अशोक सोनी/मुंबई
पिछले साल जब कोरोना का प्रकोप शुरू हुआ तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश वासियों की हौंसला आफजाई के प्रयास किये तो विपक्ष मूर्खता पूर्ण तर्कों पर उतर आया और हर उस बात का विरोध करने लगा जो जनता के लिए लाभदायक हो सकती है। आज हमारे द्वारा की गई लापरवाही का ही परिणाम हम भुगत रहे हैं जहां जहां कोरोना का अधिक प्रकोप है वहां के हालातों का जिक्र करने में भी डर लगने लगा है। अस्पतालों में बेड नहीं हैं, तो कहीं पर दवाइयां उपलब्ध नहीं है तो कहीं पर ऑक्सीजन सिलिंडर नहीं है। लापरवाह विपक्ष का पुराना रवैया सामने आने लगा है।
यहां यह बात करना जरूरी नहीं है कि कहां पर कितने बीमार हैं और कहां पर कितने लोगों की मौत हो गई है।
सरकार बार बार कहती रही है कि मास्क का उपयोग करे, सोशल डिस्टेंस का पालन करें और सेनेटाइजर का उपयोग करें ताकि इस महामारी से बचा जा सके लेकिन लोगों ने अपना पुराना रवैया बरकरार रखते हुए कि अरे क्या होता है कोरोना तो गया और लोग टूट पडे खाने पीने की दुकानों पर, बाजारों में खरीदारी करने मानों कल कुछ नहीं मिलने वाला है। हां यह बात जरूर है कि इस दर्म्यान ही देश के कुछ हिस्सों में चुनाव भी हुए और भीड भी एकत्र हुई लेकिन इसके गंभीर परिणामों पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। आज फिर हालात पिछले साल जैसे ही होने लगे हैं अस्पतालों में बेड की कमी नजर आने लगी, मौतों का आंकड़ा अचानक तेजी से बढने लगा, लोगों मे फिर डर के माहौल ने लोगों को रेल्वे स्टेशन और बस अडडों पर लोगांे का जमावडा नजर आने लगा। हर कोई यह सोच रहा कि किसी तरह वह अपने परिजनों के करीब पहुंच जाए उसे न खाने की चिंता है और न पीने की।
अगर वर्तमान हालात पर नजर डालें तो यह साफ हो जाएगा कि यह सब हमें हमारे कर्मों की सजा ही मिल रही है। पिछले साल समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा था कि हम ये भाजपा की वैक्सिन नहीं लगवाएंगे, यह ऐसा मूर्खतापूर्ण बयान था जिसकी जितनी निंदा की जानी चाहिए वह कम है। अब तो अखिलेश खुद कोरोना संक्रमित हो गए हैं। अखिलेश जैसी ही एक बयान सामने आया कि हम न वैक्सीन लगवाएंगे और न किसी को लगवाने देेंगे। आश्चर्य की बात है कि इस वैश्विक महामारी में प्रयास तो लोगों को बचाने के होने चाहिए वहीं ये विपक्ष लोगों को भड़का रहा है। ये सारे हालात बता रहे है कि हमारे देश में आज भी कितना पिछडापन है जहां जनता पढी लिखी नहीं है तो उनका जनप्रतिनिधि पढालिखा कहां से होगा।
आज हमारे देश में कोरोना से बचाव के लिए दो-दो वैक्सीन बन कर तैयार हो गई है बस जरूरत इस बात की है कि कोरोना से बचने के उपायों को नजरअंदाज न करें। स्वयं भी हालात की गंभीरता को समझे तथा सरकार संवेदनशील है बस आपकों भी सहयोग करना होगा। वैसे एक बात स्पस्ट है कि यह साल पिछले साल के मुकाबले अधिक चुनौती भरा होगा या यूं कहिए कि चुनौती भरा है। पिछले साल क्या व्यापारी और क्या मजदूर सभी ने समस्याओं का सामना किया है। परेशानियां उठाई हैं वहीं सरकारों ने जनता के लिए दिल खोल कर मदद दी है। इस बार सभी सरकार इस समस्या से मुकाबले के लिए सहयोग कर रही है। विपक्ष को चाहिए कि वर्तमान में राजनीति करना छोड़ कर समस्या समाधान के उपाय सुझाए ताकि सरकार के लिए भी कदम उठाना आसान हो। सरकारें आती जाती रहेंगी लेकिन एक बात को ध्यान में रखना होगा कि जब जनता ही समस्याओं से जूझती रहेगी तो आपको राजा कौन बनाएगां। विपक्ष पक्ष को अब जनता के सेवक की भूमिका में आ जाना चाहिए क्यों कि ये जनता ही है जिसने आपको राजा बनाया है कुछ समय के लिए अपने सारे स्वार्थो को त्याग दीजिये और तन मन धन से जनता की सेवा में जुट जाइये।
आज देश के विभिन्न हिस्सों से जो समाचार आ रहे हैं वह चौंकाने वाले तो हैं ही साथ ही डरावने भी है महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली, पंजाब जिधर भी देखों एक ही खबर है और वह है कोरोना रोगियों की संख्या मे ंइजाफे की और इससे मरने वालों की खबरें है कि ना अस्पतालों में जगह है और न श्मशानों में, अस्पतालों में बेड नहीं मिल रहे हैं और श्मशानों मे घंटों बाद नंबर आ रहा है। कई जगह तो एक ही चिता पर एक से अधिक शवों का अंतिम संस्कार किया जा रहा है, कहीं पर तो सडकों पर ही अंतिम संस्कार किये जाने की भी खबरे सामने आई है। ये सब देख सुनकर तो हालात की गंभीरता का अंदाजा हो ही जाता है, दूसरी तरफ ये खबरे भी आ रही है कि कोरोना पीड़ितों को जिन इंजेक्शनों (रेमडिसिविर)की जरूरत है उनकी कालाबाजारी हो रही है। वहीं अस्पतालों में लाखों रूपये देने के बाद भी बेड नहीं मिल रहे हैं। राज्य सरकारों के पास इतने संशाधन नहीं है कि वे आसानी से सब चीजों का प्रबध कर सके। सबसे ज्यादा बुरे हालात तो वहां कि है जहां केंद्र और राज्य की सरकारें अलग अलग दलों की है वहां दोनों ही एक दूसरे के खिलाफ आरोप लगाने में ही व्यस्त हैं और जनता पिस रही है इनके विवादों में।
सवाल यह है कि सरकार क्या करे पहले लोगों की जान बचाए या उनका रोजगार यह एक ज्वलंत प्रश्न है। विपक्ष चाहता है कि लोगों के साथ ही रोजगार को भी बचाया जाए वहीं सरकार चाहती है कि उसके सामने आर्थिक संकट उत्पन्न न हो और लोगों की जिंदगी भी बच जाए किंतु ऐसा कर पाने में सरकार को पूरी तरह से सफलता नहीं मिल पा रही है । हमारे देश में चिकित्सा सुविधाएं तो हैं लेकिन उस स्थिति का सामना करने में पर्याप्त नहीं है जो हमारे सामने आ खड़ा हुआ है। हालांकि सरकार पूरी कोशश कर रही है किंतु लोगों का भी यथोचित सहयोग नहीं मिल पा रहा है, लोग अभी भी यह मान कर चल रहे हैं कि कोरोना से कुछ नहीं होता है वहीं दूसरी ओर जब किसी का कोई संबंधी इसकी चपेट में आकर चल बसता है तो सारा दोष डाक्टरों पर मढ़कर उनके साथ बदसलूकी की जाती है जिससे चिकित्सा जगत में भी नाराजगी उत्पन्न हो जाती है। अगर जनता थोडी सी समझदारी दिखा दे तो बड़ी समस्या का समाधान हो सकता है और लोगों की जिंदगी भी बचाई जा सकती है। जनता को किसी के बहकावे में आए बगैर स्वयं की और अपने परिवार की रक्षा का भार उठाना पडेगा तब ही हम इस संकट से निकल पाएंगे।

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