सुनील भाई,
अरे भाई, इतनी भी क्या जल्दी थी? अभी कुछ दिन पहले ही तो आपने फोन पर कहा था कि मुझे अभी बहुत से काम करने हैं। 19 अप्रैल को बेटे के जन्म दिन की अग्रिम बधाई देते हुए घर का हाल-चाल जाना था। हम कम ही बातें करते, पर जब भी करते, ढेर सारी बातें होती। इन बातों में लेखन पर चर्चा कम ही होती। परिवार के एक-एक सदस्य पर बात होती। कौन क्या कर रहा है? गुड्‌डन क्या कर रही है, राजू के क्या हाल हैं। बाबूजी कैसे हैं? बालक क्या कर रहा है? आदि बातों में हमारा काफी वक्त निकल जाता। फेसबुक पर हमेशा सक्रिय। हाल ही में उन्होंने ही मेन धर्मेंद्र जी से बात करते हुए उनकी आवाज भी सुनाई थी। मुझे याद है, 8 दिसम्बर को धर्मेंद्र जी का जन्म दिन होता है, उस दिन देश-विदेश से 20-25 महत्वपूर्ण लोग मुम्बई में उनके घर पहुँचते, उनमें से सुनील मिश्र भी अवश्य होते। देओल परिवार से उनका आत्मीय रिश्ता था। नवभारत में काम करने के दौरान सुनील भाई का काफी साथ मिला। फिल्मी पेज उनकी सहायता के बिना निकलना संभव नहीं था। ढेर सारी जानकारी होती थी उनके पास। मैं तो उन्हें फिल्मी जानकारी का चलता-फिरता संग्रहालय ही कहूँगा। देश भर के अखबारों, फिल्मी मैगजीन्स में उनका सटीक विश्लेषण के साथ आलेख का होना इस बात का परिचायक होता कि वे जिस पर भी वे कलम चलाते, वह कभी नाराज नहीं होता। फिर चाहे वे श्याम बेनेगल हों, ए.आर.रहमान हो, मोहन अगासे हों, इस तरह से लम्बी फेहरिश्त है। सभी उनकी लेखनी के कायल हैं। फिल्मों की गहरी समझ उनकी विशेषता होती। छोटे-छोटे कलाकार भी उनकी लेखनी से बच नहीं पाए। राम रतन सेन जैसे कलाकार पर भी उनकी कलम खूब चली। कई कलाकारों को पहचान उन्होंने ही दी।
सुनील भाई, इन दिनों नाटक लिखने लगे थे। कुछ नाटकों का सफल प्रदर्शन भी हुआ। लॉकडाउन के दौरान कला-संस्कृति के क्षेत्र के कई विख्यात लोगों से बातचीत का सिलसिला चल ही रहा था। जिसका संकलन कर किताब का रूप देना उन्हें भारी लग रहा था। वे तो अपनी कविताओं की किताब भी नहीं निकाल पा रहे थे। संवेदनाओं से परिपूरित सुनील भाई कभी अपने डॉगी पर लिखते, कभी गिलहरी उनके हाथों से चुग्गा लेकर चली जाती। अपने मूक साथियों के लिए भी उनके पास शब्द होते। जिसे वे गाहे-बगाहे अभिव्यक्ति देते रहते।
सुनील भाई का चला जाना सचमुच बहुत ही दु:खद है। सुनहरी यादों का एक लम्बा सिलसिला ही शुरू हो गया है। कभी किसी से ऊंची आवाज में उन्होंने बात तक नहीं की। बाहर और भीतर से सहज और सरल। न तो किसी बात पर अभिमान रहा, न ही कभी किसी पर उन्होंने कटाक्ष किया। मेरे अलावा ऐसे बहुत से साथी हैं, जिनके लिए वे बहुत अच्छे मित्र रहे। सभी की ओर से उन्हें भीगी आँखों से नमन, भावपूर्ण श्रद्धांजलि…
डॉ. महेश परिमल

Spread the love

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here