राकेश अचल
वैश्विक महामारी कोविड-19 की रोकथाम के लिए बनी भारतीय वैक्सीन में गाय के बछड़े के सीरम का इस्तेमाल किये जाने का विवाद भी जनता को झेलना पडेगा,इसकी कल्पना कभी किसी ने नहीं की थी .दुर्भाग्य ये है कि इस बार इस तरह के विवादों का सहारा कांग्रेस की और से पैदा किया गया है अफवाहें फैलाकर उल्लू सीधा करने के लिए अतीत में बदनाम भाजपा रही है .भाजपा को इस विवाद में कांग्रेस पर हमला करने का पूरा मौक़ा मिल गया है .
कांग्रेस के नेशनल कॉर्डिनेटर गौरव पांधी ने दावा किया कि कोवैक्सीन बनाने में 20 दिन के बछड़े को मारकर उसके सीरम का इस्तेमाल किया जाता है किया है। पांधी ने एक लोक सूचना अधिकार क़ानून के तहत दी गयी अर्जी के जवाब में मिले दस्तावेजके हवाले से ये दावा किया । उन्होंने दावा किया है कि यह जवाब विकास पाटनी नाम के व्यक्ति की अर्जी पर सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन ने दिया है। अब सवाल ये है कि इस कथित रहस्योद्घाटन का मकसद आखिर क्या है ?क्या कांग्रेस कोवैक्सीन को लेकर सरकार को घेरना चाहती है या फिर इस तरह का विवाद खड़ाकर देश के सद्भाव को खराब करना चाहती है ?
पांधी ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने मान लिया है कि भारत बायोटेक की वैक्सीन में गाय के बछड़े का सीरम शामिल है। यह बहुत बुरा है। इस जानकारी को पहले ही लोगों को बताया जाना चाहिए था। सवाल ये है कि क्या ऐसा करना जनहित में जरूरी था ,या ऐसा करना कोई कानूनी बाध्यता थी .क्या सरकार ने जान-बूझकर ये सच छिपाया ?मेरे ख्याल से दुनिया इस हकीकत से वाकिफ है .क्योंकि इससे पहले इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के शोधपत्र में भी ये बात बताई गई थी कि कोवैक्सिन बनाने के लिए नवजात पशु के ब्लड का सीरम उपयोग किया जाता है। इसे पहली बार किसी वैक्सीन में उपयोग नहीं किया जा रहा है। यह सभी बायोलॉजिकल रिसर्च का जरूरी हिस्सा होता है।शोधपत्र में दावा किया जा चुका था कि कोवैक्सिन के लिए नवजात बछड़े के 5 से 10 फीसदी सीरम के साथ डलबेको के मॉडिफाइड ईगल मीडियम को इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि इसमें कई जरूरी पोषक होते हैं, जो सेल को बांटने के लिए जरूरी होते हैं।
ये विवाद उस समय पैदा किया गया है जबकि देश में लगभग 29 करोड़ लोग वैक्सीन लगवा चुके हैं.कांग्रेस ने ये विवाद पैदा तो किया लेकिन इसका कोई ज्यादा असर नहीं हुआ ,किन्तु भाजपा और केंद्र सरकार घबड़ा गयी और उसने भाजपा के प्रवक्ता डॉ संविद पात्रा को कांग्रेस के पीछे लगा दिया .अब कांग्रेस से ज्यादा भाजपा इस विवाद को हवा दे रही है. जिन्हें कांग्रेस के आरोपों के बारे में कोई पता ही नहीं था ,वे लोग ही अब खोज-खोज कर पता कर रहे हैं की आखिर विवाद क्या है ?
मजे की बात ये है कि कांग्रेस के आरोप को लेकर सरकार की और से जबाब आ चुका था,ऐसे में भाजपा के हमलावर होने की कोई जरूरत नहीं थी ,लेकिन भाजपा खामोश होकर कैसे बैठती. भाजपा के सबसे ज्यादा कटखने प्रवक्ता ने सवाल किया है कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी बताएं कि उन्होंने कब वैक्सीन का डोज लिया था। पात्रा का कहना है कि रॉबर्ट वाड्रा ने भी वैक्सीन को लेकर सवाल खड़े किए थे। उनका कहना है कि विश्व की इस त्रासदी में हमें वैज्ञानिक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए न कि भ्रम फैलाना चाहिए।पात्रा ने कहा कि कांग्रेस को वैक्सीन वेस्टेज और हेजिटेन्सी के लिए जाना जाएगा।
आपको बता दें कि कांग्रेस नेता के आरोप के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने सफाई दी है। मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा है कि सोशल मीडिया पर कोवैक्सिन के बारे में गलत जानकारी शेयर की जा रही है। पोस्ट में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है। नवजात बछड़े के सीरम का उपयोग सिर्फ वेरो सेल्स को तैयार करने में किया जाता है, जो बाद में अपने आप ही नष्ट हो जाते हैं। जब अंतिम समय में वैक्सीन का प्रोडक्शन होता है, तब इसका उपयोग नहीं किया जाता है।
मेरे ख्याल से स्वास्थ्य मंत्रालय की सफाई कांग्रेस के कथित आरोप को भस्म करने के लिए काफी थी. भाजपा को इस विवाद में कूदने के लिए कोई जगह थी ही नहीं ,लेकिन कोई किसी से कम नहीं है. कांग्रेस ने जो किया ,भाजपा उससे दो कदम आगे निकल गयी. .कायदे से तो सरकार को कांग्रेस के इस आरोप को अपराध की श्रेणी में रखते हुए पांधी के खिलाफ मामला दर्ज कराना था ,लेकिन सरकार इतना साहस कर नहीं पाई.साहस सरकार के पास तो क्या भाजपा के पास भी नहीं है ,अन्यथा इस विवाद का अंत एक पल में हो जाता .
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में असंख्य उत्पाद ऐसे हैं जो जानवरों के सीरम या अन्य दीगर हिस्सों के इस्तेमाल से तैयार किये जाते हैं ,लेकिन उन्हें कभी शाकाहारी या मासांहारी कहकर विवादों में नहीं घसीटा जाता .न जाने कितने सौंदर्यवर्धक क्रीम,पावडर,नेल पालिश ,तेल इसी श्रेणी में आते हैं ,लेकिन इन्हें लेकर दुनिया में कहीं कोई विवाद नहीं है. ये मूर्खता सिर्फ हमारे यहां ही हो सकती है .अतीत में हम गणेश प्रतिमाओं को दूध तो पिला ही चुके हैं .
जीवन रक्षक दवाओं में क्या इस्तेमाल होता है और क्या नहीं ? ये उत्पाद यदि विवाद का विषय बनाया गया तो मुश्किल हो जाएगी .कम से कम भारत में तो मुश्किल हो ही जाएगी क्योंकि हमारे यहां आस्थाएं जीवन से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं .हम गंगा में बहती लाशों से दूषित हुए जल को अप्रयोज्य नहीं मानते,लेकिन वैक्सीन में सीरम के इस्तेमाल पर सवाल खड़े कर सकते हैं .बेहतर होता की कांग्रेस इस मामले में अपने नेताओं को बरजती .क्योंकि ये विवाद बे-सर-पैर के हैं .
दुनिया में अपनी जान बचने के लिए इंसान किसी भी जानवर की जान का इस्तेमाल कर सकता है. आपको शायद पता हो या न हो लेकिन चीन की पारंपरिक चिकित्सा (टीसीएम ) में जानवरों की 36 तरह की प्रजातियों का इस्तेमाल होता रहा है. इसमें भालू, गैंडे, बाघ और समुद्री घोड़े तक शामिल हैं. इनमें से कई तो अब ख़त्म होने के कगार पर हैं. अभी पैंगोलिन को कोविड-19 के लिए ज़िम्मेदार माना जा रहा है. लेकिन हाल के कुछ समय तक चीन में पारंपरिक चिकित्सा के लिए पैंगोलिन पालन होता था.
दो हजार साल पुराने आयुर्वेदिक चिकित्सा में गठिया के इलाज के लिए सांप के ज़हर का इस्तेमाल किया जाता है. इसी तरह, अफ्रीका, दक्षिणी अमरीका और एशिया में टेरेंटुला नाम की ज़हरीली मकड़ी का इस्तेमाल कई तरह की बीमारियां ठीक करने में किया जाता है. इसमें दांत का दर्द और कैंसर जैसे मर्ज़ भी शामिल हैं.
आप रोजाना जो कैप्सूल कहते हैं उसका आवरण ही जिस प्रोटीन से बनता है वो जानवरों से मिलता है कैप्सूल में काम आने वाला प्रोटीन जानवरों के शरीर से निकाला जाता है. मरने के बाद जानवरों की हड्डियों और चमड़ी को डीहाइड्रेट करने पर जिलेटिन मिलता है.लेकिन इसे लेकर कभी कोई विवाद खड़ा नहीं किया जा सका .
@ राकेश अचल

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