जयराम शुक्ल

दादी माँ कहा करती थी- “जेखा जेतनिन गारी मिलति है ओखर उतनै उमिर बढ़ति है तूँ ओखर जवाब भर न दिहे कबौ”। यानी कि जिसको जितनी गालियां मिलती हैं वह उतना ही चिरंजीवी होता है। संतों-कवियों ने भी माना है- बूँद अघात सहहिं गिरि कैसे। खल के वचन संंत सहै जैसे।। गालियांं उल्टे देने वाले के पास लौट जाती है। गाँव में तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, मूठ का कभी बड़ा डरावना चलन था। इससे बचने के लिए बड़े बूढ़े कहते थे कि आचरण शुद्ध रखो, हर समय हरि का स्मरण करो तो यह किसी का कुछ नहीं बिगड़ेगा, उल्टा जादू-टोना वाला ही अपने ही मंत्र का शिकार बन जाएगा।

ऐसा होते मैंने देखा भी है। अपने शहर में एक पढ़े लिखे तांत्रिक थे। सुबह से शाम तक उन्हें सिर्फ यही चिंता सताती थी कि सामने वाला चैन से क्यों है। वे परपीड़ा सुख पाने के लिए वैसे ही सैडिस्ट हो गए जैसे कि स्मैकिए होते हैं। सुबह से शाम तक इनका एक ही काम रहता था..किसी की भी शिकायत करना। सरकारी आदमी है तो उसके अफसर को गुमनाम शिकायत करना। सामान्य आदमी है तो गुमनाम पर्चे बँटवा कर उसका या उसके परिजनों के चरित्र की धज्जियाँ उड़ाना। वे इस काम में इतने सिद्धहस्त हो गए कि लोग अपने दुश्मन से निपटने के लिए इन्हें सुपारी देने लगे। उन्होंने इसे वृत्ति ही बना लिया जैसे अभी भी थाना-अदालतों के बाहर झूठी गवाही देने वालों का धंधा चलता है। 

समय के साथ उन महाशय की शिकायतों का असर कम होता गया..फिर लोगों ने नोटिस लेना बंद कर दिया। भूत की तरह झूठ के भी पाँव पीछे होते हैं। झूठ कभी भी मोर्चे पर नहीं टिकता, वह उल्टे पाँव भागकर खुद का ही घर फूँक देता है। एक दिन उन महाशय के साथ भी ऐसा हुआ। फर्जी शिकायतों के धंधे में पिट जाने के बाद वे तंत्र-मंत्र की विधा में आ गए। वे अपने ग्राहकों के दुश्मनों के लिए मारण-उच्चाटन, पुलःचरण की तांत्रिक क्रिया करने लगे। 

कुछ दिन बाद यह धंधा भी मंदा पड़ गया।  कहते हैं- उघरे अंत न होंहि निबाहू। कालिनेमि जिमि रावन राहू।।

वे समाज से अलग-थलग पड़ते गए पर आदत नहीं गई। फर्जी शिकायतों को अपने नौकरी पेशा भाइयों के खिलाफ आजमाने लगे। उसकी भी पोल खुल गई। तो घर में ही पुलःचरण शुरू हो गया। बीबी उन्हें छोड़कर मायके चली गई। कुछ दिनबाद लोगों को अखबारों के जरिए पता चला कि उन महाशय ने आत्महत्या करली..बस खेल खतम कहानी हजम। 

झूठ और गालियों की तिजारत करने वालों का ऐसा ही हश्र होता है..ऐसा मेरी दादी माँ कहा करती थी। एक तरीके से वह हम बच्चों को बचपन से ही आने वाले दिनों के लिए मानसिक रूप से सहनशील बनाती थी।ंं

किसान आंदोलन के पिछवाड़े से हाय..हाय मोदी मर जा तू,  मोदी तेरी कब्र खुदेगी जैसे संगीतमय नारे जब टीवी में देखते सुनते हैं तो मुझे दादी की सीख याद आती है..जितनी गाली..उतनी ही जीवनशक्ति। मोदी और भी ताकतवर बनकर उभर आते हैं। अस्वीकृत गालियां और बद्दुआएं देने वाले को ही खा जाती हैं। यह होते हम सब देख रहे हैं। 

गाली और बद्दुआओं की सबसे तगड़ी बारिश करने वाला वाम मोर्चा इसी बारिश के सैलाब में बहकर बंगाल की खाड़ी में विसर्जित हो गया। रहे-सहे रूप बदलकर कभी जेएनयू, हैदराबाद, जादवपुर में तो कभी भीमा-कोरेगांव, शाहीनबाग में प्रगट हुए। अब दिल्ली के बार्डर में कथित किसानों के आंदोलन में डफली बजाते नारे लगाते जोश बढ़ा रहे हैं। अब इसका असर देखिए देश की तीन चौथाई किसान इन कृषि सुधारों के पक्ष पर उठ खड़ा हो गया। राजस्थान के पंचायत चुनावों में वहां के किसानों ने एक तरह से सहमति की मुहर लगा दी। तो एक तरह से ये गालियां राजनीतिक सेहत सुधारने का भी काम करती हैं। पता नहीं विरोधी दल अभी तक क्यों नहीं समझ पाए कि मोदी गाली और बद्दुआओं से फुलप्रूफ हैं। जैसा की मेरी दादी कहा करती थी – यदि तुम्हारी नीयत ठीक है, मन और आचरण पवित्र है तो गालियां, बद्दुआएं, तंत्रमंत्र, जादू-टोना, मूठ मारने वालों पर ही पलटवार करते हैं।

क्या यह पलटवार आपने अब नतक नहीं देखा या महसूस किया। याद करिए 2014 व उससे थोड़ा पहले, जब गुजरात के चुनाव हो रहे थे। क्या-क्या नहीं सुना हमने श्रीमानों/श्रीमानियों के श्रीमुख से। नरेन्द्र मोदी..रक्तपिपासु है खून के सौदागर हैं। ये इदी अमीन की तरह मैन ईटर हैं, नादिरशाह की भाँति क्रूर और हिटलर के जैसा तानाशाह। इन गालियों की कृपा से गुजरात में मोदी की ऐसी ऐतिहासिक जीत हुई कि वे देखते ही देखते राष्ट्रीय हो गए। उनकी अगुवाई में जब लोकसभा का चुनाव लड़ा तो एक बड़े बौद्धिक ने ऐलान किया- मोदी जीता और उसकी सरकार बनी तो मैं देश छोड़ दूँगा। मोदी जीते, उनकी सरकार भी बनी पर वे महाशय..हेंहें करते अपने शहर में ही बसे रहे।

देश छोड़ने की बात तो कई मुंबइया बहुरूपियों ने भी की। बहुतों ने गुस्से के मारे अपने अवार्ड लौटा दिए( साथ में मिलने वाला धन और सुविधाएं नहीं)। अभी कोरोना वायरस के दौर में एक बड़े नौकरशाह (अब रिटायर्ड) ने ट्वीट करके मन्नते माँगीं- काश ये कोविड वायरस मोदी तक पहुंच जाए..ताकि हम उन्हें मरते हुए देख सकें।

जब से होश सँभाला मैंने किसी नेता के लिए ऐसी भीषण गालियां और बद्दुआएं नहीं सुनीं। हाँ इससे पहले इंदिराजी के खाते में समाजवादियों की गालियाँ आती थी लेकिन कुछ दिन बाद वे समाजवादी भी कांग्रेस में विलीन हो गए। यही प्रक्रिया मोदी के साथ देख रहा हूँ। पश्चिम बंगाल के जो वामपंथी गालियां देने सबसे आगे रहते थे वे सभी के सब भाजपामय होते जा रहे हैं। कोलकाता के भाजपा दफ्तर के बाहर इनकी लाइन सी लगी है..कि कुछ तो भाव मिले। उनके गाली-गुफ्तार को भूलते हुए मोदी के लोग काफिले को जोड़ते हुए रायटर्स बिल्डिंग की ओर बढ़ रहे है। 

दिल्ली बार्डर में किसानों के पिछवाड़े डफली लिए हुए वे रुदालिए छाती कूट-कूटकर रोने में मगन हैं। राजे-रजवाड़ों के दौर में राजस्थान में एक रुदालियों की प्रथा थी। राजघराने या किसी सामंत के यहां कोई गमी हो जाए तो..किराये से रोने वाले बुलाए जाते थे। वो इसलिए कि बापों के मरने के बाद भी उनकी ऐशभरी जिंदगी में दुख की छाया न पहुंचे। रुदालियों का स्वर और उससे बहने वाली करुणा इस बात पर निर्भर करती थी कि उन्हें दिन भर रोने का रेट क्या मिल रहा है। यानी कि ज्यादा मजूरी ज्यादा रुदन।

इस किसान आंदोलन में..महागठबंधन ने अपने कार्यकर्ताओं को रुदाली बनाकर मोर्चे पर लगा रखा है। शाहीनबाग का जाजम सिमटने के बाद कोरोनाकाल में वे फुर्सत में थे..बेरोजगार। जब सरकारी या किसी की जमीन से अतिक्रमण हटाया जाता है तब वहां काबिज रहे लोग महिलाओं, बच्चों को आगे करके ऐसे ही कातर स्वर में रोते हैं। दरअसल राजनीति की मुख्यधारा की वो पार्टियां जिन्होंने.. अब तक वंशवाद के दम पर, जाति/संप्रदायवाद के आधार पर, क्षेत्रवाद की भावनाओं पर लोकतंत्र के देशव्यापी परिसर पर अतिक्रमण किए हुए थे उनपर बुल्डोजर चलना शुरू हुआ है। इसलिए उन्हें ऐसे हर मुद्दे की तलाश है जिसकी ओटपर खड़े होकर वे अपनी गोट बैठा सकें। 

अब तक के अनुभवों व इतिहास के घटनाक्रमों के देखते हुए उन्हें वक्त की नसीहत नोट करनी चाहिए कि मोदी की असली ताकत आपकी गालियों की ऊर्जा से मिलती है। मोदी को जितनी तेज से गालियाँ दोगे उसके दूने अधोगति को प्राप्त होगे। और हाँ..जान लीजिए आपकी गालियों और मरने की बद्दुआओं को सुनकर सबसे संतुष्ट और आत्मविश्वास से भरा कौन है? वो और कोई नहीं अपितु नरेन्द्र दामोदर दास मोदी ही हैं शायद उन्होंने भी अपनी दादी माँ की उस सीख को गाँठबाँधकर ह्रदयांगम किया होगा कि..मरने की बद्दुआएं आदमी की उम्र बढ़ाती हैं और गालियाँ स्वास्थ्य। सो इस पर एक शेर भी सुनते जाइए-

ऐ खुदा मेरे दुश्मन को सलामत रखना

वरना मेरे मरने की दुआ कौन करेगा। (इंडिया डेटलाइन)

( शुक्ल मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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