साक्षात्कार-सफल नारी

लेखिका शारदा मिश्रा से सुष ‘राजनिधि की बातचीत—–

सफल नारी में आज मिलते हैं एक ऐसी शिक्षिका और लेखिका से जो एक दुर्घटना में अपने दोनों हाथ लगभग गंवा चुकी थीं, बावजूद उसके उन्होंने परेशानियों को अपने हौसलों से चुनौती दी। आज वे एक सफल शिक्षिका और लेखिका हैं, देश और समाज के लिए एक बड़ा उदाहरण हैं कि असमय आई विपत्ति को अपने जज्बे से कैसे ठेंगा दिखाया जा सकता है….

प्र- आपकी एजुकेशन कहां तक हुई है?

शारदा-मैंने  इतिहास में एम.ए. के अलावा बी.एड भी किया  है ।

प्र- अभी आप  कौन सी पोस्ट पर कहां पदस्थ हैं?

शारदा-वर्तमान में इन्दौर के मालव  कन्या  उच्चतर  माध्यमिक  विद्यालय  मोतीतबेला में उच्च  श्रेणी  शिक्षिका  पद  पर  कार्यरत  हूँ ।

प्र- आपके साथ घटित वह घटना बताइए जिसके कारण आपका जीवन बदल गया?

शारदा-मैं  एक  शासकीय  कार्यशाला  में  भाग  लेने  के  लिए  बड़वाह जहां  मैं  पदस्थ  थी  ,वहां  से  खरगोन  गई  थी । कार्यशाला  तीन  दिनों  की  थी ।तीसरे  दिन  कार्यशाला  पूर्ण  कर खरगोन  से  बड़वाह लौटते  समय  राज्य परिवहन की दो  बसों  में  टक्कर  हो  जाने  से  मेरा  दाहिना हाथ  शतप्रतिशत  और  बांया हाथ 40%क्षतिग्रस्त हो  गया था । दाहिना पूरा हाथ ऑपरेशन  कर निकाल  दिया  गया।  बायें हाथ  को  किसी  तरह  बचाने  का  प्रयास  किया  गया  । उस घटना के बाद मेरी जिन्दगी  बदल  गई ।  हर   कार्य में  आगे  रहने  वाली , मैं  विकलांगता  की  श्रेणी  में  आ गई ।बेहद  निराशा  के  भंवर  में  डूबते  उतराते  कई बार  आत्महत्या  का  विचार  मन  में  आया  पर  पति और  बच्चों  की  आत्मीयता ने जीवन  में उत्साह बनाए रखा और धीरे-धीरे मैं उस हादसे से उबर गई।

प्रश्न- इतनी बड़ी घटना के बाद अपने-आपको कैसे उबारा आपने ?

शारदा-विषम  परिस्थितियों में  अपनों  का साथ  और  सकारात्मक  सोच  बहुत  काम  आते  हैं।  मैंने  महसूस  किया  ,क्योंकि  कुछ  हाथ  सहयोग  के  तो  कुछ  तिरस्कार  और  दया  के  भी  बढ़े।  कई  बार  आपसे  यह  काम  नहीं  होगा  इन  शब्दों  ने  अपमानित  किया ।पर उससे  मुझमें  और  दृढता  आती  गई । पहले सीधे  हाथ  से  लिखती थी  वह  नहीं  रहा  बायें हाथ  की  ऊंगली,कलाई,हथेली  सभी  क्षतिग्रस्त  थी।  पेन  पकड़ना नामुमकिन  था। ऊंगली और  अंगूठा  एक  दूसरे  को  छू  नहीं  पाते  थे ।  लिख भी पाऊंगी  असंभव सा था कि एक  शिक्षक  के  हाथ  चाक और  पेन  न पकङ सके  तो  उसे  शिक्षक  होने  का  क्या  अधिकार  ।बस  इसी  जिद  ने  पेन  उठाने  को  विवश  कर  दिया  । पहले  अक्षर  उल्टे लिख  जाते थे  पेन  गिर  जाता था पर हिम्मत  और  लगन  से नामुमकिन  को  मैंने  मुमकिन  बना  दिया ।आज  मुझे  इस  बात  का  गर्व  है  कि  मैं  अपने  सभी  कार्य  आसानी  से  कर  लेती  हूं  विद्यालय  की  स्कॉलर  प्रभारी  हूँ ।प्रतिवर्ष  तीन- चार  सौ बच्चों  की  रजिस्टर  में  इन्ट्री करना, बारहवीं पास बच्चों की   टीसी  बनाकर  देना  और  छात्राओं  को  पढ़ाना  यह  सभी  कार्य  में  पूर्ण  इमानदारी  से  अकेले  अपने  आत्मबल  के  कारण  सम्पादित  कर  पा रही  हूँ ।छात्राओं  का अपने  प्रति  सम्मान  और  साथी  शिक्षकों  की  आत्मीयता, आदर,और  प्रोत्साहन  ही मेरा  सम्बल है । यही नहीं, घर  का  प्रत्येक  काम  मैं  कर  लेती  हूं  खाना  बनाने  में  मुझे  आनंद  आता  है  । आज  अपने  सभी  कार्य  चाहे वो स्कूल  के हों, घर या बाहर के हों,  करने  में  समर्थ  हूँ ।

प्र. क्या कहना चाहेंगी समाज को? क्या करना चाहती हैं आगे। क्या लक्ष्य है?

शारदा-मुझे  सहानुभूति  और  स्वयं  को  विकलांग कहलाने  से  नफरत  है  ।समाज  को  मेरा  यही  संदेश  है  कि  जन्मजात  या किसी  दुर्घटना  से यदि  शरीर  में  कुछ  शारीरिक  कमी  आ जाए तो  उसे  अपने  मन  की  दृढ  इच्छा शक्ति  से  दूर  करने  का प्रयास  करें ।बेचारगी  की  जिल्लत  भरी  जिंदगी  से  उबरकर  उन  सबके  लिए  प्रेरणा  बनें  जो  पूर्ण  सक्षम  होने के बाद  भी  दया  की उम्मीद  रखते  हैं  ।ईश्वर  पर  पूर्ण  विश्वास  रखें  वही  हर  दर्द  की  दवा  हैसकारात्मक  सोच  और  सतत  प्रयास  नामुमकिन  को मुमकिन  बना  देता  है  यह  मेरा  अपना  अनुभव है ।आत्म सम्मान  से जब  हम  जीने  की  कोशिश  करते  हैं  तब  हमारा  हाथ  ईश्वर  थाम  लेते  हैं  वह  हमें झुकने  और  गिरने  नहीं  देते ।मै कविता, कहानी  लेख  भी  लिखती हूँ  मेरा  एक  काव्य  संग्रह  *मन  की उङान* सन 2013 में प्रकाशित  हो चुका है।

इन्दौर की साहित्यिक संस्था इन्दौर  लेखिका  संघ  की  लगभग  10 वर्षों  से  सदस्य  हूँ ।जहाँ  सभी  का  अपनत्व  मेरा  हौसला  बढ़ाता  है। बस, और क्या चाहिए मुझे..।

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