अशोक सोनी/मुंबई

महाराष्ट्र में अघाडी सरकार के ग्रह मंत्री अनिल देशमुख पर मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीरसिंह ने जो आरोप लगाया उसने तो राजनीतिक हमाम की दीवारों को ही तोड दिया और जो नजारा सामने आ रहा है उससे तो पूरा महाराष्ट्र तो क्या पूरा देश ही हतप्रभ है। ऐसा नजारा पहले कभी नहीं देखा था कि एक आईपीएस अधिकारी जनता द्वारा चुने गए एक जन प्रतिनिधि पर पूरी प्रामाणिकता से आरोप लगाता हे कि इसने एक पुलिस अधिकारी को प्रतिमाह एक सौ करोड़ रूप्ए की वसूली करने के आदेश दिये थे। इस आरोप से सनसनी तो फैली ही साथ ही चर्चा होने लगी कि इसमें और कौन कौन शामिल हैं क्योंकि मुख्यमंत्री चुप्पी साध गए वहीं अघाडी के एक साथी एनसीपी के प्रमुख अपने साथी को क्लीनचिट देते नजर आए तो तीसरी पार्टी कांग्रेस के मुंह से आवाज ही नहीं निकल रही है।
लोकतंत्र में सरकार तो अधिकारी ही चला रहे हैं लेकिन विवाद तब उत्पन्न हो गया जब मंत्री ने अधिकारी पर आरोप लगा दिया कि उसका कार्य क्षमायोग्य नहीं है आश्चर्य की बात है कि अभी तक तो लोग यह देखते ही रहते और विचार करते रहते थे कि मंत्री या विधायक बनते ही हमारा जन प्रतिनिधि किस प्रकार दिन दुगनी और रात चौगुनी तरक्की करता चला जाता है, एक मकान की जगह बंगला और बंगले की जगह बहुमंजिला इमारत बन जाती है वहीं स्कूटर की जगह लक्जरी गाडियां आ जाती है, ये नेता तो अनेक युवाओं के रोल मॉडल बन जाते है ं कि तरक्की करना है तो नेता बन जाओं फिर करोड़ों की बात तो ऐसे होती है मानो चिल्लर की बात की जा रही है।
परमबीर सिंह द्वारा लगाए गए आरोपों की पुष्टि पुलिस अधिकारी सचिन वजे ने भी कर दी तथा इसके साथ ही एक और नाम उजागर कर दिया वह नाम है महाराष्ट्र का परिवहन मंत्री अनिल परब का। सचिन वजे का कहना है कि परब ने भी उससे पचास करोड़ की मांग की थी यानि एक के बाद एक नाम सामने आते चले जा रहे हैं, दूसरी तरफ षिवसेना का प्रवक्ता व राज्यसभा सदस्य संजय राउत इस प्रकार बयान दे रहे है कि षिवसेना और षिवसैनिकों से ज्यादा इमानदार तो कोई हो ही नहीं सकता है लेकिन जैसे ही कोई इन पर आरोप लगाता है ये भडक उठते है और कहते हैं मैं बहुत नंगा आदमी हूं मुझसे दूर ही रहना लेकिन भाजपा के आरोप के बाद राउत उस व्यक्तिको 54 लाख रूपये लौटा देते हैं जो उन्होंने दस साल पहले लिए थे और जिसे वे लोन बता रहे थे।
हालांकि परमबीर सिंह की नियुक्ति पुलिस कमिश्नर के रूप में तथा सचिन वजे की नियुक्ति होने के बाद लोगों को पता लग गया था कि इन्हें किसका राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है चूंकि उस समय ये सरकार के इशारे पर सरकार के दुश्मनों ेको कुचल रहे तो यह सरकार बहुत खुश थी और परमबीरसिंह और सचिन वजे को सर्वश्रेष्ठ अधिकारी बताया जाता रहा है तथा बार बार मुंबई पुलिस को संरक्षण देती यह सरकार नजर आ रही थी, किन्तु जैसे ही उद्योगपति मुकेश अंबानी के निवास के बाहर विस्फोटक से भरी गाडी रखी जाती है एक नया एपिसोड शुरू हो जाता है और एक के बाद एक नई जानकारी जनता के बीच आना प्रारंभ हो जाती है
अब बात करते हैं नैतिकता की जब परमबीर ने आरोप लगाया तो गृहमंत्री अनिल देशमुख ने त्यागपत्र नहीं दिया। वहीं मुख्यमंत्री ठाकरे भी चुप्पी साधे बैठे रहे मानों उन्हें इससे कोई लेना देना ही नहीं है। अब जब मुंबई हाईकोर्ट ने एक याचिका पर एक सौ करोड़ वसूली के परमबीर सिंह के आरोपों की जांच सीबीआई को करने का आदेश दिया तो शिव सेना के प्रवक्ता और यह कहते नजर आए कि देशमुख ने नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र दिया है। आश्चर्य की बात है देशमुख में नैतिकता जागृत होने में पंद्रह दिन का समय लग गया अब इसे सीबी आई का डर कहें या नैतिकता यह समझ से परे है। मैंने पूर्व में भी लिखा थाकि ये महाविकास अघाडी सरकार इतनी आसानी से जाने वाली नहीं है चाहे जो इस सरकार को बचाए रखना गठबंधन के तीनों दलों की जवाबदारी और मजबूरी बनी हुई है क्यों कि तीनों ही दलों को आज आर्थिक संबल की जरूरत है औ यह सुविधा यह सरकार ही दे सकती है। अगर सरकार चली गई तो फिर क्या होगा। आने वाले समय में जो चुनाव होंगे उसमें इन तीनों दलों की क्या दशा होनी है यह बात इन दलों के नेता समझ चुके है अत जितना अधिक फंड एकत्र करेंगे इनके काम ही आना है।
आश्चर्य की बात है कि महाविकास अघाडी सरकार के तीनों ही दल काफी पुराने हैं लेकिन एक भी दल ऐसा नहीं है जिसका प्रभाव पूरे महाराष्ट्र में हो, किसी को 54 सीट तो किसी को 56 सीट तो किसी को 45 सीट पर ही जीत मिली है और तीनों को मिला कर भी ये सरकार यह कहने में सक्षम नहीं है कि वे पूरे महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर रहें हैं। तीनों दल अपने अपने क्षेत्र में अपना प्रभाव रखते हैं दूसरे क्षेत्र में नहीं दूसरी ओर भाजपा महाराष्ट्र में सबसे बडा दल होने के बावजूद सत्ता से बाहर है।
महाराष्ट्र के सबसे बडे और कददावर नेता शरद पंवार जो चार बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और केंद्र में भी मंत्री रहे है वे तथा कांग्रेस जो यहां सत्ता में रही लेकिन इन दलों के नेताओं का राज्य में प्रभाव ही नहीं बन पाया एक भी ऐसा नेता नहीं निकला जो पूरे राज्य मेंसर्वमान्य हो । जहां तक शिवसेना की बात है तो बाला साहेब ठाकरे ने जिस अवधारणा को लेकर पार्टी का गठन किया था वह बात आज नजर नहीं आ रही है, बाला साहब की जिस दहाड पर पूरा मुंबई थम जाता था उसका एक प्रतिशत भी प्रभाव देखने को नहीं मिल रहा है दूसरी बात यह है कि मुंबई में तो शिवसेना के विधायकों को सभी पहचानते हैं कि वह विधायक बनने से पहले या शिवसेना में आने से पहले क्या था, उदाहरण के तौर पर शिवसेना के विधायक प्रताप सरदेसाई के खिलाफ जब कमीशन खोरी का एक मामला उजागर हुआ तो पता चला कि किसी जमाने में आटोरिक्षा चलाने वाले प्रताप आज 143 करोड़ की सम्पत्ति के मालिक हैं तो लोगों को आश्चर्य होने लगा कि आखिर इन्होेने ऐसा क्या किया था जो इतनी संपत्ति के मालिक बन गए और ये बातें ही शिवसेना के प्रति का लगाव कम करने वाली साबित होने लगी।
हालांकि इस एक सौ करोड की वसूली के मामले में हर रोज एक नया नाम सामने आ रहा है और लोग चुपचाप देख रहे हैं अपने आदर्शों को जिन्हें देख कर वे गर्व करते थे लेकिन अब उनके प्रति नफरत होने लगी है। सीबीआई ने जांच प्रारंभ कर दी है और वह अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट को पेश करेंगे हालांकि अब इस मामले में कुछ भी छुपा रहने की आशंका कम ही है। सच्चाई जो भी है जनता के सामने आ ही जाएगी।

Spread the love

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here