@ राकेश अचल

जानलेवा कोरोना ने पलटवार किया है.हमें शायद इसका अंदाजा नहीं था .सरकार ने कोरोना प्रतिरोधी वैक्सीन तो बना ली लेकिन उसका उत्पादन इतना नहीं हो पाया कि पूरी आबादी को इसे उपलब्ध कराया जा सके.अब एक तरफ मौत का साया है और दूसरी तरफ वैक्सीन की किल्लत .देश में जहाँ चुनाव नहीं हैं वहां स्थिति भयावह है.लोग घबड़ाहट में न जाने क्या-क्या कर रहे हैं,लेकिन ये समय घबड़ाकार हार मानने का नहीं,अग्निपरीक्षा का है .इसे संयम से उत्तीर्ण किया जा सकता है.
मैंने अपने पिछले आलेख में देश में कोरोना वैक्सीन की किल्लत को लेकर लिखा था तो मुझे तोहमत दी गयी थी ,लेकिन आज खुद सरकार ने कोरोना वैक्सीन की किल्लत के चलते टीकाकरण की पहली खुराक को तीन दिन के लिए स्थगित कर दिया है.दूसरे डोज का अंतराल पहले ही बढ़ाया जा चुका है .सरकार सारा कस-बल लगा ले तो भी देश की समूची आबादी को टीका लगवाने में उसे अभी चार साल लगेंगे.भारत इस मामले में अमेरिका का मुकाबला नहीं कर सकता,क्योंकि अमेरिका में आबादी भारत की आबादी से आधी भी नहीं है. अमेरिका से हमें होड़ करना भी नहीं है.वहां अभी तक 44 फीसदी आबादी का टीकाकरण हो चुका है.दूसरा राहत पैकेज घोषित हो चुका है .
भारत में जो स्थितियां हैं वे दुनिया के दूसरे देशों से भिन्न हैं. हमारे यहां कोरोना से निबटने के तरीके समय सापेक्ष नहीं हैं .हम इस मामले में ईमानदार भी नहीं हैं. हमारी अदालतें एक और कार में अकेले चालक के लिए भी मास्क की अनिवार्यता बताती हैं वहीं जहाँ चुनाव हो रहे हैं वहां के लिए किसी अदालत के पास कोई विवेकपूर्ण और अनिवार्य दिशानिर्देश नहीं है ,ऐसे में हम केवल संयम से ही कोरोना का मुकाबला कर सकते हैं .दुर्भाग्य ये है कि ये संयम हम खोते जा रहे हैं .
विनाश काल में बुद्धि का विपरीत होना सहज मानवीय स्वभाव है .आज के हालात में देश की पूरी आबादी को कोरोना का टीका उपलब्ध करना जब असम्भव हो ही गया है तब लोगों को बाकायदा इसके लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा भी करना चाहिए,बेहतर हो कि इस संक्रमण काल को सरकार लाभ का अवसर न बनने दे.और निजी अस्पतालों में टीकाकरण को या तो फौरन रोके या फिर वहां निशुल्क टीकाकरण की व्यवस्था करे.इंदौर के बाजारों की तस्वीरें इस बात की गवाह हैं कि मौत से घबड़ाये लोग कोरोना का टीका बाजार से खरीदने के लिए किस तरह जान हथेली पर लिए दवा दुकानों के बाहर खड़े हैं .
आज के हालात में सरकार की नाकामी पर उंगली उठाकर हम देख चुके हैं,इससे कुछ होने वाला नहीं है सिवाय इसके कि आप देशद्रोही घोषित कर दिए जायेंगे .बेहतर है कि आप इस नाकामी के बावजूद सरकार के साथ खड़े हों.सरकार जो दिशा निर्देश दे उनका पालन करें ताकि जन-जीवन अस्त-व्यस्त न हो.लाकडाउन न लगना पड़े .कर्फ्यू न लगना पड़े .अगर हमारे पास पर्याप्त वैक्सीन होती तो मुमकिन है कि ये हालात पैदा ही न होते.अब जब हालात बिगड़ रहे हैं तो हमें यानि जनता को सुधर जाना चाहिए .हम केवल और केवल ऐहतियात बरत कर कोरोना से दो-दो हाथ कर सकते हैं .
कोरोना जैसी अर्द्धमहामारी के समय में हमारी घबड़ाहट ही हमें मौत का आसान ग्रास बना सकती है. कोरोना को तो शिकार चाहिए,यदि शिकार आसानी से बाजार में उमड़ी भीड़ के बीच हासिल होगा तो कोरोना भला उसे क्यों छोड़ेगा.? सो कृपाकर मौत से घबड़ाइये मत.मौत को झांसा दीजिये,उससे लुका-छिपी का खेल खेलिए .मौत यदि ‘डाल-डाल है’ तो आप ‘पात-पात ‘चलिए.अंतत:मौत हार मान लेगी .न मान ले तो आप मेरा नाम बदल दीजिये .मौत से जनता को डर लगता है,सियासत को नहीं,सरकार को भी नहीं,क्योंकि दोनों मौत को चकमा देना जानते हैं. वे मौत को उसकी खुराक देना जानते हैं.भीड़ मौत की खुराक है और भीड़ कोई और नहीं केवल सियासत वाले जुटाते हैं,सो इनसे बचिए.भीड़ का हिस्सा बनिये ही मत.
सौभाग्य से संयम हमारे जीवन दर्शन का अंग रहा है. हमारे यहां कहा जाता है कि -‘संयम मुक्त भोग और पूर्ण त्याग के मध्य आत्मनियंत्रण की स्थिति है। व्यवहारिक जीवन और आध्यात्मिक साधनाओं में सफलता के लिए इसे अनिवार्य माना गया है। आध्यात्मिक दृष्टि से संयम आत्मा का गुण है। इसे आत्मा का सहज स्वभाव माना गया है। संयम शून्य अबाध भोग से इन्द्रिय की तृप्ति संभव नहीं है। संयम मुक्त इंद्रिय व्यक्ति एवं समाज को पतन की ओर अग्रसर करती है।इसलिए इस आपदा के समय ये संयम ही एकमात्र अमोघ अस्त्र है,औषधि है .जरा संयम करके तो देखिये .मास्क पहनिए,दूरी बनाकर चलिए ,देखें कोरोना कैसे आपके पास फटकता है ?
इस समय दान-पुण्य का समय नहीं है. सरकार ने पुण्य कमाने के लिए दुनिया के 78 देशों को वैक्सीन का दान क्या और अब सरकार के हाथों से तोते उड़ते दिखाई दे रहे हैं. मै दान को बुरा नहीं मानता,आवश्यक मानता हूँ लेकिन तब जब दान करने की आपकी हैसियत बन जाए. दुनिया के कम आबादी वाले देश आने वाले दिनों में वैक्सीन दान करेंगे,क्योंकि उनके यहाँ आने वाले तीन महीने में सोलह साल तक की आबादी के टीकाकरण का लक्ष्य पूरा हो जाएगा लेकिन तब तक ‘अपना हाथ ही ,जगन्नाथ ‘ है .हमारे पास वैक्सीन उत्पादन की जितनी कसमता है उसे देखते हुए हमें धीरे-धीरे अपने लक्ष्य को हासिल करना होगा .
दुर्भाग्य से अभी भारत में 45 वर्ष तक की आयु की आबादी के लिए वैक्सीन की दोनों खुराकों का पूरा इंतजाम नहीं है ऐसे में 45 से कम आयु वर्ग के लिए वैक्सीन का सवाल ही पैदा नहीं होता.जरूरत इस बात की है की वैक्सीन आने तक 16 से 45 वर्ष तक की आयु वर्ग के लोग ज्यादा एहतियात बरतें .सरकार भी निर्धारित आयु वर्ग को टीका उपलब्ध करने में कठोर अनुशासन का पालन कर,इस मानवीय कार्य में कोई राजनितिक दखल,भाई-भतीजावाद या नौकरशाही का दखल नहीं होना चाहिए ,तभी बात बनेगी ,अन्यथा न अस्पतालों में जगह मिलेगी और न श्मशानों में .
विषाणु से लड़ने की अन्य चिकित्सा पद्यतियों की अनदेखी भी इस दौर में नहीं की जाना चाहिए.देश की बहुसनख्यक आबादी के पास अभी भी आंग्ल चिकित्सा पद्यति नहीं पहुंची है.ऐसे में आयुर्वेद ,होम्योपैथी और यूनानी को भी काम करने दिया जाये.ये विधियां कम से कम आदमी की जीवनी शक्ति को तो बनाये और बढ़ाये रख सकती हैं .संयम के बारे में सूक्ति वाक्य अनेक हैं ,लेकिन मै महात्मा गांधी को याद करता हूँ .वे कहते थे कि -‘अपने देश या अपने शासक के दोषों के प्रति सहानुभूति रखना या उन्हें छिपाना देशभक्ति के नाम को लजाना है, इसके विपरित देश के दोषों का विरोध करना सच्ची देशभक्ति है।’
बाइबल कहती है की -‘: संयम चरमों में जाने से बचाता है, संयम रोकता है और यह आत्म-नियन्त्रण से सम्बन्धित है। संयम एक अच्छी बात है, परन्तु संयम का जीवन यापन करना एक चुनौती है।’गीता कहती है की संसार में सुख-दुःख,सर्दी-गर्मी आने-जाने वाले द्वन्द अनित्य हैं ,निराशा में मत डुबो,उत्साह मत छोडो ,सहनशील बनो.वे दिन नहीं रहे तो ये दिन भी नहीं रहेंगे ..

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