@ राकेश अचल 
कलियुग में काग यानि कौओं की महिमा को लेकर बड़े-बड़े विद्वान गच्चा खा गए .हमारे गिरधर कविराय तक नहीं समझ पाए काग को .कविराय ने सभी कौओं को अपावन ठहरा दिया .रंग के आधार पर कोकिला [कोकिला बेन नहीं ] को सुहावन बताने वाले गिरधर कविराय भूल गए कि सनातन हिन्दू धर्म में विद्वानों ने एक पखवाड़ा कौओं के प्रति शृद्धा के लिए आरक्षित रखा है .इस पखवाड़े में कौए खोजने पर भी नहीं मिलते .
कौओं को लेकर हिंदी के ही नहीं संस्कृत के विद्वानों ने भी मुंह की खायी .उन्होंने लिखा-‘ काग चेष्टा ,वको ध्यानम ‘.जबकि उन्हें लिखना चाहिए था -‘ काग चेष्टा,नको ध्यानम .आखिर कौए का ध्यान से क्या लेना-देना .यद्यपि माना जाता है [है भी ] कि विद्वानों का इशारा बगुलों की तरफ था न कि कौओं की तरफ ,लेकिन हम जैसे घामड़ इतनी गहराई में कहाँ जाते हैं. हमें तो लगता है कि सब कुछ काग महाशय के बारे में कहा गया है .ये हकीकत है कि काग चाहे पक्षी हो या प्रवृत्ति चेष्टा प्रधान होती है .चेष्टा करने से ही परिणाम हासिल होता है .जो कागा चेष्टा करते हैं ,वे कहीं से कहीं जा पहुँचते हैं ? उदाहरण मै अनेक दे सकता हूँ,किन्तु दूंगा नहीं .ऐसा मुझे जनहित में करना पड़ता है .आखिर समाज में शांति बनाये रखना भी तो हमारा नागरिक कर्तव्य है.
बात काग की चल रही थी.काग के भाग को लेकर जलने वालों की भी कमी नहीं है..जलने वालों ने लिखा है-‘ काग के भाग बड़े सजनी,हरि हाथ सों ले गयो माखन-रोटी ‘ .काग से जलने वाले केले रसखान जी ही नहीं बहुत से लोग हैं .हरि यानि जनता के हाथ से माखन-रोटी झपटने वाले असंख्य कौए भारत की राजनीति में मौजूद हैं और उनके भाग से जलने वाले भी उतने ही हैं ,[एक मुझे छोड़कर ].मै कौओं को असीम स्नेह करता हूँ ..कौओं से स्नेह की अनेक वजहात होती हैं .वे मगरे [ बुंदेली में खपरेल के शीर्ष भाग को मगरा कहते हैं ]पर बैठकर ‘दूदाभाती’ [दूध-भात का सेवन ]कर अतिथियों के आने की सूचना देते हैं .
कौए साहित्यकारों के लिए जितना ईर्ष्या का कारण हैं उतने ही प्रेरणा का श्रोत भी हैं .हमारे पृथक बुंदेलखंड आंदोलन की अगुवाई करने वाले स्वर्गीय विठ्ठल भाई पटेल ने तो काग पर फिल्मी गीत लिखकर जो हासिल किया वो उन्हें सियासत कभी नहीं दे पायी .उन्होंने फिल्म बॉबी के लिए गीत लिखा था -‘ झूठ बोले कौआ काटे,,काले कौए से डरियो’ अर्थात वे जानते थे कि कौआ कितना बड़ा सचेतक है ? झूठ बोलने पर आपको काटकर सांकेतिक सजा दे सकता है .दुनिया में कितने पक्षी हैं ,किसी ने कौए जैसा साहस जुटाया कि किसी झूठे को काट ले ? जयंत ने एक बार सीता जी को बिना वजह नोंचने की कोशिश की थी,बेचारे को आँख गंवाना पड़ी थी .कल्पना कीजिये यदि जयंत काट लेता तो उसका क्या हश्र होता ?
भारत में चिश्ती सम्प्रदाय के संस्थापक और निज़ामुद्दीन औलिया के गुरु बाबा फरीद यानि हजरत ख्वाजा फरीद्दुद्दीन गंजशकर ने कौओं के नाम अपनी अर्जी लिखकर कौओं को अमर बना दिया .बाबा कौओं के अलावा किसी दुसरे माँसांहारी परिंदे का नाम भी ले सकते थे लेकिन नहीं लिया.उन्होंने कागा को ही चुना ,क्योंकि उन्होंने देखा कि कागा जिस निष्ठा से मांसाहार करता है ,कोई दूसरा परिंदा नहीं करता .उन्होंने लिखा-‘
‘कागा सब तन खाइयो, चुन-चुन खइयो मांस
दो नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस’
बाबा फरीद ने लिखा ,इसका मतलब है कि काग आग्रही पक्षी है .लोगों की बात मानता है .संवेदनशील है काग एक समझदार सामाजिक पक्षी है .वो मोरनी की तरह आधी रात में नहीं बोलता .काग ने किसी की नींद खराब नहीं की आधी रात में बोलकर .बल्कि काग तो अब मुर्गों की जगह अलार्म का काम करता है .कागा ही है जो आपके और आपके पितरों के बीच पुल का काम करता है .आप पितृ पक्ष में बेचारे काग के जरिये अपने पितरों के नाम पर खुद भी न जाने क्या-क्या अल्ल-बल्ल खाते हैं और काग को भी खिलाते हैं .बेचारा काग आपके लिए पंद्रह दिन के लिए मांसाहारी से शुद्ध शाकाहारी बन जाता है .
खगपति कागभुसुंड जी के बारे में आपने सुना ही होगा .अरे आप रामचरित मानस नहीं पढ़ते ! जरूर पढ़िए आपको सारा किस्सा पता चल जाएगा .परम ग्यानी रामभक्त ये भाजपा वाले नहीं बल्कि अपने कागभुसुंड जी ही थे .लोमश ऋषि के शाप की वजह से ब्राम्हण से काग बने कागभुसुंड जी ने अपने पूरे समाज का नाम रोशन किया .कागभुशुण्ड जी को इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था .आज भी कौए अपनी मर्जी से ही मरते हैं,वे भले ही किसी भी रूप में हों ,लेकिन न उनका ज्ञान विस्मृत होता है और न वे रामजी को भूलते हैं .भारतीय राजनीति में भी कागवृत्ति इसीलिए स्वीकार्य है .
भारत के कौए आम भारतीय की तरह दुबले,पतले होते हैं ,लेकिन अमरीका के कौए हृष्ट-पुष्ट होते हैं .भारतीय कौए मांसहार के अलावा रोटी की छीनाझपटी पर आश्रित हैं जबकि अमरीकी कौए चीज,बर्गर,पिज्जा और बटर पर आश्रित होते हैं. उन्हें छीनाझपटी नहीं करना पड़ती .बावजूद इसके अमरीकी कौओं को वो सम्मान प्राप्त नहीं है जो भारतीय कौओं को है .अमरीका में कौओं का कोई पखवाड़ा आरक्षित नहीं है. अमरीका में रहने वाले भारतीय पितृ पक्ष में स्थानीय कौओं को पूड़ी,खीर खाने को देते भी हैं तो वे हँसते हैं .मन ही मन कहते हैं -‘ अरे ये क्या है ? ,पिज्जा- बर्गर खिलाया करो अपने पूर्वजों को ?समझदार भारतीय अब पितृ पक्ष में अमरीकी कौओं को खाना खिलने के बजाय अपनी क्षमता के मुताबिक डालर पकड़ा देते हैं और कहते हैं कि-‘ जहाँ ,जो खाना हो जाकर खाओ .’
बहरहाल कागा अब भारत में भी दुर्लभ हो रहे हैं.काग के मुकाबले कबूतरों की तादाद लगातार बढ़ रही है .लेकिन कबूतरों की बढ़ती आबादी से कोई चिंतित नहीं है,किसी ने इसे राजनीति का मुद्दा भी नहीं बनाया है ,जैसा कि अक्सर होता है .राजनीति में किसकी कितनी आबादी बढ़ी या घटी ये भी राजन्ती का विषय है .मै भी अपने पितरों के नाम का अगरग्रास लेकर कागा की तलाश में भटक रहा हूँ .मुझे गाय,कुत्ता तो आसानी से मिल गए लेकिन काग जी की तलाश में बहुत भटकना पड़ा .हकीकत ये है कि देश में पर्यावरण संतुलन के लिए काग प्रजाति के संरक्षण की महती जरूरत है .

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