राजेश बादल

इस बार बंगाल का चुनाव आज़ादी के बाद हुए सारे निर्वाचनों में अनूठा और क्रांतिकारी है। यह तब भी असाधारण नहीं था,जब लंबे समय से सरकार चला रही कांग्रेस को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने सत्ता से बाहर किया था और तब भी यह उतना युगांतरकारी नहीं था,जब तृणमूल कांग्रेस ने वाम हुकूमत को बेदख़ल किया था। इस बार परिणामों से पहले तमाम चुनावी पंडितों की राय कुछ भी हो, कोई भी दल सरकार बनाए, बंगाल ने एक नया अध्याय तो रच ही दिया है। इसे कोई नकार नहीं सकता। देखा जाए तो यह चुनाव परिणाम के कारण नहीं,बल्कि हालात,शैली और राजनीतिक बेहयाई के लिए कुख्यात रहेगा। लोकतंत्र की सेहत के लिए यह अत्यंत विषम परिस्थिति स्थिति मानी जा सकती है ।
बंगाल का यह चुनाव वैसे तो अन्य सूबाई चुनावों जैसा ही था, लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने इसे इतने आक्रामक और नकारात्मक अंदाज़ में लड़ा कि बाक़ी दलों को भी अपनी गाड़ी पटरी से उतारनी पड़ी। कोरोना जैसे भयावह दौर के बीच इस पूर्वी प्रदेश में सियासी पार्टियों ने बेहद विकृत रूप प्रदर्शित किया। मतदाताओं ने पहली बार देखा कि जीत हासिल करने के लिए राजनेता किस हद तक गिर सकते हैं। वैसे पाने के लिए इस बार किसी दल के लिए कुछ नहीं था। दस साल सत्ता में रहने के बाद ममता बनर्जी तीसरी पारी भी खेलती हैं तो इसमें कोई उपलब्धि की बात नहीं है। अलबत्ता उनकी सीटें कम हो सकती हैं। उनकी पार्टी का वोट प्रतिशत गिर सकता है। नकारात्मक वोट और बीजेपी की उत्तेजक प्रचार मुहिम इसकी वजह मानी जा सकती है।

कहा जा सकता है कि ममता बनर्जी ने जिस ढंग से चुनाव अभियान संचालित किया और बीजेपी से क़िला लड़ाया ,उससे राजनीतिक प्रेक्षक दंग हैं। बंगाल के वोटर की मानसिकता पढ़ना कठिन नहीं है। उनकी पहली पसंद स्थानीय चरित्र वाली पार्टी ही रहती है। इस नाते बीजेपी के प्रचार प्रसार में आमार बांग्ला की ख़ुशबू नहीं आई। आयातित सियासी शख़्सियतों के सहारे भीड़ तो जुटाई जा सकती है। उसे मतों में बदलना संभव नहीं होता। इसलिए केवल धनबल और धुआंधार प्रचार के बल पर बीजेपी का सरकार बनाना कठिन लगता है। उसका वोट प्रतिशत यक़ीनन बढ़ेगा,इसमें संदेह नहीं है। सीटों की भविष्यवाणी करने में मेरा भरोसा नहीं है क्योंकि पूर्वानुमान सही भी हो सकते हैं और ग़लत भी। वैसे तो ममता जीत रही हैं। चंद सीटों की अगर कमी पड़़ी तो कांग्रेस – वाम मोर्चे के पास उन्हें समर्थन देने के सिवा कोई विकल्प नहीं है।

अब बात कांग्रेस वाम गठबंधन की। इस बार यह गठजोड़ और दुर्बल होता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस का यह अस्वाभाविक गठबंधन था। भले ही ममता बनर्जी कांग्रेस को कम सीटें देती, लेकिन वह चरित्र के अनुसार प्राकृतिक अनुबंध होता। नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस की कोख से तृणमूल कांग्रेस निकली है। वाम मोर्चे में शरीक होकर उसने अपना और वाम दलों का नुकसान ही किया है। कांग्रेस के शीर्ष विचार पुंज को आज नहीं तो कल यह बात समझनी ही पड़ेगी। अगर वे नहीं समझे तो एक दिन उसका भी सफ़ाया हो सकता है।

प्रारंभिक चरणों में कांग्रेस की रैलियां ज़बर्दस्त थीं। मगर बीच में अचानक जैसी समूचा प्रचार अभियान जैसे शीतगृह में बैठ गया। आख़िरी दो चरण में कांग्रेस – वाम गठबंधन ने अवश्य ज़ोर लगाया। यह भी इसलिए कि अगर वह इन दो चरणों में ज़ोर नहीं लगाती तो उसका लाभ बीजेपी को मिल जाता। हालांकि प्रेक्षकों का मानना है कि शिखर स्तर पर ममता और सोनिया की कोई गुप्त संधि अवश्य थी ,जिसका मक़सद किसी भी तरह बीजेपी को सत्ता से बाहर रखना था।
बहरहाल ! बंगाल का यह चुनाव सन्देश देता है कि इस ढंग से कोई विधानसभा चुनाव नहीं हो तो अच्छा।

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