-शिवकुमार विवेक

काल की क्रूर कथा कब रुकेगी ! हर रोज मित्र, परिजनों, परिचितों और प्रतिभाओं को हमसे छीन ले जाता है। कल जिन तीन हस्तियों के जाने की खबर मिली, उससे ऐसा लगा कि मध्यप्रदेश में इतिहास का आंगन ही सूना हो गया। भोपाल में रहने वाले इतिहास के विशेषज्ञ, पुरातत्व विभाग के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के सदस्य डॉक्टर रहमान अली चले गए। इसके बाद मध्यप्रदेश के मध्यकालीन इतिहास के शीर्ष अध्येता डॉक्टर सुरेश मिश्र के देवलोक गमन की सूचना मिली। और फिर सीतामऊ के नटनागर शोध संस्थान के सचिव डॉ मनोहर सिंह राणावत से वंचित होने का दुख मिलना था।
डॉ. रहमान ने प्राचीन भारतीय इतिहास में डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर की परंपरा को आगे बढ़ाया था। ‘मध्यप्रदेश के मंदिर’ उनके शोधकार्य का अच्छा नमूना है। इसके अलावा उज्जैन और मालवा के बौद्ध स्थलों का अध्ययन भी उनका महत्वपूर्ण कार्य था। पिछले दिनों डॉक्टर वाकणकर की जन्म शताब्दी के सिलसिले में उनसे लिखने का आग्रह किया तो उन्होंने कहा कि कोलार स्थित मेरे घर आ जाओ। उनके बारे में जो सुनना है, सुनते जाना, लिखते जाना। इसके अलावा मेरे पुस्तकालय में बैठकर जो चाहे, निकाल लेना। डॉक्टर रहमान को मोदी सरकार ने भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का सदस्य बनाया था, जिसके सिलसिले में वे दिल्ली आते-जाते रहते थे लेकिन अवस्था अधिक होने के कारण उन्हें दिक्कत होने लगी थी।
प्रो. सुरेश मिश्र मंडला और होशंगाबाद में इतिहास पढ़ाने के बाद भोपाल आ गए थे और लगातार बुंदेलखंड, महाकौशल, मालवा के प्राचीन इतिहास को खंगालते रहते थे। उन्होंने इन विषयों पर 40 से ज्यादा पुस्तकें और अखबारों में सैकड़ों लेख लिखे। हाल के दिनों में तो वे मध्यप्रदेश के मध्यकालीन इतिहास के एकमात्र शब्दकोश नजर आते थे। इस पर खूब कलम चलाते थे और सवालों का समाधान करते थे। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में मिले तो चूना भट्टी स्थित घर ले गए। घर में वे अकेले ही रहते थे। पत्नी का निधन हो चुका था और दो बेटियों का उज्ज्वल भविष्य लिख चुके थे। एक आईपीएस बेटी भोपाल में ही थी। उनके तमाम आग्रह के बावजूद वे अकेले रहना पसंद करते थे। उन्होंने बताया कि अब उनके तीन ही काम हैं- सुबह घूमना, अपना भोजन खुद पकाना और फिर कंप्यूटर पर बैठकर इतिहास का कोई नया पन्ना लिखना। उन्होंने बताया कि शासकीय सेवा में रहते हुए उन्होंने चंद ही पुस्तकें लिखी थीं जबकि सेवानिवृत्ति के बाद लेखन का संसार रच दिया। उम्र उनके आड़े नहीं आई और वह आखरी समय तक लिखते रहे। हाल में हमारे मित्र विजय मनोहर तिवारी के साथ विदिशा जिले के उदयपुर के शोध-अनुसंधान में युवकोचित ऊर्जा के साथ लगे हुए थे।
इतिहास के क्षेत्र की तीसरी हस्ती डॉ. मनोहर सिंह राणावत को हमने खोया। मंदसौर जिले के सीतामऊ जैसी छोटी जगह में राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करने वाला नटनागर शोध संस्थान चला रहे थे। वे उसके सचिव थे। इतिहास व प्राचीन संस्कृति के अध्ययन और अनुसंधान के मामले में इस संस्थान में खास छवि बनाई है। इस विषय में देश भर के अध्येता यहां आते हैं, कभी संदर्भों को खंगालने, तो कभी संवाद और परिसंवादों में भाग लेने के लिए। कई छात्रों ने इतिहास और भारतीय संस्कृति में यहीं से पीएचडी की।
इतिहास की इन तीन हस्तियों के अलावा हमने दो अन्य क्षेत्रों के दो साथियों को भी खो दिया। भोपाल के कला समीक्षक सुनील मिश्र हम लोगों की पत्रकारिता के शैशव काल के साथी थे। जब हम लोग अस्सी के दशक में भोपाल में नईदुनिया के संस्करण की रचना कर रहे थे तब उन्होंने कला समीक्षाओं में हाथ आजमाना शुरू किया था। बाद में उन्होंने इसमें अच्छा दखल हासिल किया। फिल्म समीक्षा के मामले में तो वे भोपाल में नंबर एक हो गए थे। लगभग उसी पीढ़ी के मनोज पाठक भी हमसज असमय बिछुड़ गए।
मैं इस श्रंखला में एक और नाम जोड़ना चाहता हूं जिसे सार्वजनिक जीवन में वही लोग पहचानते हैं जिन्होंने उनसे जुड़ कर काम किया है। क्योंकि प्रसिद्धि, पद और प्रतिष्ठा से वह एकदम दूर रहे। दमोह के विनायकराव शेड्ये 95 वर्ष की आयु में लंबी निरोगी पारी खेलकर इन दिनों अस्वस्थ चल रहे थे। वे सरस्वती शिशु मंदिरों की शीर्ष संस्था विद्या भारती के योजनाकारों और परामर्श दाताओं में से एक थे। आजादी के आसपास काशी विश्वविद्यालय से फार्मेसी की डिग्री लेने के बाद उन्होंने अपनी आयुर्वेदिक फार्मेसी शुरू की लेकिन अधिकतर समय समाज सेवा में देते रहे। प्रबंधन के वे ऐसे गुरु थे जिनकी आंखों में हर चीज की नाप और माप होती थी। आदमी को मापने का भी उनके पास गजब पैमाना था। इसी के बलबूते पर उन्हें एक कुंभ मेले के व्यवस्थापकों में रखा गया था।
(चित्र : प्रोफेसर सुरेश मिश्र)

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