मुझे अहसास होता है कि कोमल उम्र में शिक्षकों का बड़ा प्रभाव होता है। बड़े होकर ऊँचे स्कूलों में पहुँचने तक मन की मिट्टी थोड़ी कड़क हो चुकी होती है और आसपास के हवा-पानी को बचाने-रोकने की जुगत जान चुकी होती है।
मुझे बचपन के वे दिन पांच दशक बाद भी नहीं भूले। इसीलिए कहा जाता है कि कोमल मन गीली मिट्टी की तरह होता है। इसे जैसा ढाल दिया जाए और इस पर जो अंकित कर दिया जाए, वह हमेशा के लिए लिख जाता है। मिट्टी जब सूखकर कड़क हो जाती है, तब वह और स्पष्ट दिखने लगता है।पिछले दिनों पोला पर्व पर इसका व्यावहारिक अनुभव प्रत्यक्ष हुआ। घर के गमले से काली मिट्टी निकाली, बैल का पुतला बनाया, उसके नाक-कान, अयाल (बैलों के गले के नीचे की झालर), बलखाता कंधा, उमठी हुई पूँछ और मांसल पुट्ठे बनाते हुए लगा कि क्या हमें भी ऐसा गढ़ा जाता है? कुछ समय उसे हवा और धूप दिखाई। जब सूख गया और लगा कि अब यह मजबूत हो गया है और वज़न उठाने के लिए तैयार है तो रंग-रोगन कर उसका शारीरिक सौष्ठव दिखाया। उसे सुदर्शन बनाया। उसका व्यक्तित्व निखारा। 
बैल बनाते हुए सोचता रहा कि क्या हमें भी ऐसे ही गढ़ा जाता है। सुनते आए हैं कि मनुष्य माटी का पुतला है। पौराणिक कथाएँ ब्रह्मा के कारख़ाने में मनुष्यों के निर्माण की जानकारी देती हैं। वह गजब का कारख़ाना है, जिसमें लाखों करोड़ों (इन्हें गिनते हुए गिनती भी खत्म हो जाती है।) इंसानी पुतले एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। एक डाई एक बार ही काम आती है। हमने एक बैल बनाया। यदि ऐसे दस बैल बनाने को कहा जाए तो उनमें भिन्नता लाना मुश्किल होगा। हालाँकि यह भिन्नता कुछ -कुछ मौजूदा हवा, पानी, मिट्टी की प्रकृति जैसे कारकों से भी आती है। मैं जब बैल बना रहा था तब बरसात थी। सो मिट्टी में काफी नमी थी और वह स्वाभाविक रूप से लचीली थी। गमले की मिट्टी के कंकड़ उसे मोड़ने-तोड़ने में कठोर बना रहे थे।
बैल बनाते हुए मेरे मन में पोला पूजन को लेकर भी कुछ प्रतिरोध था। मैं दलील दे रहा था कि जब हमारा समाज कृषि प्रधान था और बैल-गाय हमारे जीवन का अहम हिस्सा थे, तब इनको पूजा जाता था। आज हमारे जीवन में बैल कहीं नहीं है। आने वाली पीढ़ी घरेलू जीवन में इसकी उपयोगिता से वाक़िफ़ नहीं रहेगी। न ही उसे इसकी जरूरत होगी। तो अब गोबर का पर्वत बनाकर पूजा करना और बैलों को पूजना कितना संगत है? लेकिन दादाजी-पिताजी की पीढ़ी शायद मिट्टी के संस्कार और समाज-जीवन के सबक याद करके ही ऐसा करने को कहती रही हो। 
पोला के तक़रीबन महीने भर बाद आया शिक्षक दिवस बैल बनाने के भावों और पिताजी-दादाजी की भावनाओं से एकाकार हो रहा था। मैं बैल के निर्माण की तरह जीवन के छह दशक बाद भी नाज़ुक उम्र के मन पर उकेरे गए हर्फ़ साफ-साफ पढ़ रहा था। उस अवस्था में माता-पिता (और कुटुंबकम जीवन के दूसरे वरिष्ठों), मित्र और शिक्षक-इन तीन के व्यवहार, बोल और करनियां (कर्तृत्व) अनजाने ही, अदृश्य रूप में, धीरे-धीरे हमारे भावी जीवन की तस्वीर गढ़ते रहते हैं। हमें पता नहीं चलता। जीवन के छह दशक बाद मैं अपने भीतर को खंगालने बैठा और व्यक्तित्व के पुर्ज़ों को खोलकर देखना चाहा तो कहीं न कहीं किसी के हाथों के निशान पाए। कहीं माता-पिता के, कहीं बचपन के मित्रों के तो कहीं शिक्षकों के। कोमल मन की स्लेट पर माता-पिता और संगी-साथियों के अलावा जिस व्यक्ति की लिखावट जीवन भर अमिट रहती है, वह शिक्षक ही होता है। 
मुझे अहसास होता है कि कोमल उम्र में शिक्षकों का बड़ा प्रभाव होता है। बड़े होकर ऊँचे स्कूलों में पहुँचने तक मन की मिट्टी थोड़ी कड़क हो चुकी होती है और आसपास के हवा-पानी को बचाने-रोकने की जुगत जान चुकी होती है। उस वक्त के शिक्षकों के व्यवहार में वैसा सलौनापन भी नहीं होता है। अगर आप भी आज उम्र के किसी मुक़ाम पर अपने व्यक्तित्व की परतें उधेड़ेंगे को किसी जगह शिक्षक की बुनावट जरूर मिलेगी। उसके हाथ के निशान मिलेंगे। मन के किसी कोने में फँसे उसके शब्द मिलेंगे। कोई काम करने से रोकते हुए हिदायत मिलेगी तो किसी दौड़ में कूद जाने के लिए धक्का देती कोहनी का दबाव मिलेगा। 
उनका प्रेम, ग़ुस्सा, हिक़ारत, दया, वात्सल्य सब कुछ कहीं न कहीं गुँथा मिलेगा। जो यह न महसूस कर पाएँ, पता नहीं उनको गढ़ने वाले हाथ कैसे थे। मेरा बैल अगर बोल पाता तो बताता कि मैंने उसका कंधा बनाते समय थोड़ा हाथ और कड़क कर दिया होता तो वह स्कंध और पुष्ट दिखता। हाथ को सहलाते हुए कोमलता और कलात्मक अंदाज में चलाया होता तो अयाल में और सुंदर लहरियाँ आ जातीं। मिट्टी में आए कंकड़ निकाल दिए होते जीवन की गुत्थियाँ कम रहतीं। मिट्टी में थोड़ी राख मिला दी होती तो दरकन न होती। जिन्होंने बैल नहीं बनाए, वे इसे क्या समझें ! 
सत्तर के दशक में जब किसी महिला को वाहन चलाते देखना उस समय का अकल्पनीय अजूबा होता था, तब मेरे अंग्रेज़ी शिक्षक दाहिने हाथ में ( तब पुरुषों के बाएँ हाथ में ही घड़ी बाँधने का अलिखित क़ायदा था) में लेडीज़ घड़ी बाँधकर आते थे तो अनजाने ही वर्जनाओं और विधि-निषेधों को बदलने का भाव धुमड़ता था और मन में इसके प्रति एक साहस भाव पैदा करता था। बाद की उम्र में अंग्रेज़ी के ही दूसरे शिक्षक रोज झक सफ़ेद कपड़ों और चमड़े के चमचमाते सैंडल में तटस्थ भाव से कक्षा में आते तो मन पर धवलता, स्वच्छता और दिव्य आध्यात्मिक की छवि अंकित होती। 
हिंदी के गुरूजी शहर के सबसे मालदार घराने से होते हुए भी फटे कुर्ते में नजर आते तो हम उस दार्शनिकता को मन में उतार रहे होते कि ज्ञान कपड़ों और बाहरी आवरण का मोहताज नहीं होता। भूगोल के शिक्षक जब हवाओं की गति और दिशा को कक्षाकक्ष में खुद अलग-अलग दिशा में चलकर समझाते तो हमें लगता कि व्यावहारिक ढंग से बात करना कितना असकरकारी होता है। आगे के स्कूल में भी कुछ और सीखें मिलीं। बॉयलॉजी के शिक्षक जब उनका नाम मंच से न लिए जाने पर गाँठ बाँधते तो हमारी विश्लेषक बुद्धि जागकर कहती कि शिक्षक को अपने शिष्यों की भूलें माफ़ करना सीखना चाहिए और पूर्वाग्रह कितने नुक़सानदेह होते हैं। विज्ञान के एक शिक्षक कहते कि तुम साहित्य में रुचि रखते हो तो विज्ञान क्यों पढ़ रहे हो, तब शिक्षक के संकीर्ण और एकांगी सोच से डर लगता। सोचते कि विज्ञान के शिक्षक को तो यह कहना चाहिए कि साहित्य में रुचि रखने वाले छात्र को भी विज्ञान पढ़ना चाहिए। 
हजार रुपए महीने की प्रतिभावान छात्रवृत्ति पाने वाले हम छह-सात छात्रों को जब एक शिक्षक प्यार से ‘ओ हज़ारियो’ कहकर बुलाते तो हम स्फूर्ति व लाड़ से भर जाते और घर व मित्रों तक में उनका बखान करना न भूलते। उनके मोटापे पर मज़ाक़ करते कि ठंड में दो बच्चे उनके फुलपैंट की एक बाँह मे रात गुज़ार सकते हैं। शिक्षकों के बारे में सकारात्मक हास-परिहास उस जीवन का अदम्य आनंद था। तब जो उनकी निंदा करता तो हिंदी के शिक्षक द्वारा उद्धृत किए जाने वाले कवित्त सुनाकर बताते कि गुरू की निंदा करना ठीक नहीं।
गाँव के स्कूल की प्राइमरी पाठशाला में एक अलग अध्याय लिखा गया था। स्कूल में निरीक्षण होने वाला था। निरीक्षक महोदय के आने के पहले गुरूजी ने आदेश दिया कि जिसके बस्ते में कुंजियाँ (की, गाइड्स) हों, आधा घंटे में उन्हे ठिकाने लगा दे। इन्हें लेकर कोई पास के बग़ीचे की तरफ दौड़ा तो कोई नाले की तरफ। थोड़ी देर में एक अकड़े हुए से पेटू निरीक्षक, जो उस समय सहायक शाला निरीक्षक (प्रचलन में एडीआएस साहब)  कहलाते थे, आए तो पाठशाला में साँप सूँघने जैसी शांति थी। थोड़ी देर में पकवानों की महक फैली जिन्हें हमारे गुरुजन ने अपनी जेब और चंदे से उनके स्वागत के लिए बुलवाया था। एक शिक्षक बुदबुदाए-इनकी एक क़लम से विद्यालय की मान्यताएं ख़तरे में पड़ जाती हैं, शिक्षकों का करिअर ख़राब हो जाता है, सो आवभगत में कमी नहीं रहनी चाहिए। ले-देकर या ख़ुशामद करके मेहरबानी पाने का यह नया पाठ था जो कम से कम हमारे किसी काम न आया। इसमें यह नैतिक शिक्षा भी निहित थी कि व्यवस्था ऐसे चलती है। 
बहरहाल सद्भाव, समानता, पक्षपात, राग, द्वेष, निश्छल प्रेम, तटस्थता, पारदर्शिता,करुणा, पूर्वाग्रह, छल, अपमान, तिरस्कार आदि के पहले-पहले पाठ प्रारंभिक पाठशाला की छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से ही पढ़े। बाद के दौर में तो उनकी व्याख्याएँ और व्यावहारिक प्रयोग ही देखते आ रहे हैं। 

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