विजय बुधोलिया.

आद्यशक्ति जगदम्बिका की कृपा के बिना दुनिया के कोई भी कार्य संभव नहीं है। समस्त शक्ति की स्त्रोत वे ही हैं। रावण से युद्ध के पूर्व श्रीराम ने भी नवरात्रि का व्रत कर माता जगदम्बिका की आराधना की थी। शिव के साथ शक्ति की उपासना करना स्वाभाविक बात प्रतीत है। क्योंकि दोनों ही श्रद्धा और विश्वास के रूप हैं (भवानी शंकरौ वन्दे,श्रद्धा-विश्वास रूपिणौ।) पर वाल्मीकि रामायण में ऐसा कोई प्रसंग उपस्थित नहीं हुआ है,जिसमें श्रीराम को भगवती की पूजा करते हुए बताया गया हो। हाँ,भगवान शंकर की उपासना  वे अवश्य करते हैं।

रावण विजय के बाद जब राम लौटते हैं,तब सीताजी को सेतु दिखला कर कहते हैं कि महादेव ने यहाँ मुझ पर अनुग्रह किया था–अत्र पूर्वं महादेव: प्रसादमकरोद्विभु:। सेतु बाँधने के पूर्व मेरे द्वारा स्थापित होकर वे यहाँ विराजमान हुए थे। मानस में भी सेतु निर्माण के समय श्रीराम के मन में वहाँ शिवलिंग की स्थापना का विचार उठता है। तब वे यह बात वानरराज सुग्रीव को बताते हैं। सुग्रीव तुरंत वानरों के जरिए मुनियों को बुलवा लेते हैं और शंभु की स्थापना हो जाती है।

 “करिहऊँ इहाँ संभु थापना। मोरे हृदयँ परम कलपना।।सुनि कपीस बहु दूत पठाए। मुनिबर सकल बोलि लै आए।। लिंग थापि बिधिवत करि पूजा। सिव समान प्रिय मोहि न दूजा।”

यहाँ प्रश्न यह उठाया जाता है कि श्रीराम ने शिव के साथ भवानी की पूजा क्यों नहीं की थी? बात उचित भी लगती है। पर इसका समाधान यह कह कर दिया जाता है कि माँ जगदंबिका स्वरूप सीता जी स्वयं सदैव राम के हृदय में विराजमान रहती थीं,इसलिए उन्हें अलग से उनकी पूजा करने की आवश्यकता प्रतीत नहीं हुई होगी।श्रीराम और माता सीता कितने अभिन्न थे,वह इस छंद में दिखाई देता है-’एहि के हृदय बस जानकी, जानकी उर मम बास है। मम उदर भुवन अनेक लागत बान सब कर नास है।।’

किन्तु,कुछ ग्रंथों के अनुसार श्रीराम ने भगवती अम्बिका की पूरे भक्ति-भाव से आराधना की थी। श्री मद् भागवद् कथा के अनुसार सीता-हरण के बाद नारद के उपदेश के अनुसार राम रावण पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से यथा-विधि नवरात्रौपवास करते हैं। इस कार्य में नारद जी भी उनकी सहायता करते हैं।इसके अन्त में ‘सिंहासनरूढ़ा देवी भगवती’ राम को दर्शन देकर रावण पर विजय का आश्वासन देती हैं। बाद में राम विजया-पूजा करके वानर-सेना सहित समुद्र की ओर प्रस्थान करते हैं।

महाभागवत पुराण की एक कथा के अनुसार जब देवता रावण-वध करने के लिए विष्णु से अवतार लेने की प्रार्थना करते हैं, विष्णु उनसे कहते हैं कि जब तक ‘देवी’ लंका में निवास करती हैं,मैं रावण को पराजित नहीं कर सकता। बाद में सब मिलकर कैलास पर देवी के पास जाते हैं। देवी सीता-हरण के कारण लंका छोड़ देने की प्रतीज्ञा करती हैं एवं शिव हनुमान् का रूप धारण कर राम की सहायता करने का वचन देते हैं।

वृहद्धर्मपुराण और महाभागवत पुराण के अनुसार हनुमान् शिव के अवतार हैं और देवी लंका में निवास करती हैं।लंका में जाकर हनुमान् देवी के मंदिर में जाकर उन्हें अपना परिचय देते हुए बताते हैं कि मैं ही शिव हूँ और उनसे लंका छोड़ देने की प्रार्थना करते हैं। सीता के अपमान के कारण रावण से अप्रसन्न होकर देवी लंका छोड़ देती हैं। युद्ध के वर्णन में राम के देवी से प्रार्थना करने का अनेक स्थलों पर उल्लेख है,अंत में राम देवी से अमोघ शस्त्र ग्रहण कर रावण को मारने में समर्थ होते हैं। ब्रह्मा भी राम की विजय के लिए देवी की मृण्मयी मूर्ति बनाकर उनकी पूजा करते हैं।

इससे पता लगता है कि माँ जगदम्बिका सदैव अपने भक्तों की सहायता के लिए उपस्थित रहती हैं।श्रीराम की भी हर समय उन्होंने सहायता की।

(बुधोलिया रामकथा के अध्येता हैं।)

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