अशोक सोनी

उत्तरप्रदेश में पांच माह बाद होने वाले विधान सभा चुनाव में विभिन्‍न राजनीतिक दल जिस प्रकार जातीय आधार पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं ये चुनाव के दौरान और चुनाव के बाद राज्‍य में जातीय वैमनस्‍य को बढ़ावा नहीं देगें। कोई हर हर महादेव और अल्‍लाहू अकबर के नारे लगा रहा है तो कोई जय श्री राम और कोई जय परशुराम कर रहा है। आश्‍चर्य की बात तो यह है कि देश को आजादी मिलने के बाद आरक्षण रूपी जो जहरीले बीज बोए गए थे वे बीच अब बड़े पेड़ बन गए है और उसकी शाखाएं चारों ओर फेलने लगी हैं लेकिन इस बार जिस प्रकार राजनीतिक दलों ने खुलकर जातियों को साधने के लिए हथकंडे अपनाए जा रहे है वह निश्चित तौर पर आपसी वैमनस्‍य को और बढ़ाएंगे। हालांकि पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी ने वहां हुए चुनाव में हिन्‍दू मुस्लिम और स्‍थानीय तथा बाहरी का जहर फेला कर इसकी शुरूआत कर दी थी वहीं अब यूपी चुनाव में जातिगत राजनीति का बोलबाला रहेगा।

यूपी वैसे भी जातिवाद का पौषक राज्‍य रहा है पहले भी यहां चुनाव में जातीय गणित बिठाए जाते रहे है लेकिन इस बार राजनीतिक दलों यह समझ लिया है कि हिन्‍दू वोटों को साधने के लिए जातियों का सहारा लेना जरूरी है इसके बिना चुनाव में सफलता पाना आसान नहीं होगा। यूपी में इसकी शुरूआत सबसे पहले बसपा ने ब्राह्मणोें को अपने पक्ष में करने के लिए ब्राह्मण सम्‍मेलन का राज्‍य भर में आयोजन किया तो समाजवादी पार्टी भी भगवान परशुराम का आसरा लेकर ब्राहमणों को साधने में जुट गई, इसके बाद असउददीन औवेसी भी मैदान में उतर आए और वे मुसलमानों को साधने तथा मुसलमानों में यह विश्‍वास जगाने का प्रयास करने लगे कि वे ही मुसलमानों के सच्‍चे हितैषी है तथा ये मुसलमानों को उनका हक दिलाना चाहते हैं। इसके बाद नंबर आता है आम आदमी पार्टी का जिसने अपने चुनाव अभियान की शुरूआत अयोध्‍या से तिरंगा यात्रा निकाल कर कर दी तथा घोषणा कर दी कि वे सत्‍ता में आए तो हर परिवार को तीन सौ यूनिट बिजली मुफ़त देंगे। वहीं भाजपा तो अपने विकास के एजेंडे को लेकर चुनाव मैदान में उतरेगी। अब कांग्रेस जिसके पास यूपी से लोकसभा में मात्र एक सीट हे रायबरेली जहां से श्रीमती सोनिया गांधी चुनाव जीती थी तथा यह बात भी स्‍पष्‍ट है कि कांग्रेस लगातार यूपी में जनाधार खोती चली जा रही थी वह भी प्रियंका गांधी के मार्ग दर्शन में ताल ठोक रही है।

यूपी चुनाव में हर दल धर्म और जाति के आधार पर आगामी चुनाव में वैतरणी पार करना चाहता है और इसके लिए वह जितना जहर समाजों मे घोल सकता है घोलेगा क्‍यों कि उसका एक मात्र लक्ष्‍य योगी को सत्‍ता से बाहर करना है और इसके बाद 2024 में मोदी को हटाना है लेकिन विपक्ष के पास कोई ठोस उपाय नहीं है वहीं हर कोई राजा बनना चाहता है तथा कोई किसी से स्‍वयं को कम नहीं समझ रहा है, इस स्थिति में विपक्ष भाजपा के सामने चुनाव में टिक पाएगा इसमें संदेह है, इसलिए ये सभी दल भाजपा को पराजित करने के लिए पूरे समाज को जातीयों में बांटने का प्रयास करते नजर आ रहे है। हालांकि चुनाव में पांच महिने का समय है लेकिेन राजनीतिक दलों ने चुनावी शंखनाद कर दिया है और विभिन्‍न टीवी चैनल सिर्फ और सिर्फ जातिय गणित को लेकर राजनीतिक दलों की बहस आयोजित कर रहे है ऐसा लगता है कि टीवी चैनल भी हमेंशा की तरह अपने हित साधने के लिए राजनीतिक दलों को उकसा रहे है। आश्‍चर्य की बात तो यह है कि पिछले दस माह से चल रहे किसान आंदोलन के नेता राकेश टिकैत भी भाजपा को हराने के लिए हर हर महादेव और अल्‍लाहु अकबर के नारे लगाते अपनी पंचायतों में देखे जा रहे है वहीं वे कह रहे है कि उनका आंदोलन किसानों का ही आंदोलन है जबकि इसे कांग्रेस और वामपंथी पिछले दरवाजे से फंडिंग करते नजर आ रहे है इसका एक उदाहरण यह कि पंजाब के पूर्व मुख्‍यमंत्री केप्‍टन अमरिंदर सिंह ने भी किसानों से अपील की थी कि वे पंजाब में आंदोलन करने की बजाए हरियाणा और दिल्‍ली में आंदोलन करें क्‍यों कि इससे पंजाब का नुकसान हो रहा है। हालांकि अब कैप्‍टन पंजाब के मुख्‍यमंत्री नहीं है किन्‍तु कांग्रेस का स्‍टैड तो बरकरार है।

विचारणीय प्रश्‍न यह है कि चुनाव के दौरान यूपी में हो रही जातिय राजनीति प्रदेश के विकास को रोक कर समाज में विघटन पैदा नहीं करेगी, क्‍या चुनाव आयोग और सर्वोच्‍च न्‍यायालय यह होता देखते रहेगे या इसे रोकने के लिए आवश्‍यक कदम उठाएंगे। आज के दौर में चुनाव के दौरान सत्‍ता से बाहर राजनीतिक दल विकास की बात नहीं कर रहे है और ना ही कोई ऐसा रोडमेप जनता के सामने रख रहे है जिससे यह स्‍पष्‍ट हो सके कि सत्‍तारूढ दल अपने कार्यकाल में विफल रहा है और विपक्ष्‍ा सत्‍ता में आने के बाद प्रदेश या देश के विकास के लिए कौन सी योजनाएं लेकर आएंगे। ऐसा इसलिए भी संभव नजर नहीं आ रहा है क्‍यों कि जो दल पहले सत्‍ता में उन्‍होंने जन धन का किस प्रकार दुरुपयोग किया यह जग जाहिर है,कोई दलितों के नाम पर अरबों रुपए की सम्‍पत्त्‍ित का मालिक बन बैठा तो कोई नेहरू गांधी के नाम पर, जनता को सुविधाएं उपलब्‍ध करवाने के लिए इन्‍होंने कोई काम नहीं किया और किया भी तो अपनी जेबे पहलें भरी और जनता के सामने एक टुकडा डालकर अपनी वाहवाही करने और करवाने में जुट गए। जब मायावती उत्‍तर प्रदेश की मुख्‍यमंत्री बनी तो उन्‍होंने पूरे प्रदेश में जगह जगह स्‍वयं की और पार्टी के सिंबोल हाथी की प्रतिमाएं खडी करवा दी, दलित पहले भी दलित रहा और बाद में भी दलित, सपा ने हिन्‍दु मुसलमानों के बीच खाई पैदा करने में सफलता हांसिल की और जगह जगह बाहुबलियों को शक्तिशाली बनाने का काम किया लेकिन आज समाजवाद की बात कर रही है सपा।

अभी भी समय है जनता को जागना होगा वर्ना बाद में पछताने का भी मौका नहीं मिलेगा, समय है सही को चुने और अपने और प्रदेश के भविष्‍य को सुरक्षित हाथों में सौंपे।

 

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