खेती के नए कानून -1

संविदा खेती या अनुबंध खेती यानी खेत को ठेके पर देना। मोदी सरकार के इस संबंध में लाए गए नए कानून को लेकर विरोध के स्वर उठ गए हैं जबकि सरकार की दलील है कि इससे किसान की जिंदगी आसान हो  जाएगी। नए कानूनों के बारे में जानकारी देने के लिए हम यह लेख श्रृंखला दे रहे हैं-

अब तक किसान अपने उत्पाद या फसल को उपभोक्ता अथवा खाद्य प्रसंस्करण करने वाली कंपनियों को सीधे नहीं बेच सकते। उन्हें किसी लाइसेंसशुदा व्यापारी का सहारा लेना पड़ता है। यदि आलू चिप्स बनाने वाली कंपनी को किसी खास क़िस्म के आलू की जरूरत है, संतरे का रस बनाने वाली इकाई को कोई खास क़िस्म का संतरा चाहिए या रेस्टारेंट्स की किसी श्रंखला को मशरूम चाहिए तो किसी व्यापारी के पास ही जाना होगा। कोई भी कंपनी किसान से अपनी जरूरत का कृषि उत्पाद या उसकी क़िस्म उगाने के लिए अनुबंध नहीं कर सकती थीं। ज़ाहिर है कि वे फसल की कीमत का भी कोई सौदा नहीं कर पातीं। किसान व्यापारी की दया पर ही निर्भर है। नया कानून ‘फ़ारमर्स (एंपावरमेंट एंड प्रोटेक्शन ) एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस एंड फ़ॉर्म सर्विसेज़ आर्डिनेंस’, जो रविवार को संसद में पारित होकर कानून बन गया है, किसान को सीधे उन लोगों से क़रार करने के लिए एक तंत्र या ढाँचा उपलब्ध कराता है जो कृषि उत्पाद ख़रीदना चाहते हैं। 

कृषि उपज मंडियों या बाज़ारों पर राज्य सरकारों का नियंत्रण है। ज्यादातर कृषि उत्पाद विपणन समितियों (APMC) से संबंधित कानून के तहत चिह्नित  ‘मार्केट एरिया’ में ही बेचे जा सकते हैं। एक मार्केट एरिया का इलाका एक ब्लॉक से लेकर जिले तक हो सकता है। अपनी फसल को संबंधित मार्केट एरिया में बेचने की किसान की बाध्यता होती है। वह अपने पड़ोस के जिले तक में उत्पाद बेचने के लिए नहीं जा सकता। 

कुछ राज्यों ने अपने उत्पाद को मार्केट एरिया में लाए बग़ैर लाइसेंसी ख़रीदार को बेचने की अनुमति दे रखी है। कोई किसान भले ही विपणन समितियों की सेवाओं का उपयोग न करे, अक्सर उसे इन समितियों का शुल्क देना होता है। यह एक खराब कार्यप्रणाली को जन्म देती है। व्यापारी इन बाज़ारों (मार्केट एरिया) में गिरोह बनाकर किसानों से सस्ते मूल्य पर ख़रीद करने का रास्ता निकाल लेते हैं। 

नया कानून इस व्यवस्था को बदल देगा। अब कोई भी किसान अपने उत्पाद को बेचने के लिए किसी भी व्यक्ति या कंपनी से क़रार कर सकेगा। विपणन समितियों का कानून केवल अपने बाजार की भौगोलिक सीमा में लागू होगा। यह उक्त बाजार के बाहर होने वाले किसी सौदे को नहीं रोक सकेगा। किसान अपनी फसल को उगाने के पहले कीमत और ख़रीदार तय कर सकेगा। बीच के लोग केवल सप्लाई सुनिश्चत करेंगे जबकि अभी वे लोग माँग और आपूर्ति दोनों में अहम भूमिका निभाते हैं। वर्तमान APMC कानून स्वस्थ प्रतिस्पर्धा खड़ी नहीं होने देता। यह बीच के व्यक्ति/मध्यस्थ/ दलाल को नही रोकता। नए कानून में उन्हें बेहतर कीमत व सेवाओं के लिए दूसरे ख़रीदारों से स्पर्धा करने का अवसर मिलेगा। 

नया कानून किसान को उत्पाद की मात्रा, गुणवत्ता व कीमत के मामले में प्रसंस्करण करने वासे या किसी भी ख़रीदार से क़रार करने की अनुमति देता है। जैसे पेप्सिको या किसी स्थानीय रेस्टारेंट से किसान अनुबंध कर सकेगा। चूँकि यह कानून (आवश्यक वस्तु अधिनियम के नए कानून के साथ-साथ ) मध्यस्थ को स्टॉक लिमिटेड से मुक्त करता है, सो बड़े संगठनों को अनुबंध खेती में उतरने की सुविधा देता है। यह छोटे व्यापारी को अपनी क्षमता विस्तार के लिए प्रोत्साहित करता है। ज्यादा ख़रीदारों के आने से किसान के हित में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलेगा।कृषि उत्पादों का राष्ट्रीय बाजार बनाने की दृष्टि से ये क़दम महत्वपूर्ण हैं। 

अनुबंध खेती या क़रार खेती का विचार नया नहीं है। पंजाब जैसे राज्यों ने इसे प्रोत्साहित करने की कोशिश की है। अभी भी छोटे-छोटे स्तर पर होने वालों क़रारों से किसान को फ़ायदा मिला है। कृषि मंत्रालय नें वर्ष 2018 में अनुबंध खेती का मॉडल कानून जारी किया था। पर इसका दायरा छोटा था। यह सीमित उत्पादों पर ही लागू था। मूल्य सरकारी नियमों से निर्धारित होता था। हर संविदा या अनुबंध को जिला प्राधिकरण के पास पंजीयन कराना पड़ता था। लेकिन अब यह हर उत्पाद पर लागू होगा, कीमत तय करना संबंधित पक्षों के हाथ में होगा और केन्द्रीकृत इलेक्ट्रॉनिक रजिस्ट्रेशन होगा। 

यद्यपि यह कानून किसानों की स्वतंत्रता की दिशा मे सकारात्मक पहल है लेकिन सरकारी हस्तक्षेप के दो रास्ते खुले हैं- कार्यपालिका का क्षेत्राधिकार जिसमें सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट को विवाद निपटान के अधिकार दिए गए हैं और स्वत: संज्ञान के आधार पर मुकदमेबाजी। स्वत: संज्ञान में अधिकारी खुद अनुबंध में हस्तक्षेप कर सकेगा, चाहे संबंधित पक्षों में विवाद हो, न हो। यह संविदा अधिनियम के सिद्धांतों का उल्लंघन है। इसका मूल्यांकन करना चाहिए। यदि सरकारी अफसर अनुबंधों मे दख़लंदाज़ी करेंगे तो ख़रीदार इससे दूर भागेंगे। 

1991 के उदारीकरण में उद्योंगों व सेवाओं के प्रति कानून का नज़रिया बदला और लाइसेंस, परमिट व निरीक्षण राज खत्म कर दिए गए। कारोबारियों को ज्यादा स्वतंत्रता दी गई। दुर्भाग्य से कृषि क्षेत्र को यह स्वतंत्रता नहीं मिली थी। इस मायने में यह कानून स्वागतयोग्य है। 

( इला पटनायक व शुभो रॉय का यह लेख द प्रिंट से साभार। लेख कानून पारित होने के पूर्व का है, इसलिए इसमें आंशिक संशोधन संभव हैं।)

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