‘डाउन टू अर्थ’ की पहल पर दिल्ली के इंडिया हैबिटाट सेंटर में भोपाल गैस हादसे की ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों की एक नुमाइश रखी थी। यह दिसंबर के पहले हफ्ते में हादसे की बरसी का मौका था। साल 2014। जानी-मानी पर्यावरण कार्यकर्ता सुनीता नारायण का फोन आया। वे चाहती थीं कि उस शाम की एक सभा में मैं भी दो शब्द कहूं। मेरे अलावा प्रसिद्ध पत्रकार राजकुमार केसवानी और पीड़ितों की पैरवी करने वालीं सुप्रीम कोर्ट की वकील इंदिरा जयसिंह भी बोले। श्रोताओं में दिल्ली की कई महत्वपूर्ण हस्तियां थीं।
मैंने कहा कि भोपाल गैस त्रासदी पर अगर मीडिया से किसी को भी बोलने का अधिकार है तो वह एकमात्र राजकुमार केसवानी ही हैं, जिन्होंने एमआईसी गैस की गंध हादसे के पहले ही भोपाल की हवाओं में सूंघ ली थी। भोपाल ज्वालामुखी के मुहाने पर है, यह ऐलान भोपाल की इसी विलक्षण विभूति ने किया था। जबकि तब न एनडीटीवी था, न स्टार न्यूज और दैनिक भास्कर में वे भी वे बहुत बाद में आए। सीमित साधनों वाले एक छोटे से अल्पज्ञात अखबार का पत्रकार और कर हीक्या सकता था?
उस महत्वपूर्ण सभा में मुझे सिर्फ इसलिए बुला लिया गया था कि चार साल पहले भोपाल गैस हादसे पर 2010 मंे मेरी एक किताब ‘आधी रात का सच’ छपकर आई थी। मैंने स्वीकार किया कि जब गैस रिसी तब मैं भोपाल से काफी दूर अपने गांव के स्कूल में पढ़ता था। मेरे खानदान में दूर-दूर तक किसी को गैस नहीं लगी। मेरा कोई संबंध भोपाल, गैस या हादसे से नहीं है। 2009 में हादसे के 25 साल हुए थे तब मैं दैनिक भास्कर में था और एक संग्रहणीय दस्तावेज की योजना बनी थी। यह काम भी राजकुमार केसवानी की देखरेख में हुआ जबकि तब वे भास्कर में नहीं थे। उनका कॉलम ‘आपस की बात’ लोकप्रिय था।
दस्तावेज की टीम का हिस्सा बनने के बाद मैंने पहली बार यूनियन कार्बाइड के इलाके और पीड़ितों के घरों में घूमकर हादसे के जीवाष्म देखे थे। करीब दो हफ्ते के दौरान पहली ही बार मैंने उस त्रासदी के प्रभावितों को इतने निकट से देखा। अब्दुल जब्बार ने मुझे बहुत लोगों से मिलवाया, जो भोपाल के उस नर्क में अब तक तिल-ितल करके जी रहे थे। जैसे कानपुर की साजिदा बानो, जिसका शौहर अशरफ इसी गैस के कारण 1981 में ही अल्लाह को प्यारा हो गया था। वह कार्बाइड में फिटर था। हादसे की रात वह पीहर से लौटी थी। प्लेटफार्म की भगदड़ में अपने एक बेटे को गंवा बैठी। और दोनों आंखों से अंधी गजाला, जिसने हादसे के ठीक पहले ईद के दिन कश्मीरी लिबास में एक तस्वीर खिंचवाई थी। गैस ने उसकी आंखें छीन ली थीं। ऐेसे अनगिनत किरदार।
इस शहर में 15 हजार लाशें गिरी थीं। जिन लोगों को कोरोना काल में बंगाल की चुनावी सभाएं चुभीं, उन्हें यह कोई याद दिलाने वाला नहीं है कि जब भोपाल की गलियों में इंसानों, जानवरों और परिंदों की लाशें कचरे की तरह बिखरी थीं तब एक प्रधानमंत्री और एक मुख्यमंत्री पास के एक शहर की चुनावी सभा के मंच पर वोट मांग रहे थे। निर्मम राजनीति की तरह नाकाम नौकरशाही का मौसम तब भी उतना ही हरा-भरा था।
दस्तावेज के छपने के छह महीने बाद ही जून 2010 में भोपाल की सीजेएम कोर्ट का पहला फैसला आया। एक बार फिर देश में गैस हादसे की चर्चा छिड़ गई। किसी गुनहगार को एक दिन की भी सजा नहीं हुई। वे बड़ी तसल्ली से सिगरेट सुलगाते हुए अदालत की सीढ़ियों से रात के डिनर का प्लान करते हुए उतर रहे थे। सबसे बड़े गुनहगार वॉरेन एंडरसन को बाइज्जत एयरपोर्ट छोड़ने के लिए जिले के दो सबसे बड़े अफसर ड्राइवर और चपरासी की भूमिका में लगे थे। और फिर धाराओं के बदलाव की अगली कड़ियों में चीफ जस्टिस अहमदी के इंसाफ और अस्पताल में उनकी ताजपोशी के किस्से। ये किस्से सिर्फ कॉफी हाउस की गपशप या घर आए किसी पत्रकार के साथ लजीज लंच में दोहराने के लिए नहीं होने चाहिए।
गैस हादसे पर कुछ भी कहने और लिखने का पहला हक राजकुमार केसवानी को इसलिए था कि हादसे के पहले से वे यूनियन कार्बाइड की कुंडली और उसके विनाशकारी ग्रहों की गणना करने वाले इकलौते पत्रकार पंडित थे। अखबार की नौकरी करते हुए जब 2010 में मैं अपनी किताब पर काम कर रहा था तब मैंने भोपाल से दिल्ली तक गैस हादसे पर तब तक प्रकाशित सारी किताबें खरीदने की कोशिश की तो यह जानकर हिल गया कि कुछ भी खास उपलब्ध नहीं है। डोमनिक लापिएर और जेवियर मोरो की ‘इट वाज फाइव पास्ट मिडनाइट’ और दो-ढाई सौ पेज में मोती सिंह का एक सरकारी प्रेस नोट। बस।
ऐसा कैसे हो सकता था? भोपाल निरक्षरों का शहर नहीं था। ऐसा भी नहीं है कि जब गैस रिसी तब भाषा और लिपि के आविष्कार नहीं हुए थे। यह राजधानी थी, जहां ग्रंथ और साहित्य अकादमियां थीं, विश्वविद्यालय थे, अखबार और पत्रिकाएं थीं। संगठन, सामाजिक कार्यकर्ता, कवि और लेखक थे। संसार की सबसे बड़ी मानव निर्मित त्रासदी पर अनगिनत विषयों और एंगल से अनगिनत किताबें उपलब्ध होनी चाहिए थीं। मेडिकल और लीगल एंगल से, डायरी की शक्ल में, आपबीतियां, सियासी कोण से और बेशक कविता, कहानी और उपन्यास भी। सरकार ने एक गैस राहत विभाग बना दिया, अखबारों ने एक बीट बना दी और अपने सबसे जूनियर रिपोर्टरों को अब्दुल जब्बार, बालकृष्ण नामदेव या रचना ढींगरा के प्रेस नोट लाने भेज दिया। वो भी साल में एक दिन!
मैं मानता हूं सबसे पहली और सबसे कीमती किताब सिर्फ राजकुमार केसवानी ही लिख सकते थे। बल्कि उन्हें तो किताबों की एक श्रृंखला ही लिखनी चाहिए थी। यह ऐसा कठिन, उर्वर और अंतहीन विषय था कि केसवानी को सौ साल की उम्र भी कम पड़ती। इसी विषय ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित किया था। वह भी उनके अल्पज्ञात अखबार में छपी रिपोर्ट के कारण। बड़े टीवी चैनलों और अखबारों में ऊंचे पदों पर वे रहे, जहां लिखने के लिए हर संभव साधन उन्हें उपलब्ध थे। वे हिंदी, अंग्रेजी और ऊर्दू के जानकार थे। क्षेत्रीय पत्रकारिता में ऐसा बहुभाषा ज्ञान दुर्लभ है। उनकी अभिव्यक्ति में गहरी संवेदना थी। वे जमकर रिसर्च करते थे। लेकिन उन्हांेने अपनी प्रतिभा सिनेमाई विषयों में खर्च की। उन्होंने किताब तो लिखी लेकिन सिनेमा के परदे की एक ऐसी कहानी पर जिसकी ऐतिहासिकता ही संदिग्ध है। फिल्म ‘मुगले-आजम’ के बनने की दास्तान। असल दस्तावेज देखें तो मुगलों का चमकदार प्रशासन इरफान हबीबों के शातिर ख्यालों में चमकी रोशनी भर है।
‘आधी रात का सच’ नाम की अपनी अधकचरी किताब के आखिर में मैंने मध्यप्रदेश के लेखकों और पत्रकारों से नामजद शिकायत की है। बहुत इज्जत के साथ सबसे पहले राजकुमार केसवानी का ही उल्लेख किया। हमारी पीढ़ी के पत्रकार केसवानी साहब की पीढ़ी के संपादकों और पत्रकारों को पढ़ते हुए ही बड़े हुए और अपने करिअर में आगे बढ़े।
एक शिष्य और पाठक को यह अधिकार है कि वह अपने गुरू या मार्गदर्शक से प्रश्न करे, समस्या रखे, शिकायत करे और वह भी खुलकर। जहां 15 हजार लाशें गिरी हों और लाखों लोग जिंदा लाशों में पीछे छूट गए हों तब आप बरसों पहले लिखी रिपोर्ट भर से संतुष्ट कैसे हो सकते हैं? दिल्ली के आयोजन में हुई मुलाकात में मैंने यही पूछा था। एक ही सवाल था कि आपको हादसे की पीड़ा किताब में उतारनी ही थी। यह काम आप ही सबसे बेहतर कर सकते थे। उत्तर में वे बस मुस्कुरा दिए थे!
आज जब कोरोना ने हमारे बीच की उस विलक्षण हस्ती को हमसे छीन लिया है तो मुझे उनका वही मुस्कुराता हुआ चेहरा याद आ रहा है!
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