श्राद्ध पक्ष पर विशेष

पितृ-पक्ष में पितरों को पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से बुलाएं,फल,फूल,नैवेद्य चढ़ाएं,प्रार्थना करें कि उनका आशीर्वाद हम पर सदा बना रहे,जीवन में मांगल्य रहे पर साथ ही साथ हमारे जीवन में सदेह मौजूद बुजुर्गों को भी उसी प्रकार मान-सम्मान दें, सिर्फ पंद्रह दिन नहीं बल्कि हर दिन|

महिमा वर्मा  

श्राद्ध की आवश्यकता और लाभ पर अनेक ऋषि-महर्षियों के वचन ग्रंथों में मिलते हैं|’गरुड़-पुराण’ के अनुसार ‘पितृ-पूजन’से संतुष्ट होकर पितर मनुष्यों के लिए आयु,पुत्र,यश,स्वर्ग,कीर्ति,पुष्टि,बल,वैभव,पशु,सुख,धन और धान्य देते हैं|हिन्दू धर्म में पितरों का स्थान एवं महत्व देवी-देवताओं के समकक्ष है|श्राद्ध के पंद्रह दिन पूर्णिमा से लेकर अमावस्या तक यह पूरा पक्ष पितरों को समर्पित है|’पितृ-पक्ष’ में अपने पूर्वजों का ध्यान एवं पूजन किया जाता है जिनकी वज़ह से हम इस दुनिया में हैं|

पूर्वजों को यह भावांजलि अनेकों प्रकार से दी जाती है शास्त्रसम्मत पूजन विधि के अतिरिक्त भी|कई लोग पितरों की याद में इस समय आम,जामुन इत्यादि कई वृक्ष लगाते हैं तो कई अन्य अस्पताल या विद्यालय की नींव रखते हैं|अनेकों प्रकार के सत्कार्यों द्वारा पितरों को प्रसन्न करने की कोशिश की जाती है ताकि उनका आशीर्वाद हम पर बना रहे|किन्तु बहुत बड़ी विडम्बना है कि नश्वर देह छोड़ चुके पितरों को हम उनके संसार से दूर हो जाने के बाद भी आदरांजलि दे रहे हैं और हमारे साथ सशरीर उपस्थित बुजुर्गों का आस्तित्व परिवार के केंद्र से हटाकर हाशिये पर डाल रहे हैं| हम हमारे दिवंगत पितरों को अवश्य ही सम्मान दें  पर साथ ही जीवित पितरों(हमारे बुजुर्ग)को मान देना न भूलें|अरे ये बुजुर्ग तो जीती-जागती पाठशालाएं हैं,ज्ञान का भन्डार हैं,संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने वाले माध्यम हैं,नाती-नातिनों,पोता-पोतियों के लिए कहानियों के खजाने हैं,दादी-नानी के नुस्खे हैं,हमारे सिर की छांव हैं|बदलते आर्थिक ढाँचे ने सामजिक ढाँचा भी बदला|संयुक्त परिवार धीरे-धीरे एकल परिवारों में बदले| ऐसे परिदृश्य में घर के बड़ों का सम्मानपूर्ण स्थान कायम रहे इसके लिए प्रयत्न करने होंगे|वरिष्ठ जनों   ने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी है उन्होंने आपको प्रेम,स्नेह और कभी अनुशासन  के धागे से बाँध कर रखा,ममता उड़ेल कर एक-एक निवाला खिलाया,उंगली पकड़ कर चलना सिखाया अब आपकी बारी है|यदि आप उनकी खुशियों से निस्पृह हुए वे जीवन से तटस्थ हो जाएंगे|कहीं ऐसा न हो इन्टरनेट की आभासी दुनिया में तो हम नित नए वर्चुअल रिश्ते बनाते जाएँ और घर की छत के नीचे के सम्बन्ध भावनाविहीन होते चले जाएँ|याद रखिये हम सब एक ही माला के मोती हैं,कल हमारे बड़ों का था,आज हमारा है,कल हमारे नौनिहालों का होगा|जो हम बोयेंगे वो हम काटेंगे|हमारे बड़े हमारा सरमाया हैं उनके प्रति स्नेह-धारा को कभी सूखने न दीजिये|संवाद का पुल कभी टूटने न दीजिये|दोस्ती का रिश्ता मुरझाने न दीजिये|जादू की झप्पी की गर्माहट कम न होने दीजिये|कहते हैं न कि एक स्पर्श सैंकड़ों शब्दों से बढ़कर है|हाँ यह भी अनेकों बार सत्य सिद्ध हो जाता है कि बच्चे,बूढ़े एक समान!कभी घर के बड़े लोग बच्चों जैसे मचल जाएँ या जिद पर अड़ जाएँ तो उन्हें भी प्यार से,दुलार से, अनुशासन से मना लें|

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 104 मिलियन बुजुर्ग हैं|हमारी भारतीय संस्कृति के अलिखित सामृद्ध्य के इन परिचायकों को मान-सम्मान,स्नेह-प्रेम देना हमारा बहुत बड़ा कर्तव्य है|अन्यथा हमारी गौरवशाली संस्कृति एवं परंपरा की कड़ियाँ बिखर सकती हैं|आने वाली पीढ़ी हमारे अनूठे सांस्कृतिक,सामाजिक ताने-बाने से अपिरिचित ही रह जायेगी|रात को दादी-नानी से कहानी सुन कर सोने का युग तो हमेशा के लिए समाप्त ही हो जाएगा|यह हमारी जिम्मेदारी है कि प्रेमचंद की “बूढ़ी काकी” हममें से किसी को अपने आस-पास नज़र भी न आए|अगर ये बुजुर्ग हमारी अवहेलना से चुप हो गए या हमारे घर की बजाय वृद्धाश्रम के वासी हो गए तो क्या हमारे पितर हमारी झोली आशीर्वादों से भर पायेंगे?एक चीनी कहावत है “एक बुज़ुर्ग की मृत्यु से एक जीवित ग्रंथालय नष्ट हो जाता है|”

पितृ-पक्ष में पितरों को पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से बुलाएं,फल,फूल,नैवेद्य चढ़ाएं,प्रार्थना करें कि उनका आशीर्वाद हम पर सदा बना रहे,जीवन में मांगल्य रहे पर साथ ही साथ हमारे जीवन में सदेह मौजूद बुजुर्गों को भी उसी प्रकार मान-सम्मान दें, सिर्फ पंद्रह दिन नहीं बल्कि हर दिन|

माँ कहती है जब हम

रात के विचित्र पशुओं से घिरे सो रहे होते हैं

दादा इस तस्वीर में जागते रहते हैं!!!

(मंगलेश डबराल)

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