विजय मनोहर तिवारी

नेताजी सुभाषचंद्र बोस भारत के ऐसे सपूत हैं, जिनके व्यक्तित्व का गहरा असर आजादी की लड़ाई में भी दर्ज है और आजाद भारत में अदृश्य होने के बाद भी वे दशकों से आम भारतीयों की जिज्ञासा के केंद्र बने रहे हैं। रहस्मय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु को लेकर एक धुंध रही। किसी ने यह नहीं माना कि विमान हादसे में उनका वजूद खत्म हो गया था।

बोस को लेकर कांग्रेस सरकार की नीतियाें ने भी संदेह ही पैदा किया। हालांकि इससे बोस की मूर्ति न खंडित हुई, न खत्म। करोड़ों आम भारतीय आज भी स्वाधीनता की लड़ाई में उनके योगदान को कांग्रेस के कुल जमा जोड़ से कम नहीं मानते। महात्मा गांधी की पसंद और नापसंद भी सर्वज्ञात है। बापू ने ‘नेताजी’ सुभाषचंद्र बोस को कहा, ‘नेता’ बनाया जवाहरलाल नेहरू को। तीर कहीं चलाना, निशाना कहीं लगाना। ‘नेता’ ने बटवारे के खून-खच्चर, मारकाट और चीख-पुकार के बीच जब दिल्ली में शपथ ली तो बापू कलकत्ता जा पहुंचे। भ्रमित दिशाओं से होकर भारत स्वतंत्रता के लक्ष्य तक पहुंच गया!

यह पोस्ट महान् बापू के बारे में नहीं हैं और न ही सार्वकालिक महान् नेहरू पर है। उन्हें पूरी श्रद्धा से नमन के साथ यह पोस्ट सिर्फ भारत माता के एक महान सपूत सुभाषचंद्र बोस पर है। बोस पर भी नहीं है, उन पर आई एक ताजा किताब पर है, जिसका शीर्षक है-‘नेताजी।’ गरुड़ प्रकाशन से छपकर आई इस किताब का लोकार्पण दिल्ली में पिछले दिनों राज्यसभा के उप सभापति वेंकैया नायडू और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने किया। इसके लेखक कल्याण कुमार डे हैं, जो मूलत: कार्बनिक रसानज्ञ हैं। वे अमेरिका में रहते हैं। डे ने अपने जीवन के कई साल बोस के व्यक्तित्व, उनकी कामयाबियों और उपलब्धियों पर छाई रही धुंध के पार एक खोज में लगाए। इनमें इतिहास के प्रोफेसर डॉ. पीटर वॉर्ड फे की किताब ‘द फॉरगॉटन आर्मी’ में भी वे गए, जिसे लिखने में फे ने 20 साल लगाने के बाद निर्णायक रूप से यह पाया कि अंग्रेज भारत छोड़ने पर मजबूर क्यों हुए थे? गुलामी से छुटकारे की भारत की सच्चाई की खोज उन्हें ब्रिटिश राज के मौलिक दस्तावेजों की तरफ खींच ले गई और तब वे ट्रांसफर ऑफ पावर के छठवें खंड में पहुंचे। 155 पेज की यह किताब उसी का निचोड़ है, जो आजाद हिंद फौज (आईएनए) की हैसियत पर रोशनी डालती है। मूलत: यह काम आजादी के तत्काल बाद भारत की सरकारों को करना था। करना तो बहुत कुछ था, किया भी, लेकिन इस किए धरे में बहुत कुछ छूट गया। बोस और उनकी सेना के महान योगदान को हाशिए पर डाले रखने का औचित्य किसी से छिपा नहीं रहा है।

दरअसल यह किताब भी नहीं है। यह एक किस्म की एक्सक्लुसिव स्टोरी है, जिसमें सिर्फ तथ्य हैं। उपन्यास जैसा भाषा या शब्दों के मायाजाल में उलझाने वाला कोई लेखकीय कमाल नहीं है। इसमें सच की कड़वी गोलियां हैं। अंग्रेजों के हाथों से कांग्रेस के हाथों में सत्ता की अदला-बदली के गोपनीय और अति गोपनीय श्रेणी के दस्तावेजों में दर्ज ब्यौरे उस धुंध को छांटने में हमारी मदद करते हैं, जो बोस के योगदान पर हमेशा ही डालकर रखी गई थी। किसी भी मूवी या किताब को जब आप दूसरी बार देखते-पढ़ते हैं तो कुछ नई चीजें ही निकलती हैं। हमें खिलाफत आंदोलन से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन के आगाज, अंजाम और नीयत के साथ कांग्रेस की निर्णय क्षमता पर एक बार गौर करना चाहिए। भारत छोड़ो आंदोलन के बारे में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लीमंेट एटली ने 1960 में कहा था कि अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर करने में सुभाषचंद्र बोस और आजाद हिंद फौज की तुलना में गांधीजी की भूमिका बहुत ही कम थी।

डॉ. पीटर फे ने भी पाया कि भले ही बोस और उनकी फौज एक विजेता के रूप में भारत में खुद को स्थापित नहीं कर सकी थी और उन्हें हटना पड़ा था लेकिन इसके बाद के घटनाक्रम में संपूर्ण भारत में एक न रुकने वाला राजनीतिक भूचाल ला दिया था, जिसने ब्रिटिश भारतीय सेना को महत्वपूर्ण ढंग से प्रभावित किया। इसके बाद ब्रिटिश हुक्मरानोें का अपनी ही फौज पर से भरोसा खत्म हो गया। भारत पर और ज्यादा हुकूमत के लिए वे अपनी ही फौज पर निर्भर नहीं रह सके। आजाद हिंद फौजे के अफसरों पर दिल्ली के लाल किले पर होने वाले मुकदमों ने ब्रिटिश भारतीय सेना के मनोबल को पूरी तरह क्षीण कर दिया। ब्रिटेन को भारत से अपना राजपाट समेटने के सिवा कोई चारा बचा नहीं था।

हम जानते हैं कि 1944 में बापू ने भारत छोड़ो आंदोलन समेट लिया था। अगस्त 1945 में ताइवान की कथित विमान दुर्घटना में नेताजी के मारे जाने की खबर फैली। इसके बाद 1947 के अगस्त में भारत की आजादी तक अंग्रेज अफसरों, गवर्नर और वायसराय से लेकर प्रधानमंत्री के बीच कलकत्ता, नईदिल्ली और लंदन के बीच जो पत्र-व्यवहार और आईएनए पर अभियोग की रिपोर्ट के बारे में खुफिया विभाग के गोपनीय ब्यौरे दिए गए हैं, वे आँखें खोलने वाले हैं। इन दो सालों में अंग्रेजों में सर्वोच्च स्तर पर जो लिखा-पढ़ी हुई है, यह किताब उन्हीं दस्तावेजों को जस का तस सामने रखती है।

नेताजी के जीवन के बारे में बहुत कुछ छपा है। गूगल पर कई कहानियां और लेख फैले हुए हैं। अनगिनत किताबें कई भाषाओं में हैं। लेकिन सत्य के अन्वेषकों को यह किताब एक नई दृष्टि अवश्य देती है। किसी भी प्रकार की लेखकीय टिप्पणियों और भावुकता भरे झुकावों के बगैर कल्याण कुमार डे ने असल दस्तावेजों को ही सामने रखा है। आखिर में यह प्रश्न पाठकों पर है कि क्या देश के बटवारे के ब्रिटिश डिजाइन के साथ जल्दबाजी में सत्ता हासिल करने और सुभाषचंद्र बोस की सच्चाई पर परदा डालने के पीछे कुछ था या वह एक फैलाया हुआ वहम है और बिना खड्ग-बिना ढाल के आजादी की एक्सप्रेस एक दिन दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुंच गई थी, जिससे एक सजा-धजा शख्स शीघ्रता में उतरा था और तेज कदमों से लालकिले की तरफ बढ़ गया था, जहां उसे एक शपथ लेनी थी!

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