स्मृति शेष

@ राकेश अचल

मध्यप्रदेश के प्रमुख हिंदी दैनिक आचरण के संस्थापक सम्पादक श्री एएच कुरैशी अचानक सबको छोड़कर अनंत यात्रा पर निकल गए और इसके साथ ही ग्वालियर में अपनी जिद और जिंदादिली से अखबार चलाकर दिखने वाले एक चर्चित चरित्र की यात्रा पर पूर्ण विराम लग गया .कुरेशी जी ने बिना कलम चलाये भी अपने अखबार के जरिये हिंदी पत्र्कारिता को अनेक पुरोधा पत्रकार दिए .पत्रकारों के लिए उनके अखबार का दफ्तर एक आश्रय स्थल से कम न था .
एएच कुरेशी का पूरा नाम अनवर हुसैन कुरैशी था .उनके हम उम्र लोग उन्हें घर के नाम अन्नू से पुकारते थे .उन्हें अन्नू कहकर पुकारने वाले लोगों में से शायद ही अब कोई ज़िंदा बचा हो .उन्होंने आठवें दशक के आरम्भ में एक साप्ताहिक अखबार के जरिये अपनी यात्रा शुरू की थी. वे पूरा समय अखबार के प्रबंधन में व्यस्त रहते थे इसलिए उनकी कलम बहुत धारदार नहीं हो पायी थी लेकिन उन्होंने तमाम धारदार कलमें अपने लिए जमा करने का हुनर हासिल कर रखा था .
कुरैशी जी से मेरा परिचय आपातकाल के दिनों से था.उन दिनों उन्होंने अपने साप्ताहिक अखबार को अचानक दैनिक कर दिया था. नगर कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ धर्मवीर शर्मा की अनुकम्पा उन्हें हासिल हो गयी थी. दैनिक आचरण पहले चार पृष्ठ का निकला,फिर उसमें दो पन्ने और जुड़ गए .कुरैशी जी जिद के पक्के थे. दैनिक भास्कर के स्वामी सेठ द्वारिका प्रसाद अग्रवाल अघोषित रूप से उन्हें प्रेरणा देते थे हालांकि कुरैशी जी उन्हें ही अपना प्रतिद्वंदी भी मानते थे .इसी अखबार को मिले डॉ राम विद्रोही .विद्रोही जी का साप्ताहिक स्तम्भ ‘इक तारा बोले ‘ ने आचरण को खूब चर्चित बना दिया था .मै उन दिनों छात्र था और अक्सर सम्पादक के नाम पत्र और अपनी तुकबंदी की कविताएं लेकर दैनिक आचरण में जाता रहता था .भास्कर लाइन में ही मुल्तन भवन के एक हिस्से में आचरण का दफ्तर था .
किस्मत का खेल देखिये की जून 1979 में मेरे मित्र बच्चन बिहारी ने मुझे जेबखर्च दिलाने की शर्त पर इसी दैनिक आचरण में नौकरी दिलाई,जो दूसरे दिन ही मेरी एक खबर प्रकाशित होने के बाद चली गयी .दूसरे दिन जब मै अखबार के दफ्तर पहुंचा तो कुरैशी जी दफ्तर के बाहर खड़े सिगरेट के कश मार रहे थे.उन्हें जैसे मेरा ही इन्तजार था .मुझे देखते ही फट पड़े और लगभग गरियाते हुए मुझे बैरंग कर दिया .मै भी उलटे पांव वापस हो गया.तीसरे दिन ही उन्होंने बच्चन बिहारी के जरिये मुझे फिर अखबार के दफ्तर में बुला लिया .पगार थी मात्र 150 रूपये .
बहरहाल 1979 से 2006 तक मै दैनिक आचरण में लगभग 6 मर्तबा नौकरी से निकला गया और वापस रखा गया .कुरेशी जी में जितनी अकड़ थी उतनी ही विनम्रता भी थी. वे नौकरी छोड़ने पर पत्रकारों को वापस बुलाने के लिए उनके चूल्हे तक संपर्क करने से भी नहीं हिचकते थे .कम से कम मुझे और डॉ विद्रोही को तो उन्होंने इसी तरह बार-बार वापस बुलाया .डॉ विद्रोही ने 1984 में कुरैशी जी के आग्रह पर ही राजस्थान पत्रिका की नौकरी छोड़कर पूरे एक दशक बाद ग्वालियर वापस आकर दैनिक आचरण ज्वाइन किया था. दैनिक आचरण को दैनिक आचरण बनाने में स्वर्गीय काशीनाथ चतुर्वेदी और डॉ विद्रोही की भूमिका रेखांकित करने योग्य है .कुरेशी जी ने भी दोनों को अपने पिता तुल्य मानकर ही अपने साथ जब तक बन पड़ा जोड़ कर रखा और रिश्ते निभाए .
कुरैशी जी और मै ग्वालियर प्रेसक्लब से कोई दो दशक जुड़े रहे .कई मामलों में वे जिद्दी भी थे .हमारे बिच मुकदमेबाजी भी हुई,अनबोला भी रहा,लेकिन सब अस्थायी रहा.,बाबजूद हमारा उनका रिश्ता कभी टूटा नहीं . उन्हें प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी,अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह के अलावा माधवराव सिंधिया जैसे दिग्गजों का अपार स्नेह मिला .इन रिश्तों को निभाने के फेर में वे आरोपित भी हुए,अनेक अवसरों पर उन्होंने अपने प्रिय पत्रकारों को इसी वजह से खोया भी लेकिन उन्होंने दैनिक आचरण को एक समय प्रदेश में पहचान दिलाकर ही चैन की सांस ली. वे दैनिक आचरण को बहुसंस्करणीय बनाना चाहते थे. भोपाल और सागर संस्करण शुरू भी हुए,लेकि बाद में सागर संस्करण उन्होंने बेच दिया,भोपाल संस्करण भी जैसे तैसे जीवित रहा .
उम्र ढलने के साथ ही वे अखबार की तरफ से उदासीन हुए और दूसरे व्यवसाय में रत हो गए.अखबार भी उनकी अभिरुचि के अभाव में कमजोर हो गया ,लेकिन जब तक कमान उनके पास आ रही दैनिक आचरण का स्वरूप पत्रकारिता के एक स्कूल का बना रहा .दैनिक आचरण ने शहर के हर जरूरतमंद पत्रकार को आसरा दिया .दूसरे अखबार ये सब नहीं कर पाए .कुरेशी जी के समर्पण की अनेक दास्ताने हैं .वे समय पर अखबार के स्टाफ को वेतन देने के लिए कितने पापड़ बेलते थे,ये मै और मेरे अलावा बहुत कम लोग जानते हैं .
बढ़ती स्पर्धा में आचरण यद्द्पि पिछड़ गया लेकिन उन्होंने अखबार के जरिये अखबार की और अपनी एक अलग हैसियत और पहचान बनाई जो हर किसी को नसीब नहीं होती .वे न नाम के लिए बैचेन हुए और न बदनामी से भयभीत हुए .वे स्टाफ के साथ हमेशा पारिवारिक प्रमुख की तरह ही पेश आये. ईद पर उनके घर पर जो महफ़िलें सजतीं थीं वे अब कभी नहीं सजेंगी ,क्योंकि लोगों को नाराज करने और उन्हें मानाने वाले कुरैशी जी अब नहीं हैं .मै अधिकार पूर्वक कह सकता हूँ कि दैनिक आचरण उनका एक सपना था ,जिसे उन्होंने अपनी पूरी क्षमता से साकार भी किया .मेरे लिए तो दैनिक आचरण पत्रकारिता की पहली पायदान थी .और कुरैशी जी मेरे पहले अभिभावक .मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि उन्हें अपने चरणों में स्थान थे. विनम्र श्रृद्धांजलि .

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