शिवकुमार विवेक

 

भाजपा ने बड़ा कदम उठाकर न केवल चौंकाया बल्कि राजनीतिक दलों को हैरत में डाला। अब उन पर भी नए नेतृत्व को सामने लाने का दबाव बढेगा, जिसे भाजपा की तर्ज पर कम करने की कसरत करना उनके लिए संभव नहीं होगा क्योंकि भाजपा में हटाए गए नेता अनुशासन की बिना पर उफ भी नहीं करते, अन्य पार्टियों का प्याला ही फूट जाएगा।

इस ‘गुजरात मॉडल’की चर्चा भी करनी होगी। यद्यपि इससे काफी लोग डर रहे हैं। विरोधी इसको अपने यहां लाने का जोखिम लेने तैयार नहीं हैं तो भाजपा के एक वर्ग के भीतर इसके विस्तार को लेकर भय है लेकिन जिनकी राजनीति इससे किसी तरह से प्रभावित नहीं होगी और जो राजनीति के प्रेक्षक हैं, वे इस पहल के पीछे के साहस और प्रयोगधर्मिता को सराह रहे हैं। परिणामों पर दोनों ही सोच वालों की गहरी नजर है। भाजपा ने गुजरात में ‘सारे घर के बदल डालेंगे’ वाले अंदाज में सरकार से सारे पुराने चेहरों को विदा करके एकदम नए विधायकों को सत्ता की कमान सौंप दी है। राज्य विधानसभा चुनाव के एक साल पहले की गई इस पहल से प्रशासन कितना प्रभावित होगा और राजनीति में इस नई बयार का क्या असर होगा-यह कसौटी पर है। यदि यह प्रयोग सफल साबित हुआ तो राजनीति की दशा-दिशा बदलना तय है।

भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में पुराने नेताओं को विदा कर सर्वथा नए चेहरों का मंत्रिमंडल बनाया है। चुनाव के मुहाने पर यह बड़ा जोखिम है जिसे भाजपा ‘लोकतांत्रिक प्रयोग’ कह रही है।  इसने जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ‘साहसिक’ छवि को मजबूत किया है, वहीं भाजपा में नए नेतत्व को तैयार करने की राह भी दिखाई है। नए मंत्रिमंडल की औसत आयु 53.4 वर्ष है जबकि पिछले मंत्रिमंडल की औसत उम्र 60.5 वर्ष थी। इस तरह यह पहले से युवा मंत्रिमंडल है। इससे बढ़कर बात यह है कि दो-तीन को छोड़कर सारे ही चेहरे नए हैं। खुद मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल पहली बार के विधायक हैं। ऐसे में प्रशासनिक अनुभव की कमी आड़े आ सकती है लेकिन बदले में नई ऊर्जा,उत्साह और कार्यशैली में नयापन आएगा,वहीं पुराने चेहरों से जनता की जो कुछ भी नाराजी या नापसंदगी होगी, उसे दूर करने में मदद मिलेगी जो चुनावी जरूरत है। माना जा रहा है कि भाजपा ने इस कदम से सत्ता विरोधी रुझान (एंटी इनकंबेंसी) को एक झटके में दूर कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नए मंत्रियों को ‘आउटस्टैंडिग कार्यकर्ता’ कहा है।

लेकिन यह बड़ा साहस भरा फैसला है और यह केवल नरेन्द्र मोदी ही कर सकते हैं। राजनीतिक दल पुराने नेताओं को हटाकर असंतोष और भितरघात के खतरे को झेलने से डरते हैं। इसलिए थोड़ा बहुत फेरबदल करते हैं। कांग्रेस तो राज्य में उन पुराने नेताओं की जगह पिछले तीन साल में नहीं भर पा रही है जिन्होंने स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी को मिला पराजय के बाद त्यागपत्र दे दिए थे। राज्य के नेतृत्व को लेकर भी वह फैसला नहीं कर पा रही है। हार्दिक पटेल को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया तो पुराने स्थापित नेता नाराज हो गए। अब न वे पूरी ताकत से काम करते, न हार्दिक किसी चमत्कार का प्रदर्शन कर पाए हैं।

ऐसे में भाजपा ने बड़ा कदम उठाकर न केवल चौंकाया बल्कि राजनीतिक दलों को हैरत में डाला। अब उन पर भी नए नेतृत्व को सामने लाने का दबाव बढेगा, जिसे भाजपा की तर्ज पर कम करने की कसरत करना उनके लिए संभव नहीं होगा क्योंकि भाजपा में हटाए गए नेता अनुशासन की बिना पर उफ भी नहीं करते, अन्य पार्टियों का प्याला ही फूट जाएगा। भाजपा ने बीस साल पुराने धाकड़ मंत्रियों को एक झटके में हटा दिया। उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल को घऱ भेज दिया। एक दिन इन नेताओं में सुगबुगाहट हुई, जिसके कारण शपथ समारोह को एक दिन टाला गया लेकिन बाद में सबने इस दुस्साहसिक प्रयोग को स्वीकार कर लिया।

केरल में इसी वर्ष हुए निकाय चुनाव में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने स्थापित नेताओं के टिकट काटकर युवाओं को, यहां तक छात्रों को मैदान में उतारा था। तिरुवनंतपुरम जैसे नगर निगम की महापौर एक छात्रा बनी। इसका प्रभाव राज्य विधानसभा के चुनाव में दिखाई दिया जिसमें कांग्रेस के सत्ता में आने की संभावनाएं खत्म हो गईं, जिसकी इस बार बारी थी। भाजपा ने इसी प्रयोग को बड़े स्तर पर लागू किया है। इस तरह राजनीतिक दलों और राज्यों में पार्टियों के शरमाएदारों को सोचने और समझने की चुनौती खड़ी कर दी है।

गुजरात में भारतीय जनता पार्टी 1995 से सत्ता में काबिज है। 2017 में उसके सामने तब अपने भविष्य को लेकर चिंता खड़ी हो गई जब उसे 185 में से 99 सीटें ही मिलीं। इस चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत एक फीसदी जरूर बढ़ा था, लेकिन 22 साल बाद उसकी सीटें सौ के नीचे चली गई थीं। इससे पहले 1995 में भाजपा को 121 सीटों पर जीत मिली थी। इसके बाद 1998 में भाजपा को 117, 2002 में 127, 2007 में 117, 2012 में 115 सीटें मिली थीं। हालांकि इसके पहले भी भाजपा चुनावों के गणित को ध्यान में रखकर मुख्यमंत्री बदलती रही है लेकिन इस बार पहली बार पूरी टीम बदली है। भाजपा का यह प्रयोग आने वाले विधानसभा चुनाव में क्या रंग लाएगा, यह परिणामों से पता चलेगा लेकिन राजनीति में यह प्रयोग बड़े गहरे निशान छोड़ेगा। इस प्रयोग ने दूसरे राज्यों में भी भाजपा के भीतर मंथन शुरू किया है और नए नेताओं के भीतर संभावनाओं के बीज पनपे हैं तो पुराने नेताओं पर  अपनी छवि सुधारने का दवाब बढ़ा है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। )

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