भोपाल. इंडिया डेटलाइन. काल की गति इतनी तेज है कि किसी एक व्यक्ति को खोने के गम को शब्द नहीं दे पाते, दूसरे के निधन का समाचार आ जाता है। आज एक के बाद एक चार नामचीन लोगों के जाने की सूचनाएं मिलीं। यद्यपि परिचितों-परिजनों में और भी लोग भगवान को प्यारे हो गए।

आज जो दो महान व्यक्तित्व हिंदी के क्षेत्र को सूना कर गए, उनमें एक अरविंद कुमार हैं, जिन्होंने हिंदी का पहला थिसारस ‘समांतर कोश’ लिखा था। नेशनल बुक ट्रस्ट ने स्वाधीनता के 50 वर्ष में इसे प्रकाशित किया था। 1100 शीर्षकों, 23 759 उपशीर्षकों और 1 लाख 60 हजार 850 अभिव्यक्तियों वाला यह दो खंडों में प्रकाशित 1768 पृष्ठों का ग्रंथ है। अरविंद कुमार ने यह अपनी पत्नी कुसुम कुमार की सहयोग से 1997 में पहली बार प्रकाशित किया। वे 1930 में मेरठ में जन्मे और दिल्ली की सरिता, मुक्ता (दिल्ली प्रेस) से होते हुए मुंबई में माधुरी के संपादक हुए। रीडर्स डाइजेस्ट के हिंदी संस्करण के वह पहले संपादक थे। प्रयोगधर्मी थे। उनके अलावा हमने अपने ही नजदीक रहने वाले और अपनी ही भाषा के साहित्य को समृद्ध करने वाले सागर के डॉ. कांतिकुमार जैन को खो दिया। डॉक्टर जैन संस्मरण की विधा में अभिनव काम कर रहे थे और संस्मरणों की पहली पुस्तक ‘लौटकर आना नहीं होगा’ प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा ‘छत्तीसगढ़ की जनपदीय शब्दावली ‘ शीर्षक से उन्होंने काफी गंभीर काम किया। डॉक्टर जैन की याद मुझे पिछले कोविड-19 तब आई थी जब मैं देवरी के कवियों के समूह मीर मंडल के बारे में अनुसंधान कर रहा था। मीर मंडल देवरी जैसे छोटे से कस्बे में राष्ट्रीय ललक लिए हुए कवियों का समूह था। संयोग से डॉ जैन का जन्म भी इसी देवरी में हुआ था। इसके कवियों पर डॉक्टर कांति कुमार जैन ने स्मरणीय काम किया। पिछले कोविड-19 मैंने अपने एक मित्र से मीर मंडल के कवियों के साहित्य को डॉ कांति कुमार जैन के सहयोग से संकलित करने की बात कही थी। डॉक्टर जैन ने अधिकतर छत्तीसगढ़ में अध्यापन करते हुए वहां के साहित्य पर काफी शोध किया। बाद में वे डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग अध्यक्ष के साथ मुक्तिबोध व बुंदेली शोध पीठ के निदेशक बनकर आ गए थे।

दो राजनेता भी खोए


राजनीति के क्षेत्र की बात करें तो आज दो पुराने दिग्गजों के महाप्रयाण की सूचनाएं मिलीं। भारतीय जनता पार्टी के पांच बार सांसद रहने वाले रामेश्वर पाटीदार चले गए। वे भी उक्त दो हस्तियों की तरह तीस के दशक में जन्मे थे। 77 की जनता लहर में पहली बार सांसद बने थे। उसके बाद लगातार लोकप्रिय होते गए और दो बार क्षेत्र के निमाड़ के दिग्गज नेता और मध्यप्रदेश में उपमुख्यमंत्री रहे सुभाष यादव को हराया। जब नर्मदा बांध की ऊंचाई कम करने का आंदोलन चल रहा था, तब रामेश्वर पाटीदार भारतीय जनता पार्टी के मुखर व्याख्याकार बनकर उभरे थे।

छत्तीसगढ़ में अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी राजनेता करुणा शुक्ला भी चली गईं। उनका जन्म 1950 में हुआ था। तीन दशक से ज्यादा समय तक जनसंघ, जनता पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की सदस्य रहने वाली करुणा शुक्ला 2013 के बाद कांग्रेस में चली गई थीं। कांग्रेस के टिकट पर पहले लोकसभा चुनाव हारीं जिसके बाद निवृत्तमान मुख्यमंत्री रमन सिंह के हाथों विधानसभा चुनाव हार गई थीं।

Spread the love

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here