नईदिल्ली/इंडिया डेटलाइन

केन्द्र सरकार ने तीन अध्यादेशों के जरिये ऐसा क्या कर दिया कि पंजाब व हरियाणा के किसान आंदोलित है जबकि महाराष्ट्र जैसे संपन्न व किसान जागरूकता वाले प्रदेशों में इसकी चिंता नहीं है? क्या यह राजनीतिक मुद्दा है अथवा केन्द्र सरकार किसानों की जिंदगी में बड़ा दख़लंदाज़ी करने जा रही है, इसे लेकर बहस की जा सकती है। आंदोलनकारी किसानों का कहना है कि इसके जरिये खेती में कॉरपोरेट सेक्टर को घुसाया जा रहा है जबकि महाराष्ट्र जैसे प्रदेशों के किसान नई व्यवस्था का फ़ायदा लेने की सोच रहे हैं। केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्रजी सिंह तोमर ने मंगलवार को लोकसभा में तीन विवादग्रस्त विधेयक पारित कराते हुए आश्वस्त किया कि प्रस्तावित क़ानून कृषि को गति देगा और किसानों के लिए फ़ायदेमंद होगा। 

कृषि उत्पाद विपणन से जुड़े तीन अध्यादेशों को सोमवार को लोकसभा में पेश किया गया था। पहला अध्यादेश कृषि उपज विपणन समितियों के ढाँचे को बाधा पहुँचाए बिना मंडियों के बाहर ख़रीदने-बेचने की अनुमति देता है। दूसरा अनुबंध खेती (कांट्रेक्ट फ़ार्मिंग) की अनुमति देता है जबकि तीसरे अध्यादेश में आवश्यक वस्तु अधिनियम में कुछ वस्तुओं को सरकारी नियंत्रण से हटाने का प्रावधान है। केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने मंगलवार को लोकसभा में कहा कि प्रस्तावित क़ानून किसानों को बैरियर मुक्त व्यापार का अवसर देगा जिससे किसान अपने हिसाब से निवेशक चुन सकेंगे। इससे खेती में निजी निवेश और तकनीक आ सकेगी। इस तरह किसान और मजबूत होगा। कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी का कहना था कि केन्द्र सरकार राज्यों के मंडी क़ानूनों में हस्तक्षेप कर रही है। शशि थरूर के साथ ही तृणमूल कांग्रेस ने इसे कृषि क्षेत्र को पूँजीपतियों के हाथ में देने की कोशिश बताया। 

इन अध्यादेशों की घोषणा मई में सरकार ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत की थी। किसानों को आशंका है कि नया क़ानून न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ ही भारतीय खाद्य निगम की ख़रीद व्यवस्था को सीमित कर देगा।

पंजाब हरियाणा के किसान इससे ज्यादा चिंतित हैं जबकि महाराष्ट्र में इसे लेकर कोई खास प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देती जबकि वहाँ का किसान भी पूर्व में कई अवसरों पर जागरूकता दिखा चुका है। शेतकरी संघटना किसानों के मुद्दे पर एक समय बड़े-बड़े आंदोलन खड़े कर चुका है। सतारा के किसान रामचंद्र सँभाजी भाले का कहना है-’हमारी फसल का हमें मंडी से बाहर ही अच्छा भाव मिल जाता है। हमें कृषि में अपने अल्प संसाधनों से फ़ायदा नहीं है। यदि हम इसमें पूँजी ला सकेंगे तो छोटी खेती को भी लाभदायी बना सकेंगे।’ 

दूसरी ओर किसान संगठनों को आशंका है कि सरकार इसके जरिये समर्थन मूल्य की व्यवस्था को खत्म करने जा रही है। अखिल भारतीय स्वामीनाथन संघर्ष समिति चूरु  ने देश भर में जारी एक अपील में बताया है कि सरकार समर्थन मूल्य को खत्म करने जा रही है। इससे असल में किसानों को नहीं बल्कि बड़ी-बड़ी कम्पनियों को फायदा होगा। यह बात आप सब जानते ही होंगे कि हमारी केंद्र सरकार के ऊपर विश्व व्यापार संगठन (WTO) का दबाव है कि किसानों को मिलने वाला समर्थन मूल्य  (MSP) एवं हर प्रकार की सब्सिडी केंद्र सरकार समाप्त करे। किसानों के विरोध को भांपने के लिए अब की बार मक्के व मूंग का एक भी दाना MSP पर नहीं खरीदा गया। आने वाले समय में केंद्र सरकार गेहूं व धान की समर्थन मूल्य पर खरीद भी बन्द करने की दिशा में बढ़ रही है। 

नीति आयोग के सदस्य रमेशचंद्र का कहना है कि अध्यादेश में न्यूनतम समर्थन मूल्य किसी स्तर पर कमज़ोर नहीं होगा। बल्कि अब किसान अच्छे इनपुट के लिए किसी भी तरह का समझौता कर सकेगा। लेकिन खेती उन्हें ही करनी होगी। अनुबंध खेती अध्यादेश में किसानों की ज़मीन पर किसी भी तरह के ढाँचे के निर्माण पर रोक लगाई गई है। 

पंजाब हरियाणा के किसान इसलिए ज्यादा आशंकित हैं क्योंकि वे बड़ी तादाद में गेहूँ व चावल का ही उत्पादन करते हैं जिसे बड़ी मात्रा में केन्द्र सरकार भारतीय खाद्य निगम के माध्यम से ख़रीद लेती है। ऐसा होने पर भारतीय खाद्य निगम ख़रीद बंद कर देगा जिसका उनके विपणन पर असर पड़ेगा। पंजाब के फिरोजपुर में धरना दे रहे किसान बलजिंदर कहते हैं -’अध्यादेश में यह ठीक है कि फसल उसे बेची जा सकेगी जो अच्छा दाम देगा लेकिन भविष्य कोई नहीं जानता। यदि व्यापारी ज्यादा दाम देते हैं तो हमें मक्के पर प्रति क्विंटल 1850 शुरू पर क्यों नहीं मिलते?  सरकार ने जिन 22 फ़सलों पर समर्थन मूल्य घोषित किया है उसी का फायदा नहीं मिलता। इसे दिलाने के लिए क्यों नहीं कानून बनाया जाता। ‘

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने इसे लेकर देशव्यापी संघर्ष की योजना बनाई है। पंजाब व हरियाणा राज्यों की सरकारों को यह भी डर है कि यदि फसल उत्पाद मंडियों के बाहर बेचे जाने लगे तो उनके राजस्व का बड़ा नुकसान होगा।

केंद्र सरकार के 3 कृषि अध्यादेश 

1). पहला अध्यादेश है-Farmer’s Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Ordinance। इसके तहत केंद्र सरकार “एक देश, एक कृषि मार्केट” बनाने की बात कह रही है। इस अध्यादेश के माध्यम से पैन कार्ड धारक कोई भी व्यक्ति, कम्पनी, सुपर मार्केट किसी भी किसान का माल किसी भी जगह पर खरीद सकते हैं। कृषि माल की बिक्री APMC यार्ड में होने की शर्त केंद्र सरकार ने हटा ली है। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि कृषि माल की जो खरीद APMC मार्केट से बाहर होगी, उस पर किसी भी तरह का टैक्स या शुल्क नहीं लगेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि APMC मार्केट व्यवस्था धीरे धीरे खत्म हो जाएगी क्योंकि APMC व्यवस्था में टैक्स व अन्य शुल्क लगते रहेंगे। इस अध्यादेश के तहत किसानों का माल खरीदने वाले पैन कार्ड धारक व्यक्ति, कम्पनी या सुपर मार्केट को 3 दिन के अंदर किसानों के माल का पेमेंट करना होगा। स्वामीनाथन संघर्ष समिति का कहना है कि किसान व कम्पनी के बीच विवाद होने की स्थिति में इस अध्यादेश के तहत कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाया जा सकता। यहां पर गौर करने की बात यह है कि प्रशासनिक अधिकारी हमेशा सरकार के दबाव में रहते हैं और सरकार हमेशा व्यापारियों व कम्पनियों के पक्ष में खड़ी होती है क्योंकि चुनावों के समय व्यापारी एवम कम्पनियाँ राजनीतिक पार्टियों को चंदा देती हैं। केंद्र सरकार ने इस बात की कोई गारंटी नहीं दी है कि प्राइवेट पैन कार्ड धारक व्यक्ति, कम्पनी या सुपर मार्किट द्वारा किसानों के माल की खरीद MSP (समर्थन मूल्य) पर होगी। केंद्र सरकार के इस अध्यादेश से सबसे बड़ा खतरा यह है कि जब फसलें तैयार होंगी, उस समय बड़ी-बड़ी कम्पनियां जानबूझकर किसानों के माल का दाम गिरा देंगी एवम उसे बड़ी मात्रा में स्टोर कर लेंगी जिसे वे बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगी। 

समिति के मुताबिक मंडियों में किसानों की फसलों की MSP पर खरीद सुनिश्चित करने के लिए व व्यापारियों पर लगाम लगाने के लिए APMC एक्ट अलग-अलग राज्य सरकारों द्वारा बनाया गया था। कानून के अनुसार APMC मंडियों का कंट्रोल किसानों के पास होना चाहिए लेकिन वहां भी व्यापारियों ने गिरोह बनाकर किसानों को लूटना शुरू कर दिया। 

2). दूसरा अध्यादेश Essential Commodity Act 1955 में बदलाव के लिए लागू किया गया है । पहले व्यापारी फसलों को किसानों के औने-पौने दामों ओर खरीदकर उसका भंडारण कर लेते थे एवं कालाबाज़ारी करते थे, उसको रोकने के लिए Essential Commodity Act 1955 बनाया गया था जिसके तहत व्यापारियों द्वारा कृषि उत्पादों की एक लिमिट से अधिक भंडारण पर रोक लगा दी गई थी। अब इस नए अध्यादेश के तहत आलू, प्याज़, दलहन, तिलहन व तेल के भंडारण पर लगी रोक को हटा लिया गया है। अब समझने की बात यह है कि हमारे देश में 85% लघु किसान हैं, किसानों के पास लंबे समय तक भंडारण की व्यवस्था नहीं होती है। लिहाज़ा कम्पनियाँ एवम सुपर मार्केट अपने बड़े बड़े गोदामों में कृषि उत्पादों का भंडारण करेंगे एवम बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे। 

3). तीसरा अध्यादेश सरकार द्वारा *कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग* के विषय पर लागू किया गया है जिसका नाम है-The Farmers Agreement on Price Assurance and Farm Services Ordinance। समिति का कहना है कि इसके तहत कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा दिया जाएगा जिसमें बड़ी- बड़ी कम्पनियाँ खेती करेंगी एवं किसान उसमें सिर्फ मजदूरी करेंगे। इस नए अध्यादेश के तहत किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर बनकर रह जाएगा। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत फसलों की बुआई से पहले कम्पनियां किसानों का माल एक निश्चित मूल्य पर खरीदने का वादा करती हैं लेकिन बाद में जब किसान की फसल तैयार हो जाती है तो कम्पनियाँ किसानों को कुछ समय इंतजार करने के लिए कहती हैं और बाद में किसानों के उत्पाद को खराब बता कर रिजेक्ट कर दिया जाता है। 

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