गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर !
7 मई जन्मदिवस पर विशेष !!
महिमा वर्मा

सोनार बंगभूमि अनेकों साहित्यकारों,समाज-सुधारकों,दार्शनिकों,ललित-कलाओं में निष्णात विभूतियों की जन्मभूमि रही है|गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर भी उन महान विभूतियों में से एक हैं जिन्होंने न केवल बंगाल वरन भारतवर्ष का नाम विश्व के सांस्कृतिक,साहित्यिक पटल पर महिमा मंडित किया| गुरुदेव ने अपनी काव्यकला से संसार भर में ख्याति प्राप्त कर नोबल पुरस्कार प्राप्त करके भारतीय कविता,कवियों एवं भारत देश का मान बढ़ाया था। 7 मई 1861 को कोलकता में जन्मे रवीन्द्रनाथ बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारत में एक नई सांस्कृतिक चेतना के आधार बने|
महात्मा गांधी के द्वारा गुरुदेव की उपाधि प्राप्त रवीन्द्रनाथ टैगोर की कवितायें भारतवर्ष एवं बांगला-देश का राष्ट्रगान एवं श्रीलंका के राष्ट्रगान का आधार बनीं|’गीतांजलि’ काव्य संग्रह ने उन्हें एक ओर नोबल पुरूस्कार दिलाया वहीं पूरे विश्व में भारतीय साहित्य को एक नई पहचान दिलाई|गुरुदेव की साहित्यिक उत्कृष्टता से हर कोई परिचित है|आज उनकी इस जन्मतिथि पर हम उनके शिक्षा के क्षेत्र में दिए गए अपूर्व एवं अनूठे योगदान को याद करेंगे|
गुरुदेव केवल एक कवि ही नहीं थे बल्कि एक एक चित्रकार, संगीतज्ञ, पत्रकार, अध्यापक, दार्शनिक, शिक्षाशास्त्री, महान प्रकृति प्रेमी और साहित्यकार भी थे।शिक्षा प्रणाली के प्रति उनका दृष्टिकोण सामान्य से भिन्न था|उनके अनुसार ज्ञान अनंत है उसे सीमाओं में नहीं बाँध सकते|प्रकृति एवं हमारी अपूर्व सांस्कृतिक,आध्यात्मिक विरासत ज्ञान प्राप्ति का आधार होना चाहिए,केवल किताबी ज्ञान काफी नहीं है|कह सकते हैं उनकी शिक्षा पद्धति व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकासोन्मुख थी|प्रकृति के साथ समायोजन,ललित कलाएं जैसे संगीत,नृत्य,चित्रकला,नाटक-मंचन,लोक-गीत,नृत्य जो हमारी अनमोल धरोहर हैं इत्यादि व्यक्तित्व को परिष्कृत करती हैं,जीवन को एक विस्तृत केनवास पर देखने के लिए तैयार करती है और साथ ही मानवीय गुणों को जीवित रखती है| कलकत्ता के निकट प्रकृति की गोद में एक लायब्रेरी के साथ पांच विद्यार्थियों को लेकर इन्होने ‘यत्र विश्वम भवत्यकनीडम’ के ध्येय के साथ शान्तिनिकेतन के रूप में एक शिक्षा केंद्र की स्थापना की थी जो आगे जाकर ‘विश्व भारती’ के नाम से सांस्कृतिक रूप से समृद्ध विश्वविद्यालय बना एवं अपने नाम के अनुसार सम्पूर्ण विश्व में अपनी सम्पूर्ण भारतीयता के साथ बहुत प्रसिद्ध हुआ।गुरुदेव ने स्वयं अपने इस शिक्षण-संस्थान में एक अध्यापक के रूप में कार्य किया था।  गुरुदेव के अनुसार सर्वोत्तम शिक्षा वही है जो एक तरफ पर्यावरण,प्रकृति,लोक-कलाओं,देश के प्रति अकूत प्रेम को मन-मस्तिष्क का एक हिस्सा बनाती है तो दूसरी ओर हमें वैश्विक परिप्रेक्ष्य में सोचना और कार्यान्वित करना सिखाती है|’ग्लोबल सिटीज़न’ का कॉन्सेप्ट जो हम आज सुनते है गुरुदेव तो उसकी परिकल्पना और कार्यान्वयन कितने वर्षों पूर्व ही कर चुके थे|असली शिक्षा वह होती है जो प्राचीन और नवीन का सामंजस्य स्थापित करती है। गुरुदेव ने शिक्षा को केवल किताबी ज्ञान न मान कर विकास की निरंतर प्रक्रिया माना और उसे मनुष्य के शारीरिक, बौद्धिक, आर्थिक, व्यावसायिक,सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक विकास का आधार माना|शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य जीवन की वास्तविकता से परिचित करवाना, पर्यावरण की जानकारी देकर उससे अनुकूलन स्थापित करवाना, बालक को धैर्य, आत्मानुशासन, नैतिक एवं आध्यात्मिक गुणों की शिक्षा देकर अपने सांस्कृतिक गौरव एवं देशप्रेम के साथ एक आदर्श वैश्विक नागरिक बनने की ओर अग्रसर करना है|
गुरुदेव का मानना था कि पेड़ों पर चढना,फूलों को खिलते देखना, पेड़-पौधों से फल-फूल तोडना,पंछियों का कलरव,सूरज के लाल-सुनहरे गोले को उगते और डूबते देखना, प्रकृति के साथ अनेक तरह की अठखेलियाँ करने से बालक के शरीर के साथ-साथ मन-मस्तिष्क के आनंद और बचपन के स्वाभाविक आवेगों की भी संतुष्टि होती है,ज्ञान प्राप्ति तो होती ही है और रचनात्मकता सोच भी विकसित होती है|यह अनोखा मेल विद्यार्थियों को अपनी क्षमताओं को सम्पूर्ण विस्तार देने में सहायक होता है| गुरुदेव का मानना था कि विद्यालयों को प्रकृति के सान्निध्य में होना चाहिए।आज जब हम बड़े क्रूर और कठोर उदाहरणों से सामना करके प्रकृति विनाश के दुष्परिणामों को देख और भुगत रहे हैं तब गुरुदेव की शिक्षा-प्रणाली का मूल-मन्त्र कि मानव प्रकृति के साथ साथ चलें और विद्यालयों को प्रकृति और समाज के बीच संतुलन स्थापित करने वाला होना चाहिए की दूरगामी सोच को नमन करने का मन होता है|
गुरुदेव शिक्षा के सर्वोत्तम आदर्शों को स्थापित करने के लिए लगातार प्रयास करते रहे,उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में नवीन प्रयोगों को करके उसे आदर्श जीवन का एक सजीव प्रतीक बना दिया था। वे भारतीय संस्कृति के अतीत और गौरव के संरक्षक थे| शान्तिनिकेतन के सांस्कृतिक उत्सव जैसे ‘बसंत उत्सव’,’शरद-उत्सव’,’माघोत्सव’’पौष मेला’इत्यादि प्रकृति की सर्वोच्चता एवं सांस्कृतिक धरोहर के परिचायक हैं|’विश्व-भारती’से पढ़कर निकले विद्यार्थियों ने अपने अपने क्षेत्रों में उत्कृष्टता के ऊंचे मानदंड स्थापित किये,उन विद्यार्थियों की ‘आउट ऑफ़ द बॉक्स थिंकिंग’ ने समाज,देश एवं विश्व को अपने-अपने क्षेत्र में उच्चतम आयामों से परिचित कराया|सत्यजीत रे,महाश्वेता देवी,गायत्री देवी,शिवानी,इंदिरा गांधी,खान अब्दुल गनी खान,अमृतलाल वेगड़,नोबल पुरस्कार विजेता अर्मत्य सेन एवं अनेकों अन्य पूर्व विद्यार्थियों ने शिक्षा के इस मंदिर को विश्व पटल पर मान दिलाया|  टैगोर की मृत्यु पर गाँधी जी ने कहा था – ‘हमने केवल एक विश्वकवि को नहीं बल्कि एक राष्ट्रवादी मानवता के पुजारी को खो दिया।’
आज भी गुरुदेव की यह कालजयी रचना उतनी ही सामयिक है जितनी उन्होंने जब इसे रचा था-
हो चित्त जहाँ भयशून्य,माथ हो उन्नत
हो ज्ञान जहाँ पर मुक्त,खुला यह जग हो
घर की दीवारें बने न कोई कारा
हो जहाँ सत्य ही स्त्रोत सभी शब्दों का
हो लगन ठीक से ही सब कुछ करने की
हो नहीं रूढ़ियाँ रचती कोई मरुस्थल
पाए न सूखने इस विवेक की धारा
हो सदा विचारों,कर्मों की गतो फलती
बातें हो सारी सोची और विचारी
हे पिता मुक्त वह स्वर्ग रचाओ हममें
बस उसी स्वर्ग में जागे देश हमारा !!
(प्रयाग शुक्ल द्वारा अनूदित)

Spread the love

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here