Home मीडिया गई कील खुल पिंजरा की और उड़ गई रायमुनैया 

गई कील खुल पिंजरा की और उड़ गई रायमुनैया 

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स्मृति शेष: प्रवीण श्रीवास्तव

ओमप्रकाश श्रीवास्‍तव

मैंआज अश्रुपूरित नेत्रों से एक असाधारण शख्‍स का साधारण विदाई लेख लिख रहा हूँ। असाधारण इसलिए कि उसके जीवन में ईश्‍वर ने जितने संघर्ष दियेे, वह उतनी ही जीवटता से उनसे लड़ा । स्‍वयं अभावग्रस्‍त होते हुए भी दूसरों के लिए दिल खोल देता था। स्‍वयं बीमार होते हुए भी दूसरों के इलाज के लिए कभी भी, कहीं भी दौड़ पड़ता था। गरीब बच्‍चों को नि:शुल्‍क कोचिंग देना, मॉंं के प्रति श्रद्धा और कर्तव्‍यबोध जगाने के लिए ‘मिशन ऑफ मदर’ चलाना, बुंदेलखंड की संस्‍कृति के प्रचार-प्रसार और संरक्षण के लिए ‘बुंदेली बुलौआ’ का आयोजन करना, भोपाल में ‘बुंदेली भवन’ की शुरुआत करना, बिना किसी मदद के कन्‍याओंं की शादियॉं कराना, बालिका शिक्षा में क्रांति ला देनी वाली साइकिल प्रदान करने की योजना का सर्वप्रथम शासन को सुझाव देना उसी के कूबत की बात थी। पत्रकारिता में जन सरोकारों के मुद्दों की खोज में बहुत कम लोग उसकी बराबरी कर सकते थे। जब पत्रकारिता मठाधीशों की चेरी बन रही हो तब खबरें एकत्र करना, लिखना, ‘सौम्‍य संवाद’ छापना, उसे बसों पर रखकर जिलों में भेजना और बँटवाने तक का काम करना हर किसी के बूते की बात नहीं है। कभी हार न मानना उसका स्‍वभाव था। अकेले दम पर शंखनाद यू ट्यूब चैनल चलाना और मृत्‍यु के महज 36 घंटे पूर्व डायलिसिस कराने के बाद पूरे शरीर में सूजन लिए हुए कॉंपती आवाज में बिजली कर्मचारियों के पक्ष में शंखनाद चैनल पर वीडियो पोस्‍ट करने का कार्य असाधारण व्‍यक्ति ही कर सकता था और वह था प्रवीण श्रीवास्‍तव।

प्रवीण को मैं अपने छोटे भाई के मित्र के रूप में बहुत पहले से जानता था परंतु उसके गुणों से परिचय तब हुआ जब मैं 2012 में भोपाल पदस्‍थ हुआ । उसकी जीवटता, संघर्षशीलता, उदारता आदि गुणों का मैं ऐसा कायल हुआ कि उससे आत्‍मीय रिश्‍ता जुड़ गया। उसके मित्रों की लम्‍बी फौज थी। हर जिले में उसके मित्र और शुभचिंतक थे। मिशन ऑफ मदर के तहत वृद्धाश्रम की माताओं की पूजा और आरती के कार्यक्रम वह प्रदेश के बाहर भी कर चुका था। अपनी मॉं के प्रति उसका समर्पण जुनूनी था। 4 वर्ष पूर्व उसके बुंदेली बुलौआ कार्यक्रम में भोपाल में लगभग 1000 लोग शामिल हुए थे। बिना किसी वित्‍तीय स्रोत के केवल मित्रों के भरोसे ऐसे कार्यक्रम केवल प्रवीण ही कर सकता था। उसने टीकमगढ़ में मित्रों के सहयोग से प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए नि:शुल्‍क कोचिंग चलवाई और मुझे भी कई बार व्‍याख्‍यान देने के लिए पकड़ कर ले गया। एक पत्रकार साथी रफीक वेग की असमय मौत से वह इतना विचलित हुआ कि अपने 21 मित्रों से 100 रुपये लेकर प्रतिमाह 2100 रुपये रफीक के छोटे बच्‍चों को देने लगा।
कई बार लगता है कि भगवान परीक्षा तो लेता ही है कभी-कभी अन्‍याय भी करता है। प्रवीण को एक ही किडनी मिली थी और वह भी आधा अधूरा काम करती थी। इस बीच उसे ब्‍लड प्रेशर और डायबिटीज़ भी हो गई। इस बीच हार्ट में भी परेशानी आ गई। मैं कई बार कहता- प्रवीण अपने स्‍वास्‍थ्‍य को देखते हुए दिनचर्या नियमित करो। परंतु यह न हो सका क्‍योंकि प्रवीण की अपने काम के प्रति धुन ही उसकी दुश्‍मन थी। आर्थिक सुरक्षा के लिए रातदिन काम करना उसकी मजबूरी भी थी। उसकी सदाशयता के चलते उसे धोखे भी मिले। दो साल पहले मेरे पास खुशी से बताने आया कि उसे एक टीवी चैनल में काम मिल गया है। चैनल बुंदेलखंड के किसी ठाकुर साहब का था। ठाकुर साहब ने 8 माह काम कराया और वेतन के डेढ़ लाख रुपये दिये बगैर प्रवीण को चलता कर दिया। बुंदेली भवन पहले तो ठीक चला पर बाद में उसमें लगाए पैसे भी डूब गये। ऐसे अनेक वाकये हैं परंतु प्रवीण की विशेषता थी हर ठोकर के बाद भी हार न मानना और नए काम में उसी उत्‍साह और ऊर्जा से लग जाना ।
चार-पॉंच माह पहले प्रवीण ने फोन करके बताया कि उसका क्रियाटिनीन बढ़ गया है। यह उसकी एकमात्र किडनी के फैल होने का लक्षण था। मैं तुरंत उसके घर गया। कुछ दिन बाद उसका फोन आया कि दादा विदिशा के एक वैद्यजी से होम्‍योपैथी की दवा ली है और क्रियाटिनीन कंट्रोल में है। 24 मार्च को प्रवीण के बेटे आर्यन का फोन आया कि पापा को कोरोना हो गया है और वह जेपी अस्‍पताल में हैं। मैं तुरन्‍त अस्‍पताल पहुँचा। डॉक्‍टर से मिला । कई जगह संपर्क करने के बाद रेमडीसिवर इंजेक्‍शन उपलब्‍ध हो पाए। शायद प्रवीण को भावी का अहसास हो गया था। उसने कोरोना वार्ड से मैसेज किया कि दादा एम्‍स में भिजवा दो। कहीं बाद में पछताना न पड़े। इसके पहले वह अपने जीवन के संघर्ष पर 60 ब्‍लॉग लिख चुका था। शीर्षक भी उसने खुद दिया था ‘’जिंदगी और कुछ भी नहीं’’। कैसा संयोग है। खैर, दूसरे दिन प्रयास करके एम्‍स में भरती कराया । वहॉं एक दिन भी नहीं हुआ था कि डॉक्‍टर ने मुझसे कहा कि कोरोना तो छोडि़ये पहले डायलिसिस कराइये । क्रियाटिनीन इतना अधिक बढ़ गया है कि इनकी जान पर बन आई है। कोरोना मरीज का डायलिसिस करने को कोई तैयार नहीं । किसी प्रकार एक अस्‍पताल मिला । वहॉं 5 बार डायलिसिस कराया। कोरोना भी ठीक हो गया। मैं देखने अस्‍पताल गया तो प्रवीण ने थोड़ी बात की। डॉक्‍टर मुझसे बोले यह मरीज क्‍या करता है इसके लिए दसियों लोगों के फोन आ चुके हैं। मैनेंे कहा करता क्‍या है यह मायने नहीं रखता, फोन इसलिए आए क्‍योंकि यह शख्‍स दूसरों के लिए जीता है ।

8 अप्रैल को प्रवीण घर वापस आ गया। 11 अप्रैल से शंखनाद चैनल पर वीडियो पोस्‍ट करने लगा। प्रवीण की कर्मठता देखिए। फेसबुक पर सिक्‍योरिटी डिवायस सिस्‍टम और विज्ञापन फिल्‍में बनाने की घोषणा कर दी और लोगों से सेवा का अवसर देने का अनुरोध करने लगा। उसकी यही जीवटता देख मुझे विश्‍वास हो गया कि मौत हार चुकी है। 13 अप्रैल को शरीर में सूजन आ गई और पुन: डायलिसिस हुआ । उसका मैसेज आया तो मैनें लिखा कि डायलेसिस के बाद बात करते हैं। प्रवीण ने अपना वचन निभाया और रात में मुझे फोन किया पर मैं फोन नहीं उठा पाया। दो दिन अन्‍य व्‍यस्‍तताओं में निकल गये। 17 मार्च को पचमढ़ी में था। रात 3 बजे मेरी नींद खुल गई। अजीब सी बैचेनी लगती रही। 5 बजे तक नींद नहीं आई। सबेरे 6.15 बजे प्रवीण के मोबाइल से फोन आया तो एकदम अनहोनी की आशंका हो गई। एक बुंदेली लोकगीत मेरे मस्तिष्‍क में कौंध गया – ‘’गई कील खुल पिंजरा की और उड़ गई रायमुनैया’’। आशंका सही निकली। दुख इस बात का है कि यह कील समय के पहले ही खुल गई।  मुझे सदैव इस बात का मलाल रहेगा कि प्रवीण का अंतिम फोन मैं नहीं उठा पाया ।
प्रवीण, वह अनगढ़ हीरा था जिसे दुनिया पहचान नहीं पाई और ईश्‍वर ने भी उसे अवसर नहीं दिया। प्रवीण के पुत्र और पुत्री दोनों ही बड़े मेधावी हैं। उनके उज्‍जवल भविष्‍य के लिए ईश्‍वर से प्रार्थना करता हूँ।  (इंडिया डेटलाइन)                                                       

(श्रीवास्तव मध्यप्रदेश में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हैं।)

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