-आत्मदीप

आज कई लोगों ने खुद को आरटीआई कार्यकर्ता घोषित कर सूचना के अधिकार को सूचना का रोजगार बना लिया है। किसी भी तरह अनुचित लाभ उठाने के लिए ऐसे तत्व अक्सर हर कहीं आरटीआई, शिकायत है व अपील दायर करते हैं। इनके मामले निपटाने पर सार्वजनिक संसाधनों का बहुत अपव्यय होता है

जनता का ब्रह्मास्त्र है सूचना का अधिकार। संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत इसे मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया है। सरकार व सरकारी तंत्र को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने और सार्वजनिक क्रियाकलाप में शुचिता (निर्मलता) व पारदर्शिता लाने का यह प्रभावी उपकरण है। हर भारतीय को यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का चौकीदार बनने की ताकत देता है। सार्वजनिक व्यवस्था की गड़बड़ियों को दूर कर उन्हें दुरुस्त करने के उद्देश्य से जनता को यह शक्तिशाली अधिकार दिया गया। लेकिन इसकी मौजूदा व्यवस्था में इस महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार की राह को मुश्किल बना दिया है। इस पर राष्ट्रीय बहस करने की जरूरत है।‌

भारत में सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई एक्ट) 12 अक्टूबर 2005 को लागू किया गया। इस कानून को दुनिया के श्रेष्ठ कानूनों में गिना जाता है। लेकिन 15 वर्षों बाद भी इसके अनुकूल परिणाम सामने क्यों नहीं आ सके? आइए इससे जुड़े कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर मंथन करें। ये वो पहलू हैं जो मध्यप्रदेश के सूचना आयुक्त के रूप में 5 साल काम करने के दौरान उजागर हुए हैं। 

स्कूल या कॉलेज कोर्स में शामिल करें

देश की अधिकतर जनसंख्या अपने मौलिक अधिकार से वंचित है। आज मुश्किल से 1% नागरिक ही इस अधिकार का प्रयोग कर पा रहे हैं। विडंबना है कि उच्च शिक्षित अखिल भारतीय और राज्यस्तरीय सेवाओं के अधिकारियों को भी इस कानून की पर्याप्त जानकारी नहीं है। सीबीएसई की तर्ज पर राज्यों के शिक्षा बोर्ड भी अपने पाठ्यक्रम में इस कानून को शामिल कर नई पीढ़ी को जागरूक बना सकते हैं। 

समूचे तंत्र में सुधार की जरूरत 

संविधान में सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों को लोक सेवक यानी जनता के नौकर के रूप में परिभाषित किया गया है। लेकिन व्यवहार में स्थिति इसके उलट है। सरकारी व्यवस्था के सहारे वे लोकस्वामी बन बैठे हैं। तंत्र पर लोक के होने की हावी होने की बजाय लोक पर तंत्र को हावी होने से लोकतंत्र की परिभाषा ही बदल गई है। इसे सुधारने का कारगर हथियार है- सूचना का अधिकार।  सरकार आरटीआई एक्ट के क्रियान्वयन से जुड़े लोक सेवकों को नियमित रूप से इसका प्रशिक्षण देने के कानूनी प्रावधान अनिवार्य करे। 

अनिवार्य प्रावधान की भी अनदेखी 

इस कानून की धारा 4 में लोक प्राधिकारी की बाध्य  शर्तें सुनिश्चित हैं। यह अनिवार्य है कि हर लोक प्राधिकारी अपने कार्यालय से संबंधित 17 बिंदुओं की जानकारियां सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करे और उन्हें हर साल अपडेट करे। इन बिंदुओं में लोक महत्व के काफी जानकारियां इसलिए शामिल की गई हैं ताकि लोगों को आरटीआई लगाने की जरूरत ना पड़े। इसी धारा में यह बात भी निश्चित की गई है कि हर लोक प्राधिकारी अपने कार्यालय के सारे रिकॉर्ड को इस तरह सूचीबद्ध और व्यवस्थित ढंग से रखे कि किसी दस्तावेज को खोजने में कोई दिक्कत ना आए। इन प्रावधानों को पालन कराने के लिए सरकार सख्त कदम उठाए।

अपीलीय अधिकारियों की कमजोर स्थिति 

आरटीआई लगाने के बाद 30 दिन की निर्धारित अवधि में चाही गई जानकारी ना मिलने पर आवेदक प्रथम अपील करता है। पर बड़ी संख्या में प्रथम अपीलीय अधिकारी अपने अर्ध न्यायिक दायित्व का न्यायोचित ढंग से निर्वहन नहीं करते। फिर भी उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती। अपीलीय अधिकारियों को दंड देने की शक्ति ना दिए जाने के कारण प्रथम अपील पर दिए गए उनके आदेश का कई लोक सूचना अधिकारी पालन नहीं करते। इससे लोगों को समय पर जानकारी नहीं मिलती और सूचना  आयोगों पर भी काम का बोझ बढ़ता है। इस स्थिति में सुधार के लिए अपीलीय अधिकारियों को समुचित प्रशिक्षण और दंडात्मक शक्ति देने की जरूरत है।

सूचना आयोगों की हालत

प्रथम अपील पर न्याय न मिलने पर लोगों की द्वितीय (अंतिम) अपील सुनकर फैसला करने के लिए केंद्रीय सूचना आयोग व राज्य सूचना आयोग बनाए गए हैं। इन आयोगों को पर्याप्त शक्तियां, स्वायत्तता व काम करने की पूरी स्वतंत्रता देकर कानूनन काफी मजबूत बनाया गया है। दंड देने व जांच करने के अलावा यह आयोग सिविल कोर्ट की शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं। गिरफ्तारी वारंट भी जारी कर सकते हैं। लोगों को सूचना के अधिकार का जो कुछ भी लाभ मिल रहा है वह आयोगों को प्राप्त इन शक्तियों का ही परिणाम है। ये शक्तियां ही इस अधिकार की सबसे बड़ी संरक्षक सिद्ध हो रही हैं। ये शक्तियां ना होतीं तो यह अनमोल अधिकार दिखावा बनकर रह जाता। 

सरकारें आयोगों में स्वीकृत पदों व आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त संख्या में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति प्राय: नहीं करतीं। आयोगों को जरूरत के मुताबिक कार्यकुशल स्टाफ मुहैया कराने का जिम्मा भी सरकार ठीक से नहीं निभातीं। नतीजतन लोगों की शिकायतों वह अपीलों के टनिराकरण में देरी होती है।

नियुक्तियों में प्राथमिकता किसे

अधिकतर सरकारें मुख्य सूचना आयुक्त व सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्ति में सुपात्र नागरिकों की बजाय सेवानिवृत्त नौकरशाहों को प्राथमिकता देती हैं। भले ही उनका सेवाकाल कैसा भी रहा हो उनका चयन भी मेरिट के आधार पर नहीं किया जाता है। सरकारिया आयोग की संसद में स्वीकृत सिफारिशों में साफ कहा गया है कि सूचना आयोग में सिविल सोसाइटी के श्रेष्ठ जनों को अधिक से अधिक संख्या में नियुक्त किया जाना चाहिए, रिटायर्ड नौकरशाहों को नहीं। वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में गठित दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी सूचना आयोगों में गैर नौकरशाहों को नियुक्त करने की सिफारिश की थी लेकिन सरकारें इसके उलट काम कर रही हैं। 

गलत फैसले से निजात आसान नहीं

कुछ सूचना आयुक्त शिकायतों व अपीलों पर त्रुटिपूर्ण आदेश पारित कर देते हैं। ये आदेश आरटीआई एक्ट के प्रावधानों, न्यायिक विवेक और प्राकृतिक न्याय शास्त्र के सिद्धांतों की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं। ऐसे आदेश लोगों का बुरी तरह आहत करते हैं। ऐसे गलत फैसलों से निजात पाना जनता के लिए आसान नहीं है। कारण कि मुख्य सूचना आयुक्त आयुक्तों के निर्णय अंतिम और सभी पक्षों के लिए बाध्यकारी होते हैं। यह आयुक्त अपील या शिकायत पर पारित आपने आदेश पर पुनर्विचार की मांग भी प्राय: ठुकरा देते हैं। यह कहकर कि आयोग को अपने फैसले का पुनरीक्षण करने का अधिकार नहीं है। आयोग के फैसलों के खिलाफ कहीं अपील भी नहीं की जा सकती। सिर्फ हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की जा सकती है। जिस पर औसतन ₹20000 से अधिक का खर्च आता है। जिसे वहन करना आम जनता के बस की बात नहीं। ऐसे में आयोग के निर्णय से व्यथित लोग मायूस होकर रह जाते हैं। इस व्यवहारिक समस्या के समाधान के लिए ऐसा कानूनी उपाय करने की बेहद जरूरत है जो आम आदमी की पहुंच में हो।

आरटीआई का दुरुपयोग रोकें

सूचना का अधिकार सद्भाविक प्रयोजन के लिए दिया गया है। इसका दुरुपयोग करना इस अधिकार के पावन ध्येय के साथ अन्याय है। आज कई लोगों ने खुद को आरटीआई कार्यकर्ता घोषित कर सूचना के अधिकार को सूचना का रोजगार बना लिया है। किसी भी तरह अनुचित लाभ उठाने के लिए ऐसे तत्व अक्सर हर कहीं आरटीआई, शिकायत है व अपील दायर करते हैं। इनके मामले निपटाने पर सार्वजनिक संसाधनों का बहुत अपव्यय होता है। इनके कारण सदुपयोग करने वालों को जरूरी जानकारी/राहत मिलने में देरी होती है और कानून की छवि बिगड़ती है। लोक सेवकों व नागरिकों को इस कानून के प्रयोजन व प्रावधानों की सही जानकारी देकर सरकार दुरुपयोग की बढ़ती प्रवृत्ति को हतोत्साहित कर सकती है। 

राजनीतिक दल भी दायरे में हों 

राजनीतिक दल स्वयं को आम जनता की सेवा में समर्पित बताते हैं। उसी जनता को वे अपने कामकाज आय-व्यय आदि की जानकारी देने को तैयार नहीं हैं। केंद्रीय सूचना आयोग कुछ वर्ष पूर्व फैसला सुना चुका है कि सरकार से सुविधाएं पाने वाले दल आरटीआई एक्ट के दायरे में आते हैं। इसलिए वे नागरिकों को उनके बारे में मांगी गई सूचनाएं देने के लिए बाध्य हैं। इस न्यायसंगत निर्णय को शिरोधार्य कर जनता को अपने बही-खाते बताने की बजाय वे हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचे ताकि सर्वहितकारी फैसले को खारिज कराया जा सके।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व मध्यप्रदेश के पूर्व सूचना आयुक्त हैं।)

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