विजय बुधोलिया

सनातन धर्म में वेदों के बाद रामायण और महाभारत ही ऐसे महत्वपूर्ण और पवित्र ग्रंथ हैं, जो हिन्दू धर्मावलम्बियों के आस्था के केन्द्र हैं। महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण में श्री हरि विष्णु के मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रूप में अवतार लेकर उनके महान कार्यों का वर्णन है, जबकि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत में श्री हरि विष्णु के श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट होकर धर्म की स्थापना के लिए उनके द्वारा किए गए कार्यों का वर्णन है। चूँकि,रामायण की रचना महाभारत के पूर्व हो चुकी थी इसलिए महाभारत के रचनाकार ने कई स्थलों पर राम-कथा का उल्लेख किया है।

महाभारत में रामकथा का चार स्थलों पर वर्णन किया गया है। जिनमें रामोपाख्यान सबसे विस्तृत है। इन चार रामकथाओं के अतिरिक्त रामकथाओं के पात्रों का पचास स्थलों पर उल्लेख हुआ है।

लेखक

आरण्यक पर्व में रामोपाख्यान के अलावा एक रामकथा और उद्धृत है। भीम-हनुमान् संवाद के अन्तर्गत हनुमान् ग्यारह श्लोकों में वनवास और सीताहरण से लेकर रावण-वध और अयोध्या वापस लौटने तक की कथा संक्षेप में सुनाते हैं। इसमें रामावतार और ग्यारह हजार वर्ष तक राज्य करने का उल्लेख है पर लंकादहन और सीता की अग्नि-परीक्षा का कोई उल्लेख नहीं है।

द्रोणपर्व और शांतिपर्व की रामकथा षोडशराजोपाख्यान (सोलह राजाओं की कथा) के अन्तर्गत मिलती है। पुत्र मरण के कारण शोकातुर सृंजय को सान्त्वना देने के लिए नारद ने उनको सोलह राजाओं की कथा सुनाई थी। ये सभी राजा महान थे, किन्तु उनका समय पूरा होने पर सभी मृत्यु को प्राप्त हुए।

इन सोलह राजाओं में एक राम भी थे। नारद राम की महिमा का वर्णन करते हुए अयोध्याकांड से युद्धकांड के अंत तक की रामकथा की रूपरेखा खींचते हैं। इसमें रामकथा की अपेक्षा रामराज्य की समृद्धि और राम की महिमा को अधिक महत्व दिया गया है। इसमें राम का अभिषेक, राम के गुणों की उत्कृष्टता,यरामराज्य में दुष्टों का अभाव,राम का ग्यारह हजार वर्ष शासनकाल तथा उनका देवलोक गमन का वर्णन है। इस रामकथा में न तो बालकांड और उत्तरकांड की सामग्री सम्मिलित है और न सीता की अग्निपरीक्षा का उल्लेख किया गया है। राम सब प्राणियों,ऋषियों,देवताओं और मनुष्यों में महान कहे जाते हैं, फिर भी रामावतार का कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता।

शांतिपर्व की राम कथा द्रोणपर्व के समान है। पर यहाँ कृष्ण युद्धिष्ठिर को षोडशराजोपाख्यान सुनाते हैं। शांतिपर्व में रामकथा की सामग्री का नहीं के बराबर है। केवल रामराज्य तथा राम की महिमा का वर्णन किया गया है। द्रोणपर्व और शांतिपर्व में यद्यपि रामावतार का उल्लेख नहीं है, किन्तु वनपर्व में तीन स्थलों पर रामावतार का स्पष्ट उल्लेख है। भीम-हनुमान् संवाद में हनुमान् यों कहते हैं: अब दाशरथिर्वीरो रामनामो महाबल:। विष्णुर्मानुष्यरूपेण चचार वसुधामिमाम।।

शांतिपर्व में हरि अपने अवतारों का वर्णन करते हुए कहते हैं: संधौ तु समनुप्राप्ते त्रेतायां द्वापरस्य च। रामो दाशरथिर्भूत्वा भविष्यामि जगत्पति:। स्वर्गारोहणपर्व में भी रामकथा का संकेत दिया गया है: वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ। आदौ चान्ते च मध्ये च हरि: सर्वत्र गीयते।।

महाभारत में रामोपाख्यान सबसे विशिष्ट, विस्तृत और महत्वपूर्ण है। आरण्यकपर्व में यह प्रसंग इस प्रकार है-जयद्रथ द्वारा द्रौपदी के हरण और उनको पुन: प्राप्त करने के बाद युधिष्ठिर अपने दुर्भाग्य पर शोक प्रकट कर कहते हैं-अस्ति नूनं मया कश्चिदल्पभाग्यतरो नर:। क्या कोई मुझसे भी अधिक अभागा है? इस पर मार्कण्डेय ऋषि राम का उदाहरण देकर युधिष्ठिर को धैर्य बंधाने का प्रयास करते हैं। युधिष्ठिर के रामचरित सुनने की इच्छा प्रकट करने पर मार्कण्डेय रामोपाख्यान सुनाते हैं।इस रामचरित का विस्तार ७०४ श्लोकों का है। यद्यपि वाल्मीकि रामायण ही रामोपाख्यान का प्रमुख आधार है, फिर भी इनके बीच कुछ अंतर भी है। वाल्मीकि रामायण के कांड के अनुसार जो खास-खास अंतर है,वे इस प्रकार है:

बालकांड–रामोपाख्यान में केवल इन प्रसंगों का उल्लेख हुआ है। राम और उनके भाईयों का जन्म,लेकिन पुत्रेष्टि यज्ञ तथा पायस का उल्लेख नहीं है। सीता, जनक की पुत्री हैं, अयोनिजा नहीं। ब्रह्मर्षि,देवता आदि रावण से संत्रस्त होकर ब्रह्मा की शरण लेते हैं। ब्रह्मा रामावतार का रहस्य प्रकट करते हैं। चारों भाइयों की शिक्षा और विवाह, सीता के अलावा अन्य भाईयों की पत्नियों के नाम नहीं मिलते। 

अयोध्याकांड–गुह और अत्रि का उल्लेख नहीं मिलता। कैकेयी को केवल एक ही वर मिला था। मन्थरा के विषय में कहा गया है कि वह गंधर्वी का अवतार है, जो राम को वनवास भिजवाने के लिए ही आई थी।

अरण्यकांड–इसमें विराध,सुतीक्ष्ण, अगस्त्य,अयोमुखी और शबरी,इनसे संंबंध रखने वाली सामग्री का अभाव है।

किष्किंधाकांड–इसमें राम-सुग्रीव की मैत्री,वालिवध, वानरों को चारों दिशाओं में भेजने और दक्षिण को छोड़कर तीनों दिशाओं से वापस लौटने की सामग्री है। किन्तु,इसमे सुग्रीव के साथ मित्रता करने के लिए राम के बल की परीक्षा नहीं होती। सुग्रीव और वालि के बीच भी केवल एक ही द्वंद्वयुद्ध होता है।

सुंदरकांड— हनुमान् और उनके साथियों के लौटने का समस्त वृतान्त इसमें रामोपाख्यान का रचयिता स्वयं नहीं करता। अपितु, हनुमान् राम के पास लौटकर उन्हें सुनाते हैं। रामोपाख्यान में अविंध्य को अधिक महत्व दिया गया है।

रामायण में सीता हनुमान् से अविंध्य का उल्लेख करती है और इसके बाद अविंध्य के विषय में कुछ नहीं कहा जाता। सीता बतलाती हैं कि अविंध्य नाम के वृद्ध विद्वान और  विवेकशील राक्षस हैं, जो रावण को सही सलाह देते हैं। किन्तु,वह दुष्ट अविंध्य की बात मानता ही नहीं: अविंध्यो नाम मेधावी विद्वान् राक्षस पुंगव: धृतिमांछीलवान्ववृद्धो रावणस्य सुसंमत:।। रामोपाख्यान में त्रिजटा सीता को सांत्वना देकर अविंध्य का संदेश सुनाती है जो राम का हितान्वेषी है-राम,सुग्रीव के साथ मैत्री करके शीघ्र आने वाले हैं। रावण नलकूबर के शाप के कारण सीता का सतीत्व भंग करने में असमर्थ है। इन्द्रजित के वध के बाद अविंध्य रावण को सीता की हत्या करने से रोकता है, जबकि रामायण में यह कार्य सुपार्श्व द्वारा किया जाता है।

युद्धकांड–रावण की सभा,राम का मायामय सिर,रावण-सुग्रीव युद्ध, इन सबका रामोपाख्यान में अभाव है। सेतुबंध के वृतान्त में समुद्र राम को स्वप्न में दर्शन देता है और सहायता की प्रतिज्ञा करता है। राम का समुद्र में बाण मारने का उल्लेख रामोपाख्यान में नहीं हुआ है।

रामायण में इन्द्रजित् एक मायासीता की हत्या करता है। रामोपाख्यान में इसका उल्लेख नहीं है। नागपाश का वृतान्त रामायण में दो बार मिलता है। रामोपाख्यान में कुंभकर्ण का वध लक्ष्मण द्वारा किया जाता है। रामायण में इन्द्रजित् एक मायासीता की हत्या करता है। रामोपाख्यान में इसका उल्लेख नहीं है। नागपाश का वृतान्त रामायण में दो बार मिलता है। रामोपाख्यान में केवल एक बार और इसमें विभीषण राम  तथा लक्ष्मण को प्रज्ञास्त्र से स्वस्थ कर देते हैं और राम को कुबेर का भेजा हुआ जल देते हैं। इस जल से आँखें धोकर राम अदृश्य प्राणी देख सकते हैं।(अंतर्हितानां भूतानां दर्शनार्थम्)। हनुमान् के औषधि पर्वत लाने का उल्लेख रामोपाख्यान में नहीं है।

रामोपाख्यान में लक्ष्मण के शक्ति लगने का वृतान्त नहीं मिलता। इसमें रावण माया द्वारा राम और लक्ष्मण का रूप धारण  किए हुए मायामय राक्षसों को उत्पन्न करता है। राम रावण की इस माया को नष्ट करते हैं और इसके बाद रावण को ब्रह्मास्त्र से इस तरह जलाते हैं कि राख भी शेष नहीं बचती।(न च भस्माप्यदृश्यत)।रामोपाख्यान में सीता की अग्निपरीक्षा नहीं होती।

उत्तरकांड–रामोपाख्यान राम के अयोध्या लौटने और उनके अभिषेक पर समाप्त होता है,पर उत्तरकांड की कुछ सामग्री रामोपाख्यान के प्रारंभ में दी गई है। रावणवंश,रावण और उनके भाईयों की तपस्या तथा वर प्राप्ति, वैश्रावण की हार, रावण का पुष्पक पर अधिकार प्राप्त करने का संक्षेप में वर्णन है। रामायण में जहाँ सुमाली की पुत्री कैकसी को रावण, कुम्भकर्ण, शूर्पनखा तथा विभीषण की माता माना जाता है, वहीं रामोपाख्यान में विश्रवा की तीन पत्नियों का उल्लेख है। जिनमें से पुष्पोतकटा कुम्भकर्ण और रावण की माता, मालिनी विभीषण की माता और राका शूर्पनखा की मानी जाती है। (इंडिया डेटलाइन)

( बुधोलिया भोपाल स्थित रामकथा के अध्येता हैं।) 

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