलाने वाले और परिवर्तन के पुरोधा, क्या कलम की धार तलवार की धार से  मोटी हो गई है या  संवेदना... आगे पढ़े

"आहत है मन "

Updated on 30 June, 2018, 9:02
मंजुला भूतड़ा   काँप उठती है  भीतर तक रूह  थम जाती है कलम  आहत है मन ।   अखबार के मुखपृष्ठ की प्रथम पंक्ति  शर्मसार करती खबर  मासूम से दुष्कर्म  मानवता तार- तार    क्यों इतना उछ्छृंखल उद्दण्ड  हो गया  मन,  ताक पर रख दिए  सारे संस्कार मापदंड ।     अधर्मी  इन्सान     लूट रहा अस्मत  तोड़ डाली सभी वर्जनाएं  यह कैसी प्रगति है?    बलात्कार पर फांसी की सजा  सुकून तो... आगे पढ़े

मां धरती पिता आकाश

Updated on 28 June, 2018, 12:21
// शोभारानी तिवारी मां जलती लौ पिता प्रकाश है बच्चों के क़दमों का विश्वास है खुशनसीब हैं वे पिता जिनके पास है परिवार रूपी नाव की पतवार है पिता से उपवन में बहार है दुनिया में पिता से व्यवहार है पिता अनुशासन है व संस्कार है  परिवार का संरक्षक पत्नी का स्वाभिमान है मंगलसूत्र की शान बच्चों की पहचान... आगे पढ़े

मैं भी इंसान हूँ

Updated on 23 June, 2018, 0:52
 डॉ. संध्या जैन मैं भी इंसान हूँ   जीना चाहती हूँ लेकिन लोग सीना तानकर खड़े हैं।   मैं भी इंसान हूँ कर्म करना चाहती हूँ     पर शर्मसार हो जाती हूँ जब लोग कर्म नहीं करने देते।               मैं भी इंसान हूँ धर्ममय हो जाना चाहती हूँ पर अधर्म के नाम पर                दुकान चलाने वालों से भयभीत हो जाती हूँ।... आगे पढ़े

गौरैया मन

Updated on 19 June, 2018, 0:30
प्रतिमा अखिलेश   बाबा के अंगना में छूटा बचपन का गौरैया मन।   नैहर की यादों में डूबा अब तक औंटे में बैठा, रहा चूमता देहरी ,आंसू चुगता रहा चिरैया मन।   माँ की हरी चूड़ियां गिनता, थपकी पा अलसाया सा। झूल रहा लोरी के झूले, बौर बना अमरैया मन।   तुलसी में टेसू महकाता, पीली सरसों से मतवाला। स्मृतियों की धुन पर नाचे, मेरा छन्न पकैया... आगे पढ़े

मेरे सारे सपने आप से

Updated on 18 June, 2018, 6:14
ऋतु मिश्र पापा मेरे सारे दिन मेरे सारे सपने आप से  आप ही से हैं मेरे शब्द मेरे मौन आपसे आप से ही तो है मेरा वजूद मेरा गरूर आप से आप से ही तो है मेरी जिद मेरी जीत आप से आपने ही तो दिए हर कदम मेरी मंजिल आप से आप से ही है मेरा बड़प्पन और मेरा बचपन आप से ... आगे पढ़े

हाइकू

Updated on 15 June, 2018, 12:00
डॉ. अंजुल कंसल "कनुप्रिया" सूरज तपा रोम रोम पसीना गरम हवा धूप तपन बरसती अगन करुं जतन चिरैय्या उड़ी देखती सूनी प्याली हां नीर नहीं नदी पोखर प्यास बुझती नहीं रीति सूखी सी भीषण गर्मी खेत और खलिहान किसान दुखी वर्षा फुहार धरती झूम उठी बुझाए प्यास कैरी का पना तरावट दे रहा आम रसीला ... आगे पढ़े

ज़िंदगी

Updated on 13 June, 2018, 9:00
..देवेन्द्र बंसल ज़िंदगी भी क्या है कभी रोती हैं कभी हँसती है यूँ ही मस्त चलती रहती है रास्तों की कठिनाइयों को निभाती चलती है वक़्त बेवक्त अचानक  रुक जाती है आँखें दिखती हैं पारिवारिक उल्लास में ख़लल कर डालती हैं आनंद के ख़ुशबूदार फलों को पल मैं बिखरा जाती हैं टूटे अनमने मन से मैं गिरता पड़ता उठता हूँ फिर उखड़ती साँसों के सहारे बिखरी... आगे पढ़े

पर्यावरण सपने में

Updated on 11 June, 2018, 16:29
    कुसुम सोगानी    नहीं जगाओ सुबह सबेरे, सो लेने दो जी लूँ सपने में कोयल कूके पक्षी कलरव सुन लूँ पौ अब है फटने में मलय पवन नारंगी अंबर सविता के हँसने से तनमन हर्षित हरित धरा के सजने और सँवरने से पीले पीले सूर्य तपन को रोका उन्नत वृक्षों ने हरी भरी शाख़ पत्ती व लहराती बेलाओं ने कल कल करती सरिता बहते... आगे पढ़े

देश अब बदला बदला सा लग रहा है

Updated on 8 June, 2018, 0:20
देवेंद्र बंसल देश अब बदला बदला सा लग रहा है जातिवाद मैं बँटा बँटा सा लग रहा हैं ज़ख़्मों पर मरहम नहीं मिर्ची डाली जा रही हैं आरोप प्रत्यारोप से खाईं पैदा की जा रही हैं सच और झूठ की परिभाषा ख़त्म हो रही हैं इंसान की इंसानियत की हत्या हो रही है मेरी माटी की खिलखिलाहट... आगे पढ़े

इस बार कुछ यूं लिखा मैंने...

Updated on 7 June, 2018, 9:36
कि आसमां तक शब्द ही शब्द बिखर गए कि जैसे एक मात्रा बोई हो और पेड़ पर हज़ारों मात्राओं की लड़ियाँ उग आई हों... कि जैसे एक झील में एक कंकर नही किसी कवि का मन फेंका हो और कविताओं की धारा बह चली हो। कि जब भी तुम्हें याद किया हज़ारों गुलाब... आगे पढ़े