🔹पचमेल/ कीर्ति राणा
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पूरे फिश पॉट में अब वह अकेली घूमती रहती है। पता नहीं कैसा लगता होगा उसे। उस छोटे से आधुनिक तालाब (फिश पॉट) में अकेले ही यहां से वहां घूमते हुए।वही पानी, चारों तरफ कांच की वही दीवारें और दीवारों से यहां वहां टकराते चौबीस घंटे अनवरत चलता उसका सफर।ये अकेली मछली सिखा भी तो रही है अपने जब छोड़ जाएं या अपनों से नाता टूट जाए तब भी अकेले सफर तय किया जा सकता है।बचपन में मां जब कहती थी अकेला रह लेगा तब आत्म विश्वास से कहता था हां रह सकता हूं, बस साथ में रेडियो रहना चाहिए।
यहां वहां होते रहे तबादलों, अकेले रहने के दौरान ट्रांजिस्टर साथ रहता था।चुभती हवाओं, बर्फीले मौसम में सांय सांय करती रातों में वही ट्रांजिस्टर पर बचते कभी खुशी तो कभी गम वाले नगमे सुनते-सुनते कब नींद आ जाती, यह भी पता तब चलता था जब गाने की बजाय ट्रांजिस्टर से आने वाली खड़ खड़ की आवाज से नींद टूट जाती थी। ट्रांजिस्टर बंद करने के बाद देर तक नींद की बजाय कई तरह के खयाल आते तो यह भी लगता कि अकेले रहना भी संभव नहीं। और अब जब उस काली मछली को तीन चार दिनों से फिश पॉट में अकेले ही यहां वहां चक्कर लगाते देख कर खुद से ही सवाल करता हूं कि ये अकेले रहते हुए क्या सोचती होगी।
पहले वो तीन सहेलियां थीं, एक सेफ्रोन (केशरिया) कलर की दूसरी काली और तीसरी एश कलर की।पता नहीं वो सखी सहेली थीं या उनमें कौन नर कौन मादा था, अपन जीव विज्ञानी तो हैं नहीं जो दावे से कह सकें।अपने को तो उनकी प्रजाति और खासियत तक पता नहीं लेकिन बड़े से फिश पॉट में वो तीनों जिस तरह इधर से उधर घूमती रहतीं, बरबस मेरा ध्यान उन पर चले जाता था। कुछ पल ठिठक कर जब फिश पॉट पर अंगुली से ठक ठक करता तो इस आवाज से वो चौंकती और उनकी भागने-दौड़ने, खुद को सुरक्षित रखने वाले प्रयासों की गति तेज हो जाती थी।
ऑफिस पांचवीं मंजिल पर होने से जाते वक्त तो लिफ्ट का इस्तेमाल करता लेकिन आते वक्त सीढ़ियों से ही उतरता था। इसका कारण भी यह कि कुछ समय पैदल चलना हो जाता है।पैदल आते वक्त ग्राउंट फ्लोर पर जहां सीढ़ियां समाप्त होती उससे कुछ दूरी पर रखे बड़े से फिश पॉट के पास कुछ पल ठिठक कर इन तीनों की भागदौड़ देखकर मैं पार्किंग की तरफ बढ़ जाता।दस मंजिला इमारत में कई कंपनियों के ऑफिस और उनमें तीन शिफ्टों में काम करने वाले सैंकड़ो कर्मचारी हैं।
बाकी किसी को इन मछलियों ने आकर्षित किया या नहीं लेकिन सीढ़ियों से उतरते वक्त कुछ पल इनके पास ठिठक जाना मेरा तो रोज का क्रम है। करीब डेढ़ डेढ़ महीने पहले एश कलर वाली मछली फिश पॉट से गायब हो गई। नाइट शिफ्ट वाले वॉच मेन से पूछा एक कहां चली गई? उसने उदास लहजे में कहा सर वह मर गई। पानी बदल कर इन दोनों को रखा है।
अभी तीन दिन पहले केशरिया रंग वाली एक मछली और कम हो गई। नाइट शिफ्ट वाले वॉचमेन का चेहरा भी यह बताते हुए उदास हो गया कि पानी बदलने के दौरान वह हाथ से फिसल गई और छटपटा कर मर गई।अब यह अकेली बची है। काले रंग वाली यह मछली भी एक बिलास भर जितनी लंबी है।डेढ़ दो महीने के अंतराल में दो मछलियों का इस तरह चले जाना कोरोना पीड़ित किसी परिवार से यकायक दो सदस्यों की बिदाई जितना ही दुखद लग रहा था मुझे।
रोज की तरह सीढ़ियों से उतरा, फिश पॉट के समीप ठिठका भी लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हुई कि कांच की दीवार पर अंगुली से ठक ठक करुं और उसे उसकी सहेलियों के न होने की याद दिलाऊं।मैं रोज कुछ पल चुप सा खड़ा रहता हूं, उसे यहां से वहां आते जाते देखता हूं और आगे बढ़ जाता हूं।लगता है उसके दो दोस्तों के जाने का दुख मुझे अधिक है लेकिन वह अकेली जिस तरह उनकी जुदाई भुलाकर यहां वहां घूम रही है तो शायद यह कहना चाहती है कि किसी के रहने ना रहने से जीवन ना तो मरता है ना थमता है।पेड़ से कुछ पत्ते सूख कर तो कुछ तेज हवाओं के कारण झड़ जाते हैं, बाकी बचे पत्ते भी जुदा होने वालों के गम में कहां दुखी होते है, दुखी हो भी जाएं तो जो जुदा हो गए वो आने से तो रहे। उनसे खाली हुई जगह पर फिर कोपल फूटेगी, नए पत्ते आ जाएंगे और आने-जाने का यह क्रम चलता रहेगा।
ठीक भी तो है, दस मंजिला इमारत में नियमित आने जाने वालों में से कितनों ने फिशपॉट में इतराती मछलियों को देखा, कितनों ने उनकी संख्या पर ध्यान दिया और किस किस को फर्क पड़ा एक-दो मछली के कम या अकेली मछली के बचे रहने पर किस का दिल दुखा।मौसम आएंगे, जाएंगे,ट्रेन प्लेटफार्म पर आएगी, यात्रियों को उतारेगी, नयों को बैठाएगी और आगे बढ़ जाएगी।अकेली मछली उस छोटे से तालाब में यहां वहां घूम रही है और जीवन चलने का नाम है यह भी याद दिला रही है।

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