‘चली गोरी मेला खों साइकल पे बैठ’ कहने वाले देशराज पटैरिया चले गए, 67 साल की उम्र में निधन

भोपाल. शिवकुमार विवेक

. बुंदेली लोक गायन के सम्राट देशराज पटैरिया एक ऊँचे सिंहासन पर बैठकर आज शनिवार को उसे खाली छोड़ गए। उन्होंने लोक संगीत का वो सुनहरा दौर जिया, जो अब स्मृतियों में ही मिलेगा। उनके जाने के साथ बुंदेली लोकगायकी की उम्मीदों और संभावनाओं को भी बड़ा झटका लगा है।

मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के छतरपुर के सपूत ने 67 वर्ष की उम्र में आज तड़के देह त्यागी। पिछले कुछ दिन से लकवा के कारण उनकी गतिविधियाँ बंद हो गईं थी लेकिन संगीत में साँस लेते हुए झाँसी के अस्पताल से अंतिम यात्रा पर चले गए। पटैरिया मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड के शिखर गायक थे। उनकी ऊँचाई पाना नई पीढ़ी के लिए सपने की तरह है। उन्होंने दस हजार से ज्यादा लोकगीत गाए और बुंदेलखंड के गाँव-गाँव में लोगों के होंठों पर उनके गीत आज भी सुने जा सकते हैं। लगभग दो दशक तक उनकी सह कलाकार उर्मिला पांडे कहती हैं-’पटैरिया जी के जाने से सचमुच बुंदेलखंड को वह नुक़सान हुआ है, जिसे निकट भविष्य में भरना मुश्किल है। वे बुंदेली गायन के राष्ट्रीय स्तर के कलाकार थे और बुंदेली लोक विधा को राष्ट्रीय स्तर पर ऊँचा स्थान दिलाने का सपना लेकर चले गए।’ 

देशराज पटैरिया ने बुंदेली लोकगायन का अपना स्वरूप गढ़ा था जो उनकी लोकप्रियता की वजह था तो उसी ने उन्हें विवादास्पद भी बनाया। उन्होंने नई पीढ़ी को इस पारंपरिक कला की तरफ खींचने के लिए और जनता को ज्यादा से ज्यादा शामिल करने के लिए लोकगीत के कार्यक्रमों में मनोरंजन का तत्व डाला जिससे हल्केपन और कभी-कभी अश्लीलता के आरोप भी लगे। डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के संगीत, कला व पत्रकारिता विभाग अध्यक्ष व आकाशवाणी छतरपुर में कार्यक्रम अधिकारी रहे डॉ. ललित मोहन ने बताया कि पहले केवल गायकी होती थी, पटैरियाजी ने गीतों में हास्यबोध को शामिल किया और वह चल गया। आज बुंदेलखंड के तमाम गायक इसी राह पर चल रहे हैं। इस दृष्टि से वे एक परंपरा के प्रवर्तक थे जिसने लोकगायकी को नया जीवन दिया। यह समीक्षा का विषय है कि इससे हमारी मूल परंपरा को कितना नुक़सान पहुँचा। 

देशराज जी का जन्म नौगाँव कस्बे के पास तिंदनी गाँव में हुआ था। 18 साल की उम्र से ही वे कीर्तन मंडलियों में शामिल होकर गाँव-गाँव जाने लगे। गाँवों में बुंदेली लोकगीतों की लोकप्रियता ने उन्हें खींचा और 1976 से वे लोकगीत गाने लगे। छतरपुर में 1971 में रेडियो स्टेशन की स्थापना ने उन्हें एक और मंच दिया। यह रेडियो स्टेशन मप्र व उप्र के दस से ज्यादा जिलों में स्थानीय (बुंदेली) समाज व संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए खोला गया था। बाद में वे इसके अभिन्न हिस्सा बन गए। इस स्टेशन पर सोलह साल तक संगीत कंपोजर रहे रमेश इंदु बासु देशराज से जुड़े क़िस्सों से सराबोर हैं। वे बताते हैं-हमने उनका जलवा देखा। वे बुंदेली गायकी के राजा थे। हम ग्रामीण क्षेत्रों में मंच से देखते थे तो लोग ही लोग नजर आते थे।वे ज्यादा शिक्षित नहीं थे लेकिन वे लोक को जानते थे और लोक कला पर उनकी ज़बरदस्त पकड़ थी।

पिछले कुछ समय से उनके कार्यक्रम बंद थे जिसका उन्हें दर्द था। उन्हें एक और दर्द था-बुंदेली को अपेक्षित पहचान न मिलना। इस पहचान के लिए वे पृथक बुंदेलखंड के आंदोलन के मंच तक से जुड़े। लेकिन यह भी सच है कि हाल के वर्षों में लोक संगीत की लोकप्रियता क्षीण हुई है। इसके लिए हिंदी सिनेमा के गीत-संगीत को ज़िम्मेदार मानें, स्थानीय बोलियों व कलाओं से नई पीढ़ी की अनभिज्ञता को अथवा इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की प्राथमिकताओं में बदलाव को। 

छतरपुर में दैनिक भास्कर छतरपुर के संपादक आशीष खरे कहते हैं कि बुंदेली संस्कृति को पहचान देने में देशराज का बड़ा योगदान है। उन्होंने लोकगीतों में संवाद, खासतौर पर क़व्वाली की तरह दुतरफ़ा संवाद की शैली का बख़ूबी इस्तेमाल किया। लेकिन लोकगीतों का प्रचलन कम होने के साथ ही कलाकारों की स्थिति में भी अंतर आया है। इसलिए देशराज को बुंदेली लोकगायन की संस्कृति का आखिरी चिराग़ कह सकते हैं। आधुनिकता की आड़ में लोकगीत कैसे अस्तित्व बरक़रार रखें, यह बड़ा सवाल है। लोकगीत रहेंगे तभी कलाकार रहेंगे। उपेक्षा की बात की आशीष भी ताकीद करते हैं। वे देशराज को कम से कम पद्मश्री का पात्र तो मानते ही हैं। सरकार क्या देशराज की स्मृतियों के साथ इस ओर ध्यान देगी। 

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