राकेश अचल

चाल और चरित्र बदलने के बजाय भाजपा और कांग्रेस चुनाव जीतने के लिए अपनी सरकार का चेहरा बदलने में लगी है .इस कवायद के चलते दोनों दलों ने हाल ही में अनेक राज्यों में अपने मुख्यमंत्री बदले और मंत्रिमंडल में नए चेहरे शामिल किये हैं .जनता की आँखों में धूल झोंकने के लिए की जाने वाली ये कवायद नई नहीं है ,लेकिन निरंतर की जा रही है .
उत्तर प्रदेश सरकार में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले 7 नए मंत्री शामिल कर लिए गए .आने वाले छह महीने में ये नए मंत्री कौन सा तीर मारेंगे ये तो राज्य के मुख्यमंत्री जानें लेकिन हकीकत ये है कि इन् सातों मंत्रियों कोउनकी योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि वोट बैंक के हिसाब से मंत्रिमंडल का सदस्य बनाया गया है ताकि इनकी जातियों के मतदाता खुश होकर चुनाव के समय भाजपा की झोली वोटों से भर दें .
आप और हम भले ही इस मंत्रिमंडल विस्तार में जातीय समीकरण न देखें लेकिन यूपी तो इसे देखता है .योगी आदित्यनाथ सरकार में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद ब्राह्मण हैं,उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। वहीं, राज्यमंत्री के रूप में छत्रपाल गंगवार (कुर्मी), पलटूराम (जाटव), संगीता बलवंत बिंद (निषाद), संजीव कुमार गोंड (अनुसूचित जनजाति), दिनेश खटीक (सोनकर), धर्मवीर प्रजापति (प्रजापति समाज), छत्रपाल सिंह गंगवार (कुर्मी) को शपथ दिलाई गई।
उत्तर प्रदेश में इस बार विधानसभा के चुनाव पहले के मुकाबले कुछ ज्यादा जातीय रंग में दिखाई दे रहे हैं.यहां सियासत करने वाली प्रत्येक पार्टी को जातीय गणित का सहारा लेना पड़ रहा है,यानि कोई इस बीमारी से बचा नहीं है .बसपा की बहन मायावती पहले से राज्य के ब्राम्हणों की कलाई पर राजनीतिक राखी बाँध चुकी हैं. मजबूरी में समाजवादी पार्टी को भी ब्राम्हणों को बुद्धिजीवी मानकर राज्य में प्रबुद्ध सम्मेलन करना पड़ रहे हैं.और भाजपा चूंकि सत्ता में है इसलिए उसने अपने तरीके से ब्राम्हणों को खुश करने की कोशिश की है .लगता है कि यूपी के सभी राजनीतिक दल ब्राम्हणों को ‘ चुकटिया ‘ समझते हैं.[चुकटिया यानि एक चुटकी आते में खुश होने वाले ब्राम्हण ]
आपको याद होगा कि राज्य में ब्राम्हणों के हाथों से सत्ता के सूत्र गए तीन दशक हो चुके हैं .इन तीन दशकों में ब्राम्हण लगातार हासिये पर धकेले गए ,इस बार भी कोशिश पहले जैसी है. कोई भी राजनीतिक दल किसी ब्राम्हण को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर चुनाव नहीं लड़ना चाहता ,हाँ उन्हें खुश करने के लिए कोशिश जरूर कर रहा है .जातीय राजनीति का दबाब यूपी की सियासत को खोखला कर चुका है .बहरहाल बिसात बिछाई जा रही है .
उत्तर प्रदेश की ही तरह पंजाब में सत्तारूढ़ कांग्रेस ने अपना चरित्र और चाल बदलने के बजाय अपने मुख्यमंत्री को बदलने के साथ ही आधा दर्जन मंत्री भी बदल दिए .राज्य में कांग्रेस अंदरूनी झगड़ों का शिकार पहले से है.ऊपर से कांग्रेस पर किसान आंदोलन के अलावा शिरोमणि अकाली दल,भाजपा और ‘ आप ‘ से मुकाबले कि चुनौती भी है .कांग्रेस ने पंजाब में असंतोष के तेज़ाब से झुलसी पार्टी की सरकार को बचाने के लिए राजा को हटाकर रंक को नेतृत्व सौंपा है.अब नए मुख्यमंत्री आने वाले छह महीने में क्या तीर मार लेंगे ये पार्टी प्रमुख राहुल गांधी ही जानते होंगे .
मंत्रिमंडल में विस्तार को नेता बड़ी ही बेशर्मी से अपने नेताओं की राजनीति का आधार बताते हैं. यूपी के संदर्भ में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्ढा कहते हैं कि मंत्रिमंडल का विस्तार पं. दीनदयाल उपाध्याय जी के दर्शन को प्रतिबिंबित करता है। आज का विस्तार हर तबके को प्रतिनिधित्व, सामाजिक संतुलन की भावना, समरसता का संदेश तथा अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को अवसर प्रदान करने की मंशा से ओतप्रोत है।ये मंशा चुनाव से छह माह पहले ही उजागर क्यों हुयी,ये आप उनसे पूछ सकते हैं ? भाजपा जैसी ताकतवर पार्टी की विवशता देखिये कि उसे किसी भी सदन के सदस्य न होने के बावजूद जितिन प्रसाद को मंत्री बनाना पड़ा. जितिन प्रसाद खानदानी कांग्रेसी हैं,लेकिन अब भाजपाई हो गए हैं. जितिन प्रसाद कांग्रेस में बड़े कद के नेता थे। वह दो बार सांसद रहे। 2004 में शाहजहांपुर लोकसभा सीट से पहली बार सांसद बने। इसके बाद 2008 में केन्द्रीय इस्पात राज्य मंत्री बनाए गए। 2009 में परिसीमन के बाद धौरहरा से लड़े और दूसरी बार सांसद बने।
भाजपा की विवशता ये ही कि उसे जनता द्वारा ठुकराए जा रहे जितिन से काम लेना पड़ रहा है. आपको याद होगा कि वह सड़क परिवहन, पेट्रोलियम और मानव संसाधन विभाग में राज्यमंत्री रहें. 2014 व 2019 के लोकसभा चुनाव में धौरहरा से चुनाव हारे। इसके साथ 2017 के विधानसभा चुनाव में शाहजहांपुर की तिलहर विधानसभा सीट से चुनाव हारे। इनके पिता जितेन्द्र प्रसाद भी चार बार शाहजहांपुर के सांसद रहे। वह तो राजीव गांधी और पीवी नरसिम्हा राव के राजनितिक सलाहकार भी रहे हैं।
यूपी की तर्ज पर ही पंजाब में असंतोष की आग बुझाने के लिए मंत्रिमंडल को नए ढंग से सजाया गया .पंजाब में कांग्रेस के भीतर और बाहर दोनों और आग लगी हुई है .पंजाब में मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्‍नी के मंत्रिमंडल का विस्‍तार हुआ। इस विस्‍तार को देखकर तो यही लगता है कि इसमें प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख नवजोत सिंह सिद्धू की खूब चली है। सिद्धू के साथ कैप्‍टन अमरिंदर के खिलाफ खुलकर बगावत का बिगुल बजाने वालों को इनाम दिया गया है। सिद्धू के करीबियों को जगह दी गई है।चन्नी अब इस नयी फ़ौज के साथ उड़ता पंजाब दोबारा कांग्रेस के हक में जीत पाएंगे ,कहना कठिन है ,लेकिन कवायद तो कवायद होती है.करना ही पड़ती है .
आने वाले दिनों में देश के अनेक राज्यों में चेहरे,मोहरे बदलने की ये सनातन क्रिया दोहराई जाये तो मतदाताओं को हैरान नहीं होना चाहिए .ये मौक़ा मतदाओं को सतर्क रहने का है .झांसों से दूर रहने का है. अब मतदाता ही हैं जो देश की राजनीति को जातिवाद से मुक्ति दिला सकते हैं हालांकि उन्हें पहले से जातिवाद का सोमरस लगातार सत्ता की और से ही पील्या जाता रहा है .कभी आरक्षण की शक्ल में कभी मंत्री पद की रेवड़ियों की शक्ल में .सियासत को बदलने का ये सबसे सही समय है .समाज के हर वर्ग की जिम्मेदारी इस बार पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गयी है .

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