स्मृति शेष

निशिकांत मंडलोई

अनुराग का मतलब ही है, वह मनोवृत्ति जो किसी काम, चीज, बात या व्यक्ति को बहुत अच्छा, प्रशंसनीय तथा सुखद
समझकर सदा उसके साथ अपना घनिष्ठ संबंध बनाए रखना चाहती हो या उसके पास रहने की प्रेरणा देती है। यही बात मैंने अनुभव की शिव अनुराग पटैरिया में। बात 1983 की है जब मैं खंडवा में समाचार लेखन की शुरुआत कर रहा था। उन दिनों एक संस्था,, तरुणाई साहित्य मंच,, का मैं सचिव था। संस्था द्वारा मेधावी बच्चों का सम्मान किया जाना था और इसके लिए मुख्य अतिथि बतौर अभय छजलानी को आमंत्रित करने का तय किया, अभय जी से बात की। उन्होंने व्यस्तता की वजह से आने में असमर्थता जताते हुए उस समय नईदुनिया के संपादकीय विभाग के श्री शाहिद मिर्जा को अतिथि बनाने को कहा। हम राजी हुए। बात की। शाहिद भाई बोले मैं अकेले नहीं आऊंगा एक साथी रहेगा साथ। हम राजी हुए। कार्यक्रम के तय दिन की सुबह शाहिद भाई अपने साथी के साथ खंडवा पधार गए। टेलीफोन पर संदेश मिला हम बस स्टैंड आ गए हैं। जब उन्हें लेने पहुँचे तो साथ में साथी के रूप में शिव अनुराग पटैरिया को देख प्रसन्नता और अधिक बढ़ गई। वह इसलिए कि शिव अनुराग भाई से मेरी मुलाकात इससे भी पहले हो चुकी थी, छतरपुर की एक तिकड़ी के सदस्य के रूप में। इस तिकड़ी में अनुराग भाई के साथ श्री राजेश बादल व श्री विभूति शर्मा भी थे। उस समय इनकी पत्रकारिता से बौखलाए छतरपुर जिला प्रशासन की नाक में दम करने के कारण व अपनी जान को खतरा होने की वजह से अभयजी ने इन्हें नई दुनिया में स्थान दिया था। खंडवा से इंदौर जब भी आना होता तभी मुलाकात होती थी इस तिकड़ी से।
तो बस स्टैंड की खुशी दिन भर साथ रहने तक जारी रही लेकिन जब वापसी पर उन्हें टाटा किया तब यह नहीं पता था कि स इतने अंतराल के बाद शिव अनुराग जी हमें ही टाटा कह जाएंगे।
पत्रकारिता में लेखन का उनका अंदाज कभी उन्होंने अपने तक सीमित नहीं रखा और इसी कारण समय समय पर उनका मार्ग दर्शन भी मिला।
पत्रकारिता की तिकड़ी ने मुझे हमेशा बबली(घर का नाम ) नाम से ही संबोधित किया।

शिव अनुराग पटेरिया जनमुद्दों के लिए जूझने वाले पत्रकार थे। उन्होंने छतरपुर से आंचलिक पत्रकार के तौर पर 1978 में पत्रकारिता प्रारंभ कर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के संदर्भों पर लिखीं उनकी पुस्तकें बेहद मूल्यवान कृतियां हैं।  उनका जाना तमाम युवा पत्रकारों, पत्रकारिता जगत के लिए एक शून्य रच रहा है, जिसे भर पाना कठिन है।  पटेरिया ने अपनी पूरी जिंदगी पत्रकारिता, लेखन और सामाजिक सरोकारों के लिए समर्पित कर दी। अन्याय के विरुद्ध लड़ते हुए वे पत्रकारिता में आए और अपनी धार बनाए रखी। वे स्वभाव से मृदुभाषी थे, किंतु अपनी पत्रकारिता में उन्हें जो लिखना और कहना होता था वही करते थे।

व्यवस्था के खिलाफ बंदूक, मध्य प्रदेश की पत्रकारिता, बिन पानी सब सून, पत्रकारिता के युग निर्माता राजेंद्र माथुर, मध्यप्रदेश संदर्भ, छत्तीसगढ़ संदर्भ, मप्र की जल निधियां, मप्र की गौरवशाली जल परंपरा जैसी अनेक कृतियों के वे लेखक थे। उन्हें राजेंद्र माथुर सम्मान, मेदिनी पुरस्कार, डा.शंकरदयाल शर्मा अवार्ड जैसे सम्मानों से शिव अनुराग पटेरिया को अलंकृत किया गया था। पटेरिया न सिर्फ पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में बल्कि मध्य प्रदेश के सार्वजनिक जीवन में भी सार्थक हस्तक्षेप रखते थे। उनके मार्गदर्शन में पत्रकारों की एक लंबी पूरी पीढ़ी तैयार हुई।

जीवन में उनका प्रेम गोलियां दागने वाले हथियारों से तो था ही लेकिन उनका सबसे अधिक ताकतवर कलम हथियार था। उनकी कलम लेखनी वाकई पैनी थी।
इंदौर से भोपाल गए तब उनसे मिलना कम ही हुआ। महाराष्ट्र से प्रकाशित एक अखबार के लिए यहां सावेर रोड पर भूमि लेने के सिलसिले में जब वे इंदौर आए तब ही मुलाकात हुई। उसके बाद फोन पर ही बातचीत होती थी। उन्होंने छतरपुर , इंदौर व भोपाल अपनी कर्म यात्रा का अंतिम पड़ाव इंदौर ही चुना और आज सुबह वो खबर आई जिसने उनके महाप्रयाण का संदेश था। जो यह कह रहा था कि शिव अब शिवत्व में लीन हो गए।
उनका जाना पत्रकारिता जगत में अपूरणीय है। परमसत्ता उन्हें अपने श्री चरणों मे स्थान दे। परिवार पर आई इस विपदा को सहन करने का हौसला परिजनों को ईश्वर प्रदान करे।

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