डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू

ज से ५२०० वर्ष पूर्व मथुरा जिले के गोकुल-महावन कस्बे के निकट “रावल गांव” में वृषभानु एवं कीर्ति देवी की पुत्री के रूप में राधारानी का प्राकट्य हुआ था। राधा रानी के जन्म के संबंध में यह कहा जाता है कि राधारानी मां के उदर से नहीं जन्मी थी, उनकी माता ने अपने गर्भ में “वायु” को धारण कर रखा था। और योग माया की प्रेरणा से वायु को ही जन्म दिया, परंतु वहाँ स्वेच्छा से श्री राधारानी प्रकट हो गईं।

श्री राधारानी कलिंदजाकूलवर्ती निकुंज प्रदेश के एक सुंदर मंदिर में अवतीर्ण हुईं थी। भाद्रपद का महीना था, शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि, अनुराधा नक्षत्र, मध्यान्ह काल १२ बजे और सोमवार का दिन था। उस समय राधारानी के जन्म पर नदियों का जल निर्मल हो गया। सम्पूर्ण दिशाएं और वातावरण प्रसन्न, शीतल हो गया था।

वृषभानु और कीर्ति देवी ने पुत्री के कल्याण की कामना से आनंददायिनी दो लाख उत्तम से उत्तम गऊएं ब्राह्मणों को दान में दीं। ऐसा भी कहा जाता है कि एक दिन जब वृषभानुजी महाराज एक सरोवर के पास से जा रहे थे, तब उन्हें एक बालिका “कमल के फूल” पर तैरती हुई मिली, जिसे उन्होंने पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया।

श्री राधारानी आयु में श्री कृष्ण से ११ माह बडी हैं। लेकिन श्री वृषभानुजी और कीर्ति देवी को ये बात जल्द ही पता चल गई कि श्री राधारानी ने अपने जन्म से ही आँखे नहीं खोली हैं। इस बात से वे बड़े दुःखी हुए। कुछ समय पश्चात जब नंद महाराज और यशोदा गोकुल से अपने लाड़ले के साथ श्री वृषभानु के महल आए, तब वृषभानुजी और कीर्तिजी ने बड़े हर्षोल्लास के साथ उनका स्वागत किया। यशोदा नन्हे कान्हा को राधारानी के कक्ष में ले आईं और जैसे ही कान्हा और राधारानी आमने-सामने आए, तब श्री राधारानी ने पहली बार अपने नेत्र खोले।

अपने प्राण प्रिय श्री कृष्ण को देखने के लिए वे एकटक कृष्ण को ही देखती रहीं। अपनी प्राण प्रिय को सामने देख और एक अलौकिक सुंदर बालिका के रूप में देखकर श्री कृष्ण भी, स्वयं बड़े आनंदित हुए।

जिनके दर्शन बड़े बड़े देवताओं के लिए भी दुर्लभ है, तत्वज्ञ मनुष्य सैकड़ो जन्मों तक तप करने पर भी जिनकी झाँकी नहीं पाते, वे ही श्री राधिका अब वृषभानु के यहाँ साकार रूप में प्रकट हुई हैं। गोप ललनाएँ जब उनका पालन करने लगी, स्वर्ण जड़ित और सुंदर रत्नों से रचित चंदन चर्चित पालने में सखीजनों द्वारा नित्य झुलाई जाती हुई श्री राधारानी प्रतिदिन शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की कला की भांति बढ़ने लगी। श्री राधा क्या हैं – रासलीला की रंग स्थली को प्रकाशित करने वाली चन्द्रिका, वृषभानु मंदिर की दीपावली, गोलोक की चूड़ामणि, श्री कृष्ण की हारावली, आह्लादिनी शक्ति हैं।

(लेखक भारतीय विद्याओं के विद्वान हैं)

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