डॉ. नवीन जोशी

भोपाल।यदि आरोपी को न्यायालय से जमानत मिलने पर पीडि़त पक्ष और गवाहों को जान का खतरा हो सकता है तो ऐसे आरोपी की लोक अभियोजक जमानत न होने दें। ये ताजा निर्देश राज्य के गृह विभाग के अंतर्गत आने वाले लोक अभियोजन संचालनालय ने प्रदेश के जिलों में पदस्थ सभी लोक अभियोजन अधिकारियों को भेजे हैं।
संचालक लोक अभियोजन ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा आपराधिक अपील क्रमांक 448/2021 सुधा सिंह विरुध्द उप्र राज्य में पारित निर्णय का हवाला भी दिया है। यह आदतन अपराधियों के संबंध में है जिसमें कहा गया है कि न्यायालय को देखना चाहिये कि आरोपी को जमानत देने से कहीं पीडि़त पक्ष और गवाहों की जान एवं स्वतंत्रता का खतरा तो नहीं है।
संचालक ने कहा है कि लोक अभियोजक ऐसे मामलों के न्यायालय में जमानत की कार्यवाही के विचारण के मामले सुप्रीम कोर्ट की उक्त विधि व्यवस्था की ओर ध्यान आकर्षित करायें।

ट्रायल के पहले आरोपी का पक्ष रखने का कानून बने….आपराधिक मामलों में आरोपी चार्ज फ्रेम होने के बाद पन्द्रह दिन के अंदर अपना पक्ष रखे कि वह क्यों दोषी नहीं है, इस अवधि में पन्द्रह दिन की ओर वृध्दि करने का भी कानून में प्रावधान हो। यह नवीन सिफारिश राज्य विधि आयोग ने अपनी आठवीं एवं अंतिम रिपोर्ट में राज्य सरकार से की है। इस रिपोर्ट को देने के साथ ही आयोग का तीन वर्षीय कार्यकाल खत्म हो गया है।
आयोग ने अपनी आठवीं रिपोर्ट क्रिमिनल प्रोसेस : नीड टु इनेक्ट फॉरमल लॉ फॉर डिफेन्स डिस्क्लोजर शीर्षक से दी है। इसमें बताया गया है कि अमेरिका, इंग्लैण्ड और आस्ट्रेलिया में ऐसा प्रावधान है कि चार्ज फ्रेम होने के बाद आरोपी से उसका पक्ष जाना जाये। दरअसल भारतवर्ष की न्याय प्रणाली में आरोपी पर अभियोजन का भार नहीं डाला जाता है और पीडि़त पक्ष को ही आरोप सिध्द करने पड़ते हैं। आरोपी को न्यायालय में विचारण के पूर्व आरोपों के संबंध में पूर्ण सभी दस्तावेज प्रदान कर दिये जाते हैं। विचारण के दौरान आरोपी कभी भी अपने पक्ष में नई-नई बातें कहता रहता है। इसीलिये आयोग ने सिफारिश की है कि आरोपी से भी चार्ज फ्रेम होने के बाद उसका पक्ष आना चाहिये। यह पक्ष चाहे उसे दोषी न ठहराने के संबंध में हो या अन्य किसी विषय में। पक्ष के साथ आरोपी को वे साक्ष्य भी डिस्क्लोज करने होंगे जिन्हें वह प्रस्तुत करना चाहता है। इसमें दस्तावेज एवं गवाह दोनों शामिल होंगे। इसके लिये आयोग ने कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर 1973 में धारा 224-ए, 224-बी, 224-सी एवं 224-डी जोडऩे की सिफारिश की है।
नहीं दी है एक्शन टेकन रिपोर्ट :
राज्य विधि आयोग ने अपने तीन साल के कार्यकाल में कुल आठ रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत की हैं। परन्तु इन पर क्या-क्या कार्यवाही की गई है,यह राज्य सरकार ने उसे किसी एक्शन टेकन रिपोर्ट के साथ नहीं बताया है। यही नहीं, आयोग ने करीब 1500 पुराने एवं अनुपयोगी कानूनी प्रावधानों को खत्म करने के लिये भी कहा हुआ है जिन पर अभी तक एक को भी खत्म नहीं किया गया है। जबकि केंद्र की मोदी सरकार अब तक 4 हजार कानूनी प्रावधानों को अप्रासंगिक एवं अनुपयोगी होने के कारण खत्म कर चुकी है।
आयोग ने बताया कि आपराधिक मामलों में न्यायालय सत्य का शीघ्रता से पता चला सके एवं जल्द निर्णय दे सके, इसके लिये आठवीं एवं अंतिम रिपोर्ट में सिफारिश की गई है। आरोपी से भी चार्ज फ्रेम होने के बाद उसका पक्ष लिया जाना चाहिये।

कोरोना संक्रमितों को मेडिकल कालेज में मिल सकेगी डायलिसिस की सुविधा

भोपाल।कोरोना संक्रमितों को मेडिकल कालेजों में डायलिसिस की सुविधा मिल सकेगी। इस संबंध में स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव मोहम्मद सुलेमान ने सभी मेडिकल कालेजों के डीनों, जिलों के सीएमएचओ एवं सिविल सर्जनों को निर्देश जारी किये हैं।
निर्देश में कहा गया है कि यदि किसी कोविड-19 संक्रमित रोगी को डायलिसिस की आवश्यक्ता है तो ऐसे व्यक्ति को आईसीएमआर द्वारा जारी गाईडलाईन अनुसार हाई रिस्क श्रेणी में सम्मिलित किया जाये। ऐसे मरीज को मेडिकल कालेज में ही उपचारित किया जाना होता है, इसलिये मेडिकल कालेज के अस्पताल में ही डायलिसिस प्रदाय किया जाये। इस संबंध में मेडिकल कालेज के अस्पताल में एक डायलिसिस मशीन कोविड-19 संक्रमित रोगी हेतु चिन्हांकित की जाये। ऐसे रोगियों को इसकी पूर्व सूचना भी जारी की जाये।

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