– रंजना चितले

र्तमान में जबलपुर नगर का हिस्सा बने पुरवा ग्राम में, जो जबलपुर से चार मील दूर स्थित था, इसी गांव में राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह का निवास था। यहीं रहकर उन्होंने गुप्त रूप से 1857 महासंग्राम में सैनिकों को क्रांति में भाग लेने के लिये प्रेरित किया। क्रांति योजना राजा शंकरशाह के निवास पर ही बनी। जबलपुर की 52वीं रेजीमेंट के सिपाही इस सिलसिले में अक्सर राजा शंकरशाह के घर जाया करते थे। अपने क्रांतिकारी साथियों और 52वीं रेजीमेंट के सैनिकों के साथ मिलकर पिता–पुत्र ने क्रांति योजना बनायी। मुहर्रम के दिन केन्टोनमेंट पर आक्रमण करना सुनिश्चित किया गया। लेकिन भारतीय इतिहास का नकारात्मक पक्ष पुन: प्रभावी हुआ। देश के गद्दार ने यह सूचना अंग्रेजों तक पहुंचा दी। गद्दार खुशहाल चन्द के अलावा अन्य दो जमीदारों ने भी गद्दारी की। कुल मिलाकर योजना में सेंध लगी और डिप्टी कमिश्नर ने षड्यंत्र रचा। उसने एक तरफ सुरक्षा बढ़ाई, दूसरी ओर सैनिकों के असंतोष के स्त्रोत का पता लगाने के लिये गुप्तचरों का जाल बिछाया, तीसरा राजा शंकरशाह के विरुद्ध प्रमाण तलाशना शुरु किया।

सुनियोजित योजना बनाकर फकीर वेश में एक गुप्तचर राजा के पास भेजा। चूंकि 1857 के महासंग्राम में संन्यासी फकीरों की महत्वपूर्ण भूमिका थी अत: राजा ने उस फकीर को क्रांति मार्ग का पथिक मान अपनी संपूर्ण योजना बना दी।गुप्तचार से सूचना मिलते ही 14 सितम्बर 1857 को डिप्टी कमिश्नर अपने लाव–लश्कर के साथ राजा शंकरशाह के गांव पुरवा पहुंचा। कमिश्नर के साथ आये 20 सवारों और अन्य सिपाहियों ने गाँव की घेराबंदी कर राजा, उनके पुत्र व अनुयायियों सहित 13 लोगों को गिरफ्तार किया। राजा के घर की तलाशी ली गयी। इसमें क्रांति संगठन के दस्तावेजों के साथ राजा शंकरशाह द्वारा लिखित एक कविता मिली। यह कविता अपनी आराध्य देवी को संबोधित कर लिखी गयी थी। वह कविता थी–

मूंद मुख डंडिन को चुगलौं को चबाई खाई

खूंद डार दुष्टन को शत्रु संघारिका

मार अंगरेज, रेज कर देई मात चंडी

बचै नाहिं बैरी–बाल–बच्चे संघारका॥

संकर की रक्षा कर, दास प्रतिपाल कर

दीन की पुकार सुन आय मात कालका

खाइले मलेछन को, देर ना करौ मात

भच्छन कर तच्छन बेग घौर मत कालिका॥

इसी तरह की प्रार्थना उनके बेटे रघुनाथशाह की हस्तलिपि में भी थी। दोनों क्रांतिवीर पिता–पुत्र को बन्दी बनाकर सैनिक जेल में रखा गया। राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह की गिरफ्तारी से सैनिकों और जनता में आक्रोश बढ़ गया। उन्हें छुड़ाने की कोशिश भी की गयी लेकिन सफल नहीं हो सके। अंग्रेजों को भय था कि यदि राजा शंकरशाह आजाद हो गये तो उनके नेतृत्व में क्रांतिकारी पुन: एकत्र हो जायेंगे। तुरंत डिप्टी कमिश्नर और दो अंग्रेज अधिकारियों की एक औपचारिक सैनिक अदालत बैठायी गयी। अदालत में देशद्रोही रूपी कविता लिखने के जुर्म में राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह को मृत्युदण्ड की सजा सुनाई गयी।

दुनिया में साहित्य सृजन को लेकर दी जाने वाली यह अमानवीय, अनोखी सजा थी। क्रांतिकारी राजा और उनके पुत्र को मृत्युदण्ड फांसी पर चढ़ाकर न दिया जाकर तोप से उड़ाना सुनिश्चित किया गया। अत: 18 सितम्बर 1857 को जबलपुर में एजेंसी हाउस के सामने फाँसी परेड हुई। राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह को जेल से लाया गया और तोप के मुंह से बांध दिया गया। दोनों के चेहरे आत्मविश्वास से परिपूर्ण थे। राजा को देखने अपार जनसैलाब उमड़ पड़ा। भीड़ उत्तेजित थी। राजा शंकरशाह ने अराध्यदेवी से प्रार्थना की कि वे उनके बच्चों की रक्षा करें ताकि वे अंग्रेजों का देश निकाला कर सके। शीघ्र ही तोपचियों को तोप दागने की आज्ञा दी गयी। तोप चलते ही दोनों के अंग क्षत–विक्षत होकर चारों ओर बिखर गये।

रानी ने अधजले अवशेष को एकत्र कर उनका विधिवत अंतिम संस्कार किया। अंग्रेज राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह को तोप से उड़ा क्रांति की आग बुझाना चाहते थे लेकिन वह आग बुझी नहीं बल्कि दवानल बन गई। 52वीं रेजीमेंट के सैनिक उसी रात क्रांति की राह पर चल दिये।

Spread the love

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here