विजय मनोहर तिवारी

इंदौर लिट्रेचर फेस्टिवल (ILF) का छठवां सीजन जबर्दस्त रहा। जबकि इस बार न तारेक फतह थे, न तस्लीमा नसरीन और न ही कुमार विश्वास। लेकिन पीयूष मिश्रा थे, जिन्हें हर उम्र के लोग सांस रोककर सुनते हैं। निलेश मिसरा थे, जिनकी कहानियां रेडियो पर चाव से सुनी जाती हैं और एक नया परिचय नीलोत्पल मृणाल, जिन्होंने हिंदी की लेखनी को एक नई पहचान दी है। ये सब सितारा हैसियत की शख्सियतें हैं, जिन्हें इंदौर के लोगाें ने पूरे दो दिन तक सुना।

उदय माहूरकर ने छत्रपति शिवाजी और हिंडोल सेनगुप्ता ने सरदार वल्लभ भाई पटेल के विराट व्यक्तित्व को अब तक अनजाने तथ्यों के साथ सामने रखा तो लगा कि उन्हें और समय दिया जाना था। अनुपम खेर और अमीष इस बार वर्चुअल जुड़े। ‘भास्कर के भगीरथ’ रमेशचंद्र अग्रवाल पर केंद्रित सत्र में भास्कर समूह के नेशनल एडिटर नवनीत गुर्जर और डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल के साथ आईएलएफ के सूत्रधार प्रवीण शर्मा ने मुझे भी रखा और हमने जमीन से जुड़े रमेशजी के कई किस्से साझा किए, जिनसे दैनिक भास्कर की आसमानी ऊंचाई का कुछ अंदाजा लगता है। सच्चे अर्थों में शून्य से शिखर का एक महायात्री।

मेरी ताजा ‘किताब उफ ये मौलाना India fights corona’ पर हुए सत्र में जयश्री पिंगले के सवाल कोरोना काल की कड़वी यादों में घसीट ले गए। पंकज मुकाती ने एक समीक्षा लिखी, जिसे उन्होंने फेसबुक पर भी साझा किया। किताब उन्होंने पढ़ी है और पूरे समय सत्र में मौजूद थे इसलिए अधिकारपूर्वक लिखा। उनके लिखे पर उनके कई प्रबुद्ध पाठकों ने अपनी राय दी है। मैं बुक या फेसबुक में सिर्फ अपनी बात करता हूं। कभी बहस में नहीं पड़ता, क्योंकि वह अंतहीन है। बाकी अपने पाठकों पर छोड़ता हूं, जो मुझसे सीधे संपर्क में रहते हैं। मेल करते हैं। मैं जवाब देता हूं। लेकिन फेसबुक वह जगह नहीं है, जहां वाद-विवाद में उलझा जाए। समय और ऊर्जा सही जगह पर इस्तेमाल होनी चाहिए।

‘उफ ये मौलाना’ को लेकर लगा कि ज्यादातर लोग बिना देखे, पढ़े और समझे सिर्फ सतही तौर पर धारणा बनाने में माहिर हैं और टीका-टिप्पणी करने में सब काम छोड़कर तैयार और तत्पर भी। अल्लाह उन्हें ताकयामत सलामत रखे। लेकिन मैं अपनी लेखनी में तथ्यों के साथ बात करता हूं। इस किताब की भूमिका में ही कहा है कि विचारों से सहमति आवश्यक नहीं है। कोई बात मनवाने का भी आग्रह नहीं है। आपकी राय भिन्न हो सकती है। मैंने दिन के उजाले में कुछ देखा है तो जैसा देखा है वैसा बता दिया है। आप आंखें बंद करके इंकार कर सकते हैं। वह आपका अधिकार है। मुझे उसका आदर करना चाहिए।

खैर, आधुनिक इंदौर की पहचान बन चुके लिट्रेचर फेस्टिवल को लेकर इस बार सबके मन में आशंका थी कि कम्बख्त कोरोना के कारण पता नहीं कैसी रौनक हो, लेकिन दोनों दिन सुबह से शाम तक सयाजी के प्रांगण में चहलपहल ने बता दिया कि कोरोना वोरोना भाड़ में जा चुका है। प्रवीण शर्मा की टीम ने वाकई हमेशा की तरह शानदार काम किया।

पत्रकारिता एक ऐसी बहती हुई धारा है, जो कई तरह के किनारों से टकराती है। निलेश मिसरा को वह अखबार से रेडियो तक ले आती है और उनकी आवाज दूर तक सुनाई देने लगती है। कोई टीवी में चमकने लगता है। प्रवीण शर्मा ने इस धारा में बहते हुए सिटी की रिपोर्टिंग से लेकर ब्यूरो और एडिशन की कमान तक तो कमाल किया ही है। वे एक दिन अखबार की नौकरी के दायरे से बाहर आकर एक कातिलाना अंगड़ाई लेते हुए अपनी बनाई हैलो हिंदुस्तान की नाव पर सवार हो गए। इंदौर से हिले नहीं। उनके भीतर जरूर कुछ हिलोरें ले रहा था। लिखने के मामले में कंजूस प्रवीण अगर अकेली कलम संभाले रहते तो ज्यादा से ज्यादा ऐसे ही किसी लिट्रेचर फेस्टिवल में एक सत्र ही उन पर होता। अच्छा ही किया जो वे लिखने नहीं बैठे। कुछ करने बैठे और करके दिखा दिया। लिखने के लिए हम जो हैं! मामूली काम तो कोई भी कर सकता है। जो प्रवीण ने किया, वह वे ही कर सकते थे।

अखबार या मैगजीन के नए प्रकाशनों के प्रयोग उन लोगों के लिए जानलेवा जद्दोजहद के हाेते हैं, जिनके पास कोई बड़ी पूंजी नहीं होती। प्रवीण ऐसे ही हैं। लेकिन पूंजी की कोई बहुत औकात होती नहीं है। वह कुछ और ही होता है, जो पंखों को उड़ान देता है। शायद वह गहरा आत्मविश्वास है या शायद जोखिम लेने की क्षमता। गहरे सब्र के साथ देखे गए ऊंचे सपनों का योगदान भी हो सकता है। साख को संभाले रखकर कुछ कर दिखाना दम-गुरदे का काम है। हर किसी के बूते की बात नहीं!

प्रवीण की कहानी पलक झपकते लगी किसी ऊंची छलांग का धूमकेतु पैराग्राफ नहीं है। वह एक-एक सीढ़ी चढ़ने और चढ़ते-चढ़ते सुस्ताकर बार-बार नीचे देखने, फिर अपने कदमों की ताकत टटोलकर अगली सीढ़ी चढ़ने के पसीने से नहाए हुए वाक्यांश हैं। कितने बरस गुजर गए। हमने इंदौर की सर्द रातों में सुलगती हुई सांझों के साए में वसीम बरेलवी और नीरज से लेकर नई पीढ़ी के कितने सुरीले शायरों को सुना है। और छह साल से ये लिट्रेचर फेस्टिवल। और ये कोई बड़े मीडिया या मैनेजमेंट समूह नहीं कर रहे।

बहुत कम लोग जानते होंगे कि प्रवीण अमझेरा के हैं। मध्यप्रदेश के धार जिले का एक बहुत पुराना कस्बा, जहां की शानदार यादों में राणा बख्तावर का नाम है। एक ऐसा राजा जो दमदार लड़ाका भी था और जिसने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिए थे। कहते हैं कि फांसी का फंदा भी उन्हें आसानी से नहीं लटका पाया था। वह अमझेरा जहां आठ सौ साल पहले मोरक्को का एक मनमौजी मुसाफिर आया था, जिसे दुनिया इब्नबतूता के नाम से जानती है।

अमझेरा के लाेग गर्व कर सकते हैं कि प्रवीण शर्मा वहीं की धूल में खेले हैं और अमझेरा के बाहर अपनी शर्तों पर खेलते हैं। जब वे दिन भर के थका देने वाले कट टू कट सेशंस के बाद सयाजी होटल के टेरेस पर लेखन और अभिनय की देश की जानी-मानी मेहमान हस्तियों के साथ खास डिनर पर रूबरू होते हैं तो सुदामानगर का वह तंग कमरा उनकी यादों में बराबर बना रहता है, जहां जमापूंजी के नाम पर सिर्फ हर दिन के अखबार होते थे। यह जमापूंजी अगले ही दिन रद्दी थी!

और यह कहानी अकेले प्रवीण शर्मा की नहीं है। उदय माहूरकर, पीयूष मिश्रा, निलेश मिसरा और नीलोत्पल मृणाल, ये सब वो नाम हैं जिन्होंने अपनी इबारत खुद लिखी है। कठोर परिश्रम, पुरुषार्थ और लंबी प्रतीक्षा से। आप चाहें तो सबसे बाद में भाग्य को भी जोड़ सकते हैं!

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