Friday, 20 September 2019, 9:41 AM

कविताएं

सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना

Updated on 13 May, 2018, 12:18
अवतार ‘पाश’ मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती बैठे-बिठाए पकड़े जाना – बुरा तो है सहमी-सी चुप में जकड़े जाना – बुरा तो है पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना – बुरा तो... आगे पढ़े

मेरे जीवन में चले आना

Updated on 6 May, 2018, 9:26
हेमा शर्मा,चंडीगढ़ दबे पांव तुम मेरे जीवन में चले आना देखो ये राज तुम किसी को ना बताना ला पाओ तो खुशियों की सौगात लाना सूनी रातों का तुम चांद बन कर आना मेरी मन्नत का तुम लाल धागा बन जाना आशा का दीप बन रात में तुम जल जाना हाथों की चूड़ी की तुम खनक बन... आगे पढ़े

दिल का दीपक

Updated on 2 May, 2018, 13:41
रिशुप्रिया 1. गले लगा लो दो घड़ी के लिए सोने चाँदी की थाली जरूरी नहीं दिल का दीपक बहुत है आरती के लिए ऊब जाएं ज्यादा न हम कहीं खुशी से ग़म भी जरूरी है ज़िन्दगी के लिए तुम हवा को पकड़ना छोड़ दो वक्त रुकता नहीं किसी के लिए सब ग़लतफहमियाँ दूर हो जाएंगी अपनों से हंस मिल... आगे पढ़े

मौसम बेघर होने लगे

Updated on 26 April, 2018, 10:07
मौसम बेघर होने लगे बंजारे लगते हैं मौसम मौसम बेघर होने लगे हैं जंगल, पेड, पहाड़, समंदर इंसां सब कुछ काट रहा है छील-छील के खाल ज़मीं की टुकड़ा-टुकड़ा बांट रहा है आसमान से उतरे मौसम सारे बंजर होने लगे हैं मौसम बेघर… दरयाओं पे बांध लगे हैं फोड़ते हैं सर चट्टानों से ‘बांदी’ लगती है ये ज़मीन डरती है अब इनसानों से बहती... आगे पढ़े

जब ये शाम, हँसती थी मुस्कुराती थी

Updated on 22 April, 2018, 13:10
 चौखट पर बैठी है इक शाम उदासी ओढ़े हुए इक अर्सा हुआ , इसे मुस्कुराए हुए चुपचाप शून्य में ताकती है, व्यस्त लोगों के भीतर झाँकती है। व्यस्तता का कारण जानना चाहती है, फुर्सत के कुछ पल माँगती है इक समय था जब ये शाम, हँसती थी मुस्कुराती थी। बच्चों के साथ बच्ची बन जाती थी, अपनों के साथ सुख-दुख बाँटती... आगे पढ़े

बंजारे लगते हैं मौसम

Updated on 22 April, 2018, 12:58
मौसम बेघर होने लगे बंजारे लगते हैं मौसम मौसम बेघर होने लगे हैं जंगल, पेड, पहाड़, समंदर इंसां सब कुछ काट रहा है छील-छील के खाल ज़मीं की टुकड़ा-टुकड़ा बांट रहा है आसमान से उतरे मौसम सारे बंजर होने लगे हैं मौसम बेघर… दरयाओं पे बांध लगे हैं फोड़ते हैं सर चट्टानों से ‘बांदी’ लगती है ये ज़मीन डरती है अब इनसानों से बहती... आगे पढ़े

फुरसत मिलते ही.....

Updated on 20 April, 2018, 11:22
 पुरानी किताब के मुड़े पन्ने   क्यों खोलने लगता है दिल   फुरसत मिलते ही   जो गुजर गया, वो गुजर गया   यादों के नश्तर   क्यों घोंपने लगता है दिल   फुरसत मिलते ही   चिडि़यों सा चहके, फूलों सा खिले   रोकने लगता है   क्यों नहीं देखता है दिल   फुरसत मिलते ही   जिस ने हाथ में हाथ दिया नहीं   आस उसी से लगा के   जाने क्यों बैठा है... आगे पढ़े

ज़हन को गहराई देतीं गुलज़ार की 10 बड़ी नज़्में...

Updated on 15 April, 2018, 22:26
   1. "उस से कहना..." इतना कहा... और फिर गर्दन नीची कर के देर तलक वो पैर के अँगूठे से मिट्टी खोद-खोदके बात का कोई बीज था, शायद, ढूंढ़ रही थी देर तलक खामोश रही... नाक से सिसकी पोंछ के आख़िर गर्दन को कन्धे पर डाल के बोली, "बस... इतना कह देना!"   2. लॉस्ट एंड फ़ाउंड... अचानक तुमको देखा आज... आगे पढ़े

// अमित पांडे

Updated on 9 April, 2018, 1:44
अपना देश...  अपने देश में सभी सम्पदायें अपरंपार हैं उर्जा तकनीक इंजीनियर डॉक्टर बहुत मददगार हैं लेकिन मत भुलाना उन गऱीब भाईयों को क्यों कि हर विकास में मजदूर बराबर के भागीदार हैं अपने देश में सभी सम्पदायें अपरंपार हैं एक खासियत और यहाँ के लोकतंत्र में हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई हकदार बने जनतंत्र में मूल सिद्धांत देकर... आगे पढ़े

मेरे जीवन का अनुभव

Updated on 5 April, 2018, 23:44
मरने की अभिलाषा लेकर जीवन की भीख में मागूं क्यों जव तोड़ दिये बंधन सारे तो निद्रा से क्यों न जागूं मैं बस एक व्यथा जीवन को निज पथ से भटकाती रहती है स्व: त्व: के बंधन में बंधकर तम को दर्शाती रहती हैं। (२) हास्य और करूणा का जन्म मंथन करके देख लिया प्रेम और रति के झरनों का अस्वादन करके... आगे पढ़े