@ राकेश अचल 
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की कथित आत्महत्या के मामले पर पड़े परदे उठाने के लिए उत्तर प्रदेश की सरकार और पुलिस हलकान है। दरअसल भारत में महंती केवल मंदिरों ,मस्जदों में ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र में अपनी इतनी गहरी पैठ बना चुकी है कि किसी भी क्षेत्र की महंती की यदि एक ईंट खिसकती है तो भूचाल सा आजाता है। महंती एक समानांतर सत्ता का लघु रूप है और इसे पाने के लिए मुगलिया सल्तनत में होने वाली मारकाट,उठापटक चलती ही रहती है।
महंत नरेंद्र गिरी की आत्महत्या के मामले में पिछले दिनों में बहुत कुछ सूचनाएं हमारे सामने हैं,लेकिन जो सामने नहीं है वो है इस महंती को पालने-पोसने वाली अदृश्य शक्तियों की कहानियां। इनके ऊपर पड़ा पर्दा न सरकार उठाएगी और न पुलिस ,मीडिया द्वारा ये पुण्य कार्य किये जाने की तो आप कल्पना ही मत कीजिये। संयोग ये है कि महंत नरेरंद्र गिरी और उनके मार्डन शिष्य आनंद गिरी से मुझे मिलने का मौक़ा मिला है। उनके बारे में मुझसे अधिक जानने वाले इलाहाबाद और इलाहाबाद इ बाहर बहुत से लोग हैं ,लेकिन बोलेगा कोई नहीं।
देश में इस समय अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की महंती के अंत के बाद भी एक दर्जन ऐसे अखाड़े हैं जिनके महंत अपनी सत्ता को बचाये रखने के लिए दिन-रात संघर्षरत रहते हैं। इस समय कुल 13 अखाड़े हैं. इनमें से आवाहन अखाड़ा, अटल अखाड़ा, महानिर्वाणी अखाड़ा, आनंद अखाड़ा, निर्मोही अखाड़ा, दशनामी, निरंजनी और जूना अखाड़ा साजिशों के अखाड़े हैं ,ये बात अलग है की इन अखाड़ों की अंतर्कथाएं अभी छनकर बाहर नहीं आयीं हैं। ये अखाड़े नहीं धर्म के नाम पर नोट छापने के कल-कारखाने हैं। मुमकिन है कि इन अखाड़ों के प्रति अगाध शृद्धा रखने वालों को मेरी ये बात चुभे लेकिन हकीकत तो हकीकत है।
महंत नरेंद्र गिरी ने आत्महत्या कर ली क्योंकि वे दबाब नहीं झेल पाए लेकिन दूसरे अखाड़ों के महंत भी नींद की गोलियां खाकर ही सोते हैं ऐसा आप मानकर चलिए। अखाड़ा प्रमुखों के सर पर चौबीसों घंटे खतरे की तलवार लटकी रहती है। इस तलवार से बचने के लिए बेचारे महंत कितने आसन लगाते हैं आप कल्पना नहीं कर सकते। महंतों को सत्ता और अपने संरक्षकों के बीच मध्यस्थता का काम करना पड़ता है। ये काम धर्म की स्थापना के लिए नहीं बल्कि अखाड़ों की सत्ता को अक्षुण रखने के लिए किया जाता है। भगवा धारण करना महंती की विवशता ही नहीं अनिवार्यता है लेकिन इस भगवे के पीछे आखिर एक मनुष्य देह ही होती है जो आनंद गिरी की तरह वो सब सुख चाहती है जो महंती में वर्जित हैं।
महंत नरेंद्र गिरी और आनंद गिरी के बीच क्या हुआ ये सच कोई सरकार और पुलिस सामने नहीं ला सकती । लाएगी भी नहीं क्योंकि ऐसा करने से शेष अखाड़ों की सत्ता भी अविश्वसनीय हो जाएगी। कोई सरकार ये जोखिम उठा नहीं सकती,खासतौर पर आज की उत्तर प्रदेश की सरकार ,क्योंकि इस सरकार के प्रमुख भी एक मैथ के महंत हैं और जानते हैं कि महंती कितनी जरूरी और कीमती चीज है। इसलिए बेहतर है की धर्मभीरु लोग पूरे किस्से को भूलना शुरू कर दें ,अन्यथा ये किस्सा भी सिनेमा के एक युवा किरदार सुशांत सिंह राजपूत की तरह लंबा खिंचेगा और अंत में निकलेगा चू,,, चूं का मुरब्बा ही।
इस समय राजनीति,समाजसेवा,शिक्षा,साहित्य के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी महंती धड़ल्ले से चल रही है। इस महंती को राजसत्ता का खुला संरक्षण प्राप्त है। जहाँ ये रिश्ते बिगड़ते हैं,वहां महंती खतरे में पड़ जाती है। कमजोर महंत आत्महत्या कर लेते हैं और मजबूत महंत परिस्थितियों से तालमेल बैठा लेते हैं। भारत के ये महंत न संत होते हैं और न साधू। आप इन्हें खुलकर शैतान कह नहीं सकते,क्योंकि ये सब भगवा धारण करते हैं। नरेंद्र गिरी की आत्महत्या के बाद अति उत्साही लोग मठों,मंदिरों,और दुसरे पूजाघरों की सम्पत्ति का राष्ट्रीयकरण करने की बाल सुलभ मांग करते हैं। ऐसी मांगें सुनकर हँसी आती है,क्योंकि ऐसी मांग करने वाले नहीं जानते की महंती को चुनौती देना किसी भी राजसत्ता के लिए आसान काम नहीं है।
फिलहाल देश को आत्महत्या करने वाले महंत की आत्मा की चिर शांति के लिए प्रार्थना और आरोपी संत के लिए न्याय की कामना करना चाहिए। ये तय ही की सजा किसी को नहीं मिलेगी,जिसे मिलना थी उसे मिल गयी। सजा का वरण करने का साहस बहुत कम लोगों में होता है । महंत नरेंद्र गिरी में ऐसा साहस था। वे समाज का सामना करने की स्थिति में होते तो अपने लिए जीवन की समाप्ति की अघोषित सजा का वरण न करते।

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