कोरोना संक्रमण ने भी अपना प्रभाव दिखाया
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निशिकांत मंडलोई
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दिवंगत परिजनों की तृप्ति के लिए आभार, आदर, कृतज्ञतापूर्ण भाव से तिल से जलांजलि का क्रम अब अपने अंतिम चरण में महालय की ओर अग्रसर हो रहा है। 17 सितंबर अश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या को यानी महालय के साथ समाप्त हो जाएगा।

जब से सृष्टि की रचना हुई तब से ही मनुष्य किसी न किसी रूप में अपने पूर्वजों का ऋणी रहा है। इसी ऋण को उतारने के लिए शास्त्रों में अश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या यानी सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या या महालय का महत्व बताया गया है। इसे भूतड़ी अमावस्या भी कहा जाता है। इस दिन हम सभी दिवंगत पूर्वजों का ऋण उतारते हैं ताकि हमारे पूर्वजों को शांति मिले। वे आज जिस रूप में भी हों हमें इस दिन उन्हें जरूर याद करना चाहिए क्योंकि ऐसा कहा गया है कि आप वर्ष भर यदि अपने पूर्वजों को याद नहीं भी कर पाएं लेकिन श्राद्ध पक्ष की सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या को याद करते हैं और उनकी इच्छाओं को याद कर कार्य करते हैं तो ब्रह्मांड में अदृश्य रूप में विचरण कर रहे हमारे पूर्वज प्रसन्न होते हैं तथा आशीर्वाद देते हैं।
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श्रद्धा बाकी, वर्जनाएं टूटी
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हिन्दू वैदिक संस्कृति और परंपराओं में विश्वास करने वाले हर परिवार में इन दिनों ब्राह्मणों को आमंत्रित कर खीर पूड़ी का भोजन कराया जा रहा है। पितरों के आशीर्वाद पाने का एक पुरातन व पारम्परिक पर्व श्राद्ध पक्ष ही है। हर समाज में श्राद्ध पक्ष को मनाने की कमोबेश एक जैसी ही पद्धति है।
धार्मिक रूढ़ियों और परंपराओं को विज्ञान की कसौटी पर कसने वाला 21वीं सदी का युवा वर्ग भी परिवार के बड़े बुजुर्गों द्वारा किए जाने वाले भावना प्रधान श्राद्ध कर्म में पारिवारिक अनुशासन में बंध कर अपनी हिस्सेदारी जरूर दर्ज करा रहा है। मगर युवाओं का यह भी कहना है कि इस पुरातन परम्परा को आधुनिक पीढ़ी तभी आगे बढ़ा सकेगी जब वह इसके पीछे बताई जाने वाली मान्यताओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सच मानेगी।
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पूर्वजों को जानने का मौका

बहरहाल , श्राद्ध पक्ष के जरिये बच्चों और युवाओं को अपने परिवार के पूर्वजों को जानने व समझने का मौका अवश्य मिल रहा है। व्यक्ति की आवश्यकता , वस्तुओं की मांग व पूर्ति तथा कीमतों के उतार चढ़ाव के मद्देनजर श्राद्ध पक्ष के दौरान बाजार में खरीद फरोख्त व किसी भी नए शुभ कार्य की शुरुआत करने संबंधी परम्परागत मान्यताएं और वर्जनाएं अब धीरे धीरे टूटने लगी हैं। फिर भी कई लोग आशंकाओं के वशीभूत प्रचलित मान्यताओं को तोड़ने का साहस नहीं बटोर पाते हैं।
इस वर्ष कोरोना संक्रमण के कारण श्राद्ध की प्रक्रिया भी प्रभावित हुई है। इस बार ब्राह्मण भी भोजन करने जाने में कतराते नजर आए तो जहां घरों में श्राद्ध था वो भी किसी ब्राह्मण को जिमाने में रुचि लेने के बजाय मंदिरों में भोजन का कच्चा सामान यानी सीदा भिजवाने में अधिक विश्वास करते नजर आए। कई लोग तो अपने पितरों के श्राद्ध के लिए अनाथालय या संत आश्रम चुनते हैं। इनके अलावा भी इस बार कई परिवारों की प्राथमिकता घर के बजाय आश्रमों में श्राद्ध सम्पन्न कराते नजर आए।
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बदलती मान्यताएं
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पितृ पक्ष में खरीदी नहीं करने की परंपरा भी अब टूटती नजर आने लगी है। इन दिनों सोने चांदी के भावों में गिरावट भी देखी गई, इसी वजह से इनकी खरीदी भी हुई। दूसरी तरफ कुछ व्यापारी यह भी कहते पाए गए कि श्राद्ध पक्ष में कारोबार में आधी गिरावट नजर आई।
श्राद्ध पक्ष में खीर का महत्व होने के साथ ही दूध का तर्पण में भी उपयोग होता है इसलिए इन दिनों दूध का उठाव अधिक हो जाता है । ऐसी स्थिति में पूर्व से बुकिंग करवाने पर ही दूध मुहैया हो पा रहा है।
इसके साथ ही अगर बात करें नई पीढ़ी की तो कई ब्राह्मण भोज से परहेज करते हैं। नई पीढ़ी में तो श्राद्ध औपचारिक रस्म रह गया है।कई लोगो को तो अपने पूर्वजों के ब्रह्मलीन होने की तिथि की ही जानकारी नहीं होती। जो जानते है वे विधि से कार्य करते हैं। कई लोग इस कार्य के लिए पंडित को ही अधिकृत कर देते हैं तो कुछ इसे दकियानूसी या रूढ़िवादी रस्म करार देते हैं।

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