राष्ट्रीय हितों, गौरव और परंपराओं को नुकसान पहुँचाए बिना असहमति व्यक्त की जा सकती है। क्या आंदोलनकारियों के पास अन्य कोई तरीक़ा नहीं जो वे राष्ट्रीय परंपरा को क्षति पहुँचाकर अपने आंदोलन की तरफ देश का ध्यान खींचना चाहते हैं? 

शिवकुमार विवेक

किसानों के इस ऐलान को क्या कहिए। दिल्ली में आंदोलन कर रहे किसानों ने छब्बीस जनवरी को देश की राजधानी में ट्रैक्टर लेकर घुसने की चेतावनी दी है। आंदोलन के एक अगुवा टीवी पर बहुत ढिलाई से कह रहे थे कि देश को उनकी ‘ट्रैक्टर परेड’ देखनी चाहिए। यदि हमें हमारी राष्ट्रीय परंपरा की बजाय इस बार छब्बीस जनवरी को ट्रैक्टर परेड देखनी पड़ी तो यह इतिहास का खराब दिन होगा। 

हम पिछले सात दशक से दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस की परेड को राष्ट्रीय स्वाभिमान उत्सव के रूप में मनाते-देखते आ रहे हैं। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के गौरव की अभिव्यक्ति का परिचायक हो गया है। इसमें सेना, सरकारें, संगठन, सेनाएँ व केन्द्र सरकार अपनी व नागरिकों की गौरवगाथाओं को प्रदर्शित करती हैं। इसलिए इसके विकल्प में जाने की जरूरत नहीं है। और क्या वह विकल्प किसी आंदोलनात्मक समूह का शक्ति प्रदर्शन होगा? 

इस तरह की घोषणा के लिए उक्त किसान नेता को लज्जा आनी चाहिए थी। लेकिन उनकी बात छोड़िए। मैं आज पूरे दिन इंतज़ार करता रहा कि कोई बौद्धिक झंडाबरदार इसकी आलोचना करने के लिए आगे आएँगे, लेकिन आश्चर्यजनक चुप्पी है। जो लोग रोज किसानों के पक्ष में लेख लिखकर सरकार को शर्मिंदा करने की कोशिश कर रहे थे, उन्होंने कोई लेख लिखा हो, मेरे संज्ञान में तो नहीं। 

किसानों के आंदोलन करने से गुरेज़ नहीं। मैं पहले से ही यह राय रखता रहा हूँ कि केन्द्र सरकार द्वारा पारित तीन क़ानूनों में यदि कोई ऐतराज़ लायक बात है तो उस पर आपत्ति दर्ज करानी चाहिए। सरकार नहीं मानती तो आपके पास आंदोलन का लोकतांत्रिक शस्त्र है। किसान इस शस्त्र का प्रयोग कर रहे हैं तो बेजा नहीं। और सरकार यदि छह बार उन्हें बातचीत की मेज़ पर बुला चुकी है तो यह आंदोलन की ताकत का ही प्रभाव है। लेकिन जब सरकार सातवें दौर की बातचीत के लिए सोमवार को फिर आंदोलनकारी किसान नेताओं के साथ बैठने जा रही है तब इस तरह का ऐलान करना वाजिब नहीं। सरकार पर दवाब बनाने के लिए आंदोलन को तेज करने की घोषणा की जा सकती है। लेकिन आंदोलन को इस मोड़ पर पहुँचाना जरूरी नहीं है। यह तरीक़ा लोकतांत्रिक अधिकारो का बेजा इस्तेमाल होगा। 

क्या आंदोलनकारी केन्द्र की सरकार को नीचा दिखाना चाहते हैं? यह ठीक है कि उनकी सरकार से लड़ाई है लेकिन यह लड़ाई दो दुश्मनों वाली नहीं है। लोकतंत्र में असहमतियों का संघर्ष होता है। किन्तु राष्ट्रीय हितों, गौरव और परंपराओं को नुकसान पहुँचाए बिना असहमति व्यक्त की जा सकती है। क्या आंदोलनकारियों के पास अन्य कोई तरीक़ा नहीं जो वे राष्ट्रीय परंपरा को क्षति पहुँचाकर अपने आंदोलन की तरफ देश का ध्यान खींचना चाहते हैं? 

असल में किसान आंदोलन में एक ज़िद काम कर रही है। सरकार में भी ज़िद थी जिसे उसने कुछ हद तक छोड़ा है। लेकिन क़ानूनों को रद्द न करने की जिद अब भी है। संशोधन चाहे आप करा लीजिए। किसान आंदोलन क़ानूनों को निरस्त करने की जिद पर अड़ा है। चालीस दिन हो चुके हैं और ठंड में खुले में बैठने से कई किसान मौत के मुँह में समा चुके हैं। ऐसे में किसान नेतृत्व को परिपक्वता दिखाते हुए दो क़दम आगे जाने और दो क़दम सरकार को पीछे ले जाने की परिणति को जीत में तब्दील करना चाहिए था। लेकिन उलटे वह इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना रहा है। 

यह पहले ही स्पष्ट हो चुका है कि आंदोलन में कई ऐसे तत्व शामिल हैं जो मुद्दों की लड़ाई को सरकार से अपनी खुन्नस की लड़ाई में तब्दील करना चाहते हैं। भाजपा की विरोधी राजनीतिक विचारधाराएँ खुले तौर पर अपने झंडे लहराकर आंदोलन में शामिल हैं। अडानी-अंबानी का नाम लेने और रिलायंस के टॉवर जलाने से उनका एजेंडा साफ़ है। विदेशों से पैसा भी पंजाबी आंदोलनकारियों को मिल रहा है, यह प्रमाणित हो चुका है। किसान यूनियन उग्राहां से ही चौदह लाख रुपए विदेश से आने का विवरण माँगा गया तो उन्होंने उत्पीड़न का आरोप लगाया। 

ऐसे लोग समझौते को कठिन बना रहे हैं और सरकार की नाक को पूरा तरह काटने पर उतारू हैं जो संभव नहीं है। यदि ये तत्व आंदोलन को सीधी मुठभेड़ न बनाते तो शायद अब तक बात बन जाती। गणतंत्र दिवस परेड की शान को खराब करने को देशवासी स्वीकार नहीं करेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की भारत यात्रा के ऐन समय दंगों व विस्फोटों से जिस तरह देश की नाक नीची हुई और अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बना। क्या आंदोलनकारी भी ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन की मौजूदगी में अंतरराष्ट्रीय प्रोपेगेंडा की चाहत में ऐसा करना चाहते हैं? उचित होगा कि सरकार विरोध को राष्ट्रीय हितों को क्षति पहुँचाने वाली कारर्वाई न बनने दें। किसान नेताओं की शान इसमें रहेगी कि वे किसी राजनीतिक एजेंडे से प्रभावित हुए बग़ैर सरकार से, वह मोदी की है या अन्य की- इसे केन्द्र में न रखते हुए लड़ाई लड़ें। आंदोलन के हजार तरीके हैं। अंगरेजों के खिलाफ इसी देश में गांधी ने आंदोलन के नए नए तरीके ईजाद किए थे। (इंडिया डेटलाइन)

Spread the love

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here