राजेश बादल 
वैसे तो राज कपूर की एक एक फ़िल्म की इतनी कथाएँ हैं कि लिखते लिखते कम्प्यूटर की भारी भरकम मेमोरी भी चुक जाए और वे समाप्त न हों। इतना ही नहीं ,हममें से अनेक लोग उनकी फ़िल्मों के बारे में इतना अधिक जानते हैं कि उन पर भी फ़िल्मों की श्रृंखला बन जाए। इसलिए इस श्रृंखला में जानबूझकर उनकी फ़िल्मों का विवरण शामिल नहीं कर रहा हूँ।उनके वे रूप ले रहा हूँ ,जिनके बारे में लोग कम ही जानते हैं।
राज कपूर बेहद संवेदनशील इंसान थे और ज़मीन से जुड़े हुए। वे दुनिया के तमाम देशों में लोकप्रिय थे ,लेकिन उसका कोई गुरूर उनके भीतर नहीं था।इसी वजह से वे जहाँ भी जाते,लोगों को अपना दीवाना बना लेते। ज़िंदगी के शुरुआती ढाबों और दोस्तों से लेकर उनकी जीवन शैली भी एकदम सादा थी। वे हमेशा ज़मीन में सोते थे। बिस्तर पर उन्हें नींद ही नहीं आती थी। चाहे देश में हों या परदेस में। एक बार वे लन्दन गए। जिस होटल में ठहरे ,उसमें पहली रात ही पलंग से गद्दा उठाया और नीचे बिछाया ,फिर सो गए। सुबह होटल वालों को पता चला तो उन्हें चेतावनी दे गई। अगले दिन फिर राजकपूर रात को गद्दा नीचे बिछाकर सोए। फिर मैनेजर उनके कमरे में आया और उनकी हरक़त के लिए ज़ुर्माना भरवाया। राजकपूर पर कोई असर नहीं पड़ा। जितने दिन भी वे रहे ,रोज़ जुर्माना भरते और ज़मीन में ही सोते। होने घर में हों या पुणे के इस लोनी वाले आश्रम में। कराड़ परिवार ने इसीलिए उनके शयनकक्ष में राजकपूर की एक प्रतिमा ठीक उसी तरह लेती हुई स्थापित की है ,जैसा वे सोते थे। इस अंक के साथ आप इस प्रतिमा का चित्र भी देख सकते हैं।
वे अपने दोस्तों के दुःख में हरदम उनके साथ खड़े रहे। लेकिन यह केवल मित्रों के साथ नहीं था। वे हर गऱीब और कमज़ोर इंसान के काम आते थे। चाहे उसे जानते हों या नहीं।एक बार वे लोकेशन की शूटिंग के लिए कश्मीर गए।वहाँ मिठाई वाला सड़क किनारे बैठता था ।एक दिन उस मिठाई वाले की बोनी ही नहीं हुई।दोपहर हो गई।बेचारा उदास हो गया।राज कपूर ने यह देखा तो उनसे नहीं रहा गया।वे ख़ुद सड़क किनारे बैठे और आवाज़ लगाकर
मिठाई बेचने लगे। देखते ही देखते सारी मिठाई बिक गई। सारे पैसे उस दुकानदार को सौंपते हुए बोले ,” दोस्त ! जब कभी धंधा मंदा हो तो मुझे बुला लेना “।बेचारा फुटपाथिया मिठाई वाला राजकपूर का उपकार मानता रहा।
फ़िल्म शाहजहां का गीत -जब दिल ही टूट गया तो जीकर क्या करेंगे लिखने वाले शायर मजरूह सुल्तानपुरी ने आज़ादी के बाद एक गीत लिखा। इससे केंद्र सरकार नाराज़ हो गई। उन्हें जेल में डालने की नौबत आ गई ।वारंट जारी हो गया। इसी दौर में उनकी बड़ी बेटी का जन्म हुआ ।मजरूह के परिवार पर मुसीबतों का बोझ टूट पड़ा ।ग़रीबी का विकराल चेहरा ।ऐसे में राजकपूर देवदूत के रूप में सामने आए ।उन्होंने मजरूह से कहा एक गीत चाहिए जिसमें इंसान भगवान से पूछ रहा है कि ये दुनिया तूने क्यों बनाई ? उन्होंने कहा कि उनकी नई फ़िल्म के लिए यह गीत चाहिए। मजरूह को उन्होंने उन दिनों एक हज़ार रूपए दिए। इससे परिवार पर आया संकट टल गया। मजरूह निश्चिंत होकर जेल चले गए।और देखिए कि जिस गीत के लिए राजकपूर ने सत्तर – बहत्तर बरस पहले एक हज़ार रूपए दिए थे ,वैसी कोई फिल्म दरअसल थी ही नहीं ।पच्चीस तीस बरस बाद यह गीत राज कपूर ने इस्तेमाल किया । जानना चाहेंगे ये कौन सा गीत था – दुनिया बनाने वाले काहे को दुनिया बनाई। मजरूह जब तक ज़िंदा रहे ,राजकपूर को एक भगवान् की तरह मानते रहे। इसके आगे की कहानी कल।

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