शिवम सिंह

नई दिल्ली। देश की अर्थव्यवस्था को लेकर IMF यानि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक की रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत साउथ एशिया का सबसे गरीब देश बनने की ओर अग्रसर है. रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि केवल नेपाल और पाकिस्तान ही प्रति व्यक्ति जीडीपी में  भारत से कमजोर रह सकते हैं. बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान और मालदीव जैसे देश भारत को पीछे छोड़ देंगे.
आकड़ों से जानिए भारत की स्थिति- 
आईएमएफ ने एक ग्राफ जारी किया है जिसमें भारत, बांग्लादेश और नेपाल के प्रति व्यक्ति जीडीपी के आंकड़ों को दिखाया गया है. इस ग्राफ में देखेंगे कि साल 2020 में बांग्लादेश में प्रति व्यक्ति जीडीपी 4 फीसदी की दर से बढ़ते हुए 1888 डॉलर के लेवल पर पहुंच सकती है, वहीं भारत 10.5 फीसदी की गिरावट के साथ 1877 डॉलर पर आ सकता है.
बांग्लादेश ने भी भारत को पीछे छोड़ा
चर्चित अर्थशास्त्री कौशिक बसु कहते हैं कि, ‘IMF ने जो अनुमान लगाया है उसमें प्रति व्यक्ति जीडीपी में बांग्लादेश भारत को 2021 में पीछे कर देगा. विकासशील वास्तव में बेहतरीन काम कर रहे हैं. लेकिन भारत के आंकड़ें वास्तव में निराश करने वाले हैं. पांच साल पहले ही बांग्लादेश भारत से 25 फीसदी पीछे था. देश को ठोस फैसले लेने की जरुरत है.’
वहीं सरकार ने आईएमएफ के इस अनुमान को कोई तरजीह नहीं दिया है. सरकार का कहना है कि 2019 में पीपीपी के लिहाज से भारत की पर कैप्टा जीडीपी बांग्लादेश से 11 गुना ज्यादा बड़ा था.
हंगर इंडेक्स में भी भारत की स्थिति बदतर-
ये सबसे ज्यादा झटका देने वाली खबर है कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2020 में अफगानिस्तान को छोड़कर भारत बाकी सभी देशों से नीचे चला गया है. भारत की रैंकिंग 94वें स्थान पर चली गई है. इसमें पड़ोसी देशों की हालात काफी अच्छी है. पाकिस्तान 88वें, बांग्लादेश 75वें, नेपाल 73वें  और श्रीलंका 64वें स्थान पर है. ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत को बेहद गंभीर श्रेणी वाले देशों में रखा गया है. बांग्लादेश को भी इसी कैटेगरी में रखा गया है लेकिन उसकी हालात भारत से बेहतर है और वो लगातार सुधार कर रहा है.
5 ट्रिलियन डॉलर का सपना और -23 जीडीपी
पीएम मोदी ने भारतवासियों को सपने दिखाए थे कि साल 2024-25 तक देश की इकोनॉमी 5 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगी. लेकिन केंद्र सरकार की सांख्यिकी मंत्रालय ने एक रिपोर्ट जारी किया जिसमें बताया कि साल 2020-21 वित्त वर्ष में भारत का विकास दर -23 फीसदी रहेगी. जीडीपी के इन नए आंकड़ों को 1996 के बाद से सबसे बड़ी गिरावट के रुप में देखा जा रहा है. इन आंकड़ों पर मंत्रालय ने कहा है कि कोरोना वायरस महामारी के कारण इतनी गिरावट दर्ज की गई है. लॉकडाउन की वजह से देश में आर्थिक गतिविधियां रुक गई थीं जिसकी वजह से जीडीपी का ये हाल हुआ है. लेकिन सवाल ये है कि क्या लॉकडाउन के बाद बंद कंपनियां फिर से शुरु हुईं, या जिनकी नौकरियां गईं थीं उन्हें फिर से रोजगार मिला.
ब्रिकवर्क रेटिंग का क्या कहना है?
टॉप रेटिंग एजेंसी ब्रिकवर्थ का कहना है कि अर्थव्यवस्था में सुधार थोड़ी बहुत हो रही है लेकिन यह स्थाई नहीं है. रिपोर्ट्स के मुताबिक जुलाई-सितंबर 2020 में भारतीय अर्थव्यवस्था में 13.5 फीसदी की कमी देखी जा सकती है. वहीं पूरे फाइनेंशियल ईयर 2020-21 के दौरान यही दर 9.5 तक घट सकता है. ब्रिकवर्थ ने यह भी कहा कि मोदी सरकार अगर सख्त फैसले जल्द से जल्द नहीं लेती है तो अर्थव्यवस्था सुधरने के बजाय तेजी से बिगड़ सकती है. ब्रिकवर्थ ने कहा है कि इन दिनों कई सेक्टर्स में सुधार दिख रहे हैं लेकिन ये ज्यादा दिनों के लिए नहीं है.
एग्रीकल्चर सेक्टर में गिरावट कम लेकिन कृषि कानूनों से किसान हताश
कृषि में 3.4, कंस्ट्रक्शन में -50.3, होटल और ट्रांसपोर्ट में -47, मैन्युफैक्चरिंग में -39.3, माइनिंग में -23.3 और वित्तीय सेवा और रियल एस्टेट में -5.3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. ये आंकड़ें अप्रैल से जून तिमाही के हैं. इस दौरान देशभर में लॉकडाउन था. जून के बाद अनलॉक किया गया था लेकिन उसके बाद के आंकड़े राहत देने वाले नहीं हैं.
इन सब के बीच कृषि ही एक ऐसा सेक्टर है जिसमें ज्यादा गिरावट दर्ज नहीं की गई. लेकिन मोदी सरकार ने कृषि कानून लाकर उसे भी गर्त में ले जाने वाली है. पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में इन कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी हैं. किसान बिना एमएसपी के ही सस्ते दामों पर धान बेच रहे हैं. ऐसे में कृषि से आगे के लिए ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती है.
20 लाख करोड़ के राहत पैकेज के बावजूद कंपनियां बंद और नौकरियां गईं
इन आंकड़ों पर गौर किया जाए तो समझा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था लगातार गर्त में जा रही है और सुधरने की गुंजाइश भी दूर-दूर तक नहीं दिख रही है. सरकार ने 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज दिए लेकिन लाखों छोट-मोटी कंपनियां बंद हो गईं. देश में करोड़ों लोग बेरोजगार हो गए. न तो बंद कंपनियों को शुरु करने के लिए कोई राहत दिया गया और न ही बेरोजगार हुए लोगों को वापस नौकरियां दी गईं. बस वीडियो कॉन्फ्रेंस में लाखों नौकरियां देने का झूठ परोसा जाता है.
सरकार का ध्यान तो ह्वाट्सएप्प चैट लीक कराने में है
गिरती अर्थव्यवस्था, पड़ोसियों से तनाव, कोरोना से हारते लोग, किसान विरोधी कानून जैसे मसलों पर सरकार आंखें बंद की हुई है. आंखें सिर्फ सुशांत मामले में ड्रग एंगल देने के लिए खोलती है. फिल्म एक्ट्रेसेस के ह्वाट्सएप्प चैट लीक कराती है. हाथरस जैसे मामलों में विदेशी कॉन्सपिरेसी खोजती है. वास्तव में अर्थव्यवस्था जैसी चीजों पर सरकार गंभीर नहीं होना चाहती.(साभार)

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