“विश्व पर्यावरण” दिवस पर प्रख्यात पर्यावरणविद एवम दि नेचर वालेंटीयर्स के अध्यक्ष

पद्म्श्री भालू मोंढे से विजय रांगणेकर की विशेष बातचीत:-

भारत में पर्यावरण संरक्षण का इतिहास बहुत पुराना है। हडप्पा संस्कृति पर्यावरण से ओत-प्रोत थी, तो वैदिक संस्कृति पर्यावरण-संरक्षण हेतु पर्याय बनी रही। भारतीय मनीषियों ने समूची प्रकृति ही क्या, सभी प्राकृतिक शक्तियों को देवता स्वरूप माना। ऊर्जा के स्त्रोत सूर्य को देवता माना। भारतीय संस्कृति में जल को भी देवता माना गया है। नदियों को तो जीवनदायिनी कहा गया है। भारतीय संस्कृति में केला, पीपल, तुलसी, बरगद, आम आदि वृक्षों की पूजा की जाती रही है। फिर भी हम प्रत्येक वर्ष 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाते हैं।
विश्व पर्यावरण दिवस क्यों मनाया जाता है?
संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित यह दिवस पर्यावरण के प्रति वैश्विक स्तर पर जागरूकता लाने के लिए मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 1972 के संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन से हुई। 5 जून 1973 को पहला विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया।
पर्यावरण का हमारे जीवन में क्या महत्व है?
पर्यावरण का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। ये हरे-भरे पेड़-पौधे हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं। प्रकृति के बिना मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। और जीवन समाप्त होने पर वह इन्हीं में विलीन हो जाता है।
बढते औद्योगिकरण, शहरीकरण तथा जनसंख्या वृद्धि से पर्यावरण की गुणवत्ता में निरंतर कमी आती गई। इस परिप्रेक्ष्य में सरकार ने क्या कदम उठाए है?
पर्यावरण की गुणवत्ता की इस कमी में प्रभावी नियंत्रण व प्रदूषण के परिप्रेक्ष्य में सरकार ने समय-समय पर अनेक कानून व नियम बनाए। इनमें से अधिकांश का मुख्य उद्देश्य जल, वायु, ध्वनि, वन, वन्यजीव, प्राकृतिक सम्पदा, जैव विविधता और प्रदूषण नियंत्रण व निवारण था।
पर्यावरण संरक्षण में आम जनता की क्या भूमिका होनी चाहिए?
हम समझते हैं कि यह काम सरकार का है, वही करेगी। दुर्भाग्य से कुछ लोग मानते हैं कि केवल सरकार और बड़ी कंपनियों को ही पर्यावरण संरक्षण के लिए कुछ करना चाहिए परंतु ऐसा नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति अगर अपनी जिम्मेदारी समझे तो पर्यावरण संरक्षण में अपनी भागीदारी दे सकता है। सरकार जितने भी नियम-कानून लागू करें उसके साथ जनता की जागरूकता से ही पर्यावरण की रक्षा संभव हो सकेगी। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति प्रति वर्ष यादगार अवसरों जैसे जन्मदिन, विवाह की वर्षगांठ पर अपने घर, सार्वजनिक उद्यान, धार्मिक स्थल पर फलदार अथवा औषधीय पौधा-रोपण करें, जहां उसकी देखभाल हो सके। बचे हुए प्राकृतिक जंगलों को उनकी सीमा पर कंटीले तारों की बागड़ से बंद किया जा सकता है। पेड़ों के छोटे से छोटे झुरमुट को भी इसी तरह बचाया जा सकता है। क्योंकि प्राकृतिक जंगलों का कोई विकल्प नहीं होता। वृक्ष गणना अभियान चलाया जा सकता है। वृक्षों के तनों पर फ्लोरसेंट रंगों में अंकों की पट्टियां लगाई जा सकती हैं ताकि पता चल सके कि कहां कितने और किस प्रजाति के वृक्ष मौजूद हैं।
राष्ट्रीय पर्यावरण नीति का मुख्य उद्देश्य क्या है?
पर्यावर्णीय संसाधनों पर सभी के विशेषकर गरीबों के समान अधिकारों को सुनिश्चित करना। संसाधनों का न्यायोचित उपयोग सुनिश्चित करना ताकि वे वतर्मान के साथ-साथ भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं की भी पूर्ति कर सकें आर्थिक तथा सामाजिक नीतियों के निर्माण में पर्यावर्णीय संदर्भ को ध्यान में रखना और संसाधनों के प्रबंधन में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व तथा भागीदारिता के मूल्यों को शामिल करना
लॉकडाउन का पर्यावरण पर आप क्या सकारात्मक प्रभाव आप देखते हैं?

लॉकडाउन के कारण पर्यावरण में आया सकारात्मक बदलाव और प्रदूषण का स्तर कम होना हमें एक सकारात्मक संदेश दे रहा है। हमें यह समझना होगा कि प्रदूषण कम होने पर ही पृथ्वी बच पाएगी, जब पृथ्वी बचेगी, तभी जीवन बचेगा।

क्या इससे प्रकृति खासकर पेड़-पौधे और वन्य जीवन पर भी कुछ अच्छा असर हुआ है?

इन दिनों में पर्यावरण में 55 प्रतिशत शुद्धता आई है। पिछले 40 वर्षों में ऐसी स्थिति कभी नहीं देखी गई थी। नदियों में निर्मल जल का प्रवाह हो रहा है वहीं कुआं और तालाब में भरपूर पानी दिख रहा है. पेड़ पौधे जीव जंतु पशु पक्षीयो के पुराने दिन लौट आए हैं। तोता, मैना, कोयल, गिलहरी, कौआ, गौरेया और कई प्रकार के तितलियां अब विचरण करते देखे जा रहे हैं। पेड़ पौधे के पत्तों में गजब की चमचमाती हरी- हरी हरियाली देखने को मिल रही है जो पर्यावरण को विशुद्ध करने में सहायक साबित हो रही है।

लॉकडाउन से पर्यावरण को हुये लाभ को बरकरार रखने के लिये क्या किया जाना चहिये?
एक अनुमान के अनुसार देश की करीब 30 प्रतिशत आबादी को अपना कामकाज निपटाने के लिए सिर्फ इसलिए सड़क पर इधर से उधर दौड़ाना पड़ता हैं क्योंकि उसके पास तकनीकी ज्ञान काफी कम है या नहीं है। यही वजह है जहां कई विकसित और विकाशसील देशों में जो काम लोग घरों में बैठे-बैठे ऑनलाइन निपटा देते हैं, उसी काम को करने के लिए आम भारतीय को सरकारी आफिसों, बैंकों, मेडिकल स्टोर्स, फल-सब्जी और राशन की दुकानों, रेल्वे स्टेशन, बिजली व टेलीफोन बिल जमा करना आदि के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं।

लाक डाउन समाप्त होने के बाद क्या चुनौतिया होंगी?

इस बात पर गंभीरता से मंथन करना होगा कि ऐसे कौन-कौन से उपाय किए जाएं जिससे अपनी दिनचर्या या आजीविका के लिए लोगों को कम से कम सड़क पर आना पड़े। “वर्क फ्राम होम” की संसकृति को बढाना होगा. कोरोना के कारण मास्क, ग्लव्स, किट का उपयोग काफी बढ़ा है। उसके वेस्ट के निपटान की भी समुचित व्यवस्था करना होगी. विश्व के लिए पर्यावरण और विकास के संतुलन के महत्व को समझने और उस पर उचित और गंभीर निर्णय लेने का यही सही वक्त है.

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