विजय बुधोलिया

रामायण की लोकप्रियता के साथ-साथ श्रीराम का महत्व भी बढ़ने लगा था। उनके चरित्र-चित्रण में अलौकिकता भी आ गई थी। इस प्रवृत्ति की सहज परिणति यह हुई कि कृष्ण की तरह राम भी विष्णु के अवतार माने जाने लगे। कालान्तर में विष्णु की प्रतिष्ठा बढ़ गई और वे प्रमुख देवता व जगत के नियंता माने जाने लगे। इसलिए स्वाभाविक था कि श्रीराम को विष्णु का अवतार माना जाए।

श्रीराम, श्रीकृष्ण से शताब्दियों पहले हुए थे। हिन्दू काल-गणना के अनुसार एक युग पहले, पर आश्चर्य की बात है कि श्रीराम की भक्ति की धारा श्रीकृष्ण की भक्ति से सदियों के बाद बही। यह जानना रुचिकर होगा कि ऐसा कैसे हुआ।

वासुदेव कृष्ण भागवतों के आराध्य देव थे। अध्येताओं का ऐसा मत है कि प्रारम्भ में उनका और विष्णु का कोई भी सम्बन्ध नहीं था। पहली बार तैत्तरीय आरण्यक में वासुदेव और विष्णु की अभिन्नता का उल्लेख मिलता है।इससे अवतारवाद को बहुत प्रोत्साहन मिला। साथ साथ अवतारवाद की सारी भावना धीरे-धीरे विष्णु-नारायण में केन्द्रीभूत होने लगी और वैदिक साहित्य के अन्य अवतारों के कार्य विष्णु में ही आरोपित किए गए। भागवतों के इष्टदेव वासुदेव कृष्ण भी विष्णु के पूर्ण अवतार माने जाने लगे।

लेखक

दूसरी ओर रामायण की लोकप्रियता के साथ-साथ श्रीराम का महत्व भी बढ़ने लगा था। उनके चरित्र-चित्रण में अलौकिकता भी आ गई थी। इस प्रवृत्ति की सहज परिणति यह हुई कि कृष्ण की तरह राम भी विष्णु के अवतार माने जाने लगे। इसके कारण वाल्मीकि रामायण में कई जगहों पर रामावतार विषयक कई सामग्री का समावेश हो गया। इसलिए रामकथा का आदर्श क्षत्रिय और धर्मात्मा राम का चरित्र न रहकर विष्णु की अवतार-लीला में के रूप में परिणत हो गया।

फिर भी वाल्मीकि रामायण में श्रीराम को पुरुषोत्तम और परमात्मा माने जाने के बीच का असमंजस स्पष्ट देखा जा सकता  है। कहीं उन्हें अवतार निरूपित किया गया है तो कहीं श्रेष्ठ मानव के तौर पर लिया गया है। बालकांड पुत्रेष्टि-यज्ञ में विष्णु का अवतार लेने की कथा विस्तार में वर्णित है। एक स्थल पर परशुराम राम से कहते हैं कि मैं आपको विष्णु मानता हूँ और आपसे पराजय कोई लज्जा की बात नहीं है- ‘अक्षय्यं मधुहन्तारं जानामि त्वां सुरेश्वरम्।। न चेयं तव काकुत्स्थ व्रीडा भवितुमर्हति। त्वां त्रैलोक्यनाथेन यदहं विमुखीकृत:।।’

यद्यपि बालकांड स्वयं प्रक्षिप्त है, फिर भी इनमें दो जगहों पर राम के अवतार होने का उल्लेख है। मूल बालकांड के रचनाकाल में राम अवतार नहीं माने जाते थे, इसके बालकांड में स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। प्रथम सर्ग में राम का उत्कर्ष वर्णित है,किन्तु उनके अवतार होने का उल्लेख नहीं है। केवल विष्णु से उनकी तुलना की जाती है (विष्णुना सदृष्यो वीर्य्ये)। और अंत में कहा जाता है कि राम अपना राज्य भोग कर ब्रह्म लोक को जाएँगे- ‘रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति।’

विश्वामित्र राम से ताड़का के वध करने का अनुरोध कर विष्णु द्वारा भृगुपत्नी के वध का उदाहरण देते हैं और सिद्धाश्रम के विषय में कहते हैं कि विष्णु ने वहाँ तप किया था- ‘इह राम महाबाहो विष्णुर्देवनमस्कृत:। वर्षाणि सुबहूनीह तथा युगशतानि च।। तपश्चरण योगार्थमुवास सुमहातपा:।।’ इससे स्पष्ट है कि विश्वामित्र राम के अवतार होने से अनभिज्ञ थे।

अयोध्याकांड में केवल एक जगह राम के अवतार होने का उल्लेख है-’स हि दैवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थभि:। अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णु: सनातन:।।’ अरण्यकाण्ड में चार स्थलों पर राम की दिव्यता का वर्णन है। दक्षिणात्य पाठ में अकंपन राम के पराक्रम का वर्णन करते हुए कहता है कि राम समस्त लोकों का नाश कर पुन: सबकी सृष्टि करने में समर्थ हैं। इसी पाठ में लक्ष्मण राम के दिव्य तथा मानवीय पराक्रम का उल्लेख करते हैं- ’दिव्यं च मानुषं चैवमात्मनश्च पराक्रम्’

किष्किंधाकांड में राम अवतार संबंधी कोई सामग्री नहीं मिलती। सुंदरकांड में हनुमान् अशोकवन में प्रवेश करने से पहले देवताओं की तथा राम,लक्ष्मण और सीता की स्तुति करते हैं- ‘नमोअस्तु रामाय सलक्ष्मणाय देव्यै च तस्यै जनकातमजायै। नमोअस्तु रुद्रेन्द्रयमानिलेभ्यो नमोअस्तु चन्द्राग्निमरुद्गणेभ्य:।।’ हनुमान्-रावण संवाद के एक अंश के अनुसार हनुमान् राम के विषय में कहते हैं कि वे विष्णुतुल्यपराक्रम, सर्वलोकेश्वर, लोकत्रयनाथ आदि हैं।

युद्धकांड में अवतारवादी सामग्री सबसे अधिक मिलती है। क्योंकि युद्धकांड सबसे अधिक विस्तृत है और इसमें सबसे अधिक प्रक्षेप जोड़े गए हैं। अग्निपरीक्षा के समय देवता आकर राम की विष्णुरूप में स्तुति करते हैं। इसमें सीता और लक्ष्मी को एक ही बताया गया है। दशरथ भी राम से कहते हैं कि वह पुरुषोत्तम ही हैं- ‘इदानीं च विजनामि यथा सौम्य सुरेश्वरै:। वधार्यं रावणेस्येह पिहितं पुरुषोत्तमम्।।’ इसके बाद दशरथ लक्ष्मण को संबोधित करके राम को पुरुषोत्तम,अक्षर ब्रह्म आदि मानते हैं।

फलश्रुति में विष्णु और राम की अभिन्नता मानी गई है- ’प्रीयते सततं राम: स हि विष्णु: सनातन:। आदिदेवो महाबाहुर्हरिर्नारायण: प्रभु:।।’ नागपाश के वृतान्त में,नारद राम के पास पहुँचकर उनको उनके नारायणत्व का बोध कराते हैं।

उत्तरकांड में तो राम के अवतार होने संबंधी सामग्री भरी पड़ी है। क्योंकि इस कांड का निर्माण राम के नारायण  होने की भावना की स्थापना के बाद हुआ था। रामायण के कतिपय अंश ऐसे भी हैं,जिसमें ध्वनित होता है कि रामायण के प्रधान पात्र राम के अवतार होने से परिचित नहीं है। सीता अपने आप को साधारण स्त्री मानती हैं और अपने इस जन्म के दु:खों का कारण पूर्वजन्म किए हुए पाप समझती हैं। यही नहीं,राम का अवतार होना भी उनसे छिपा हुआ है। वह राम की तुलना विष्णु से करती हैं। राक्षसों के प्रति राम की कठोर प्रवृति को देखकर वह राम के परलोक के विषय में चिंतित हैं। लक्ष्मण भी राम को सांत्वना देते हुए कहते हैं- ‘प्रापस्यसे त्वं महाप्राज्ञ मैथिलीं जनकात्मजां। यथाविष्णुर्महाबाहुर्बलिं बद्धवा महीमिमां।।’

हनुमान् राम की तुलना विष्णु से करते हैं और राम से कहते हैं कि जिस तरह विष्णु गरुड़ पर आरूढ़ होते हैं, उसी प्रकार आप मेरे पीठ पर चढ़िए- ‘मम पृष्ठं समारुह्म राक्षसं शास्तुमर्हसि। विष्णुर्यथा गरुत्मन्तमारुह्यामरवैरिणाम्।।’

राम का दूत बनकर हनुमान् रावण से कहते हैं कि मैं विष्णु की ओर से नहीं आया हूँ,बल्कि राम की ओर से आया हूँ- ‘विष्णुना नास्मि च् उदित:।।’ अगस्त्य राम को विष्णु का धनुष देते हुए राम और विष्णु की अभिन्नता से परिचित नहीं हैं- ’इदं ददिव्यं महच्चापं हेमवज्रविभूषितम्। वैष्णवं पुरुषव्याघ्र निरमितं विश्वकमर्णा।।’

यहाँ तक कि राम न केवल नारायण तथा मधुसूदन से प्रार्थना करते हैं, विधाता के विरुद्ध अपराध करने से डरते हैं, अधर्म तथा परलोक के भय से राज्याधिकार नहीं प्राप्त करते है, वरन स्वयं को साधारण मनुष्य समझकर विश्वास करते हैं कि पूर्वजन्म के किए हुए पापों का मुझे इसी जन्म में फल भोगना है- ‘पूर्व मया नूनमभीप्सितानि पापानि……किं मया दुकृत्यं कर्म कृतमन्यत्र जन्मनि।’

इसके अलावा अवतारवाद की भावना की नवीनता ब्रह्मा के प्रति राम की उक्ति से स्पष्ट है–‘मैं तो अपने-आप को मनुष्य,दशरथ का पुत्र समझता हूँ। वास्तव में मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, इसे आप मुझसे कहिए’ (आत्मानं मानुषं मन्ये रामं दशरथात्मजम्। सोअहं यशच यतश्चाहं भगवांस्तद ब्रवीतु मे।।)

रामायण में अनेक पात्र राम की तुलना विष्णु से करते हैं। इनका अर्थ यह है कि वे राम और विष्णु को अलग-अलग समझते हैं। अन्य स्थलों पर कवि स्वयं इस तुलना का प्रयोग करते हैं अथवा अन्य पात्रों से करवाते हैं जैसे अनसूया,देवता, अयोध्यावासी। न केवल राम की वरन् अन्य पात्रों की तुलना भी विष्णु से की जाती है।जैसे रावण,अतिकाय, इन्द्रजित,हनुमान्। दूसरी ओर राम की तुलना अन्य देवताओं से भी की जाती है- ‘इन्द्र,ब्रह्मा,रुद्र,बृहस्पति,कुबेर या वैश्रवण,वरुण,धर्म,कामदेव,अग्नि,यम, पर्जन्य।’

विष्णु तथा इन्द्र से जो तुलना की गई है, यह स्पष्ट है कि आदिरामायण में विष्णु की अपेक्षा इन्द्र का स्थान ऊँचा माना गया था। राम की तुलना विष्णु से १८ बार की जाती है, इन्द्र से ७७ बार। वैदिक साहित्य में विष्णु इन्द्र के अनुज माने जाते रहे हैं। वैदिक साहित्य के अनुसार भी प्रामाणिक आदिरामायण में इन्द्र सर्वश्रेष्ठ देवता थे। राम की विजय इन्द्र की सहायता से होती है, इससे भी इन्द्र की श्रेष्ठता का पता चलता है। किन्तु, कालान्तर में विष्णु की प्रतिष्ठा बढ़ गई और वे प्रमुख देवता व जगत के नियंता माने जाने लगे। इसलिए स्वाभाविक था कि श्रीराम को विष्णु का अवतार माना जाए।

राम के अवतार के रूप में स्वीकृत हो जाने के शताब्दियों बाद रामभक्ति का अाविर्भाव हुआ। सर्वप्रथम रामभक्ति का प्राकट्य तमिल आल्वारों की रचनाओं में हुआ। इसके बाद रामानुज सम्प्रदाय के अन्तर्गत राम-भक्ति और रामोपासना से संबंधित संहिताओं और उपनिषदों की रचना हुई। आगे चलकर रामानन्द तथा रामावत सम्प्रदाय द्वारा रामभक्ति जनसाधारण की धार्मिक चेतना का केन्द्र बन गई। उस समय बहुत से रामायणों की रचना हुई, जिनमें अध्यात्म रामायण निश्चय ही सबसे महत्वपूर्ण है। १४ वीं शताब्दी में समस्त भारतीय रामकथा साहित्य भक्तिभाव से ओतप्रोत होता गया। राम विष्णु के अंशावतार न रहकर परब्रह्म के पूर्णावतार माने जाने लगे। आगे चलकर गोस्वामी तुलसीदास ने इस रामभक्ति को अपनी अमर रचना ‘रामचरित मानस’ में एक काव्यात्मक और हृदयग्राही रूप दिया है। जनसाधारण को आज राम-भक्ति की रस-धारा अवगाहन करने हेतु रामचरित मानस ही एकमात्र सरिता बन गई है। (इंडिया डेटलाइन)

(बुधोलिया भोपाल में रामकथा के मर्मज्ञ हैं।) 

Spread the love

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here