@ राकेश अचल

हिन्दुस्तान में महिलाएं कहीं भी चूड़ियाँ क्या चूड़ी वाले की जाति पूछकर पहनती हैं ? शायद न पहनती हों लेकिन मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में चूड़ी पहिनने वाली महिलायें तो नहीं हाँ पुरुष जरूर चूड़ी वाले की जाति पूछते हैं और यदि भूल से भी अल्पसंख्यक निकला आये तो उसका न सिर्फ कचूमर बना देते हैं बल्कि मध्यप्रदेश की पुलिस भी चूड़ी वाले को पास्को क़ानून की दर्जनों धाराओं में बाँध देती है .
मामला बहुत छोटा होकर भी बहुत बड़ा हो गया है.मामला जाति का है .इंदौर में चूड़ी बेचने वाले से उसकी जाति पूछी गयी.पूरे भारत में चूड़ी पहनने वाली महिलायें जानतीं है कि कांच की चूड़ियाँ उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में बनती हैं और उन्हें मुसलमान कारीगर बनाते हैं. चूड़ियाँ बेचने वाले भी अक्सर मुसलमान ही होते हैं,हिन्दू भी ये व्यवसाय करते हैं. हिंदी पट्टी में चूड़ी बेचने वालों को ‘मनिहार’ कहते हैं .चूड़ी पहनने वाली महिलाएं हों या लडकियां सबको पता है कि चूड़ी पहनाना भी एक कला है. हर कोई आसानी से चूड़ी नहीं पहन सकता,लेकिन मनिहार[चाहे पुरुष हो या महिला ] कड़ी से कड़ी हथेली को मोड़-मोड़कर चूड़ी पहनाने में माहिर होते हैं .
इंदौर के बाणगंगा थाना क्षेत्र के गोविंदपुरा में तस्लीम नाम का एक युवक महिलाओं को चूड़ी पहना रहा होता है,लेकिन किसी महिला या लड़की ने उससे उसकी जाति नहीं पूछी.चूड़ी वाले की जाति की फ़िक्र कुछ भगवाधारी युवकों को हुई.उन्होंने तस्लीम से उसकी जाति पूछी और फिर पिल पड़े उसके ऊपर.उसकी जमकर मरम्मत की,चूड़ियां तोड़ दी, मोबाइल और नगदी छीन ली .और जब मन नहीं भरा तो तस्लीम को पुलिस के हवाले कर दिया .
.हरदोई जिले के तस्लीम को ख्वाब में भी इस बात का इल्म नहीं था कि सफाई में देश में नंबर एक रहने वाले इंदौर शहर के लोग इतने नाजुक हैं कि सिर्फ जाती की वजह से वे अपनी महलाओं को मुसलमानों के हाथ से चूड़ी पहनाने को अपराध मानते हैं .पुलिस ने पहले तो तस्लीम के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की लेकिन जब रात होते-होते तक तस्लीम की बेरहमी से पिटाई का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया तो पुलिस अचानक नींद से जागी.पुलिस को स्थानीय भाजपा नेताओं और मंत्रियों ने नींद से जगाया .
पुलिस ने आनन-फानन में लुटे-पिटे तस्लीम के खिलाफ पास्को क़ानून की 14 धाराओं के तहत एक मजबूत आपराधिक मामला दर्ज किया .कार्रवाई एकतरफा न दिखे इसलिए तस्लीम को पीटने वालों और थाने पर प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ मामला दर्ज कर कुछ गिरफ्तारियां भी कर डालीं ..मामला तूल पकड़ता देख प्रदेश के गृहमंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा ने सफाई दी कि तस्लीम ने अपनी जाति छिपाई,उसके पास दो आधार कार्ड मिले इसलिए उसे भीड़ ने पीटा .अरे भाई तस्लीम पहला सवाल ये कि क्या मध्य्प्रदेश में चूड़ियां पहनाने से पहले जाति बताना और आधार कार्ड दिखने का क़ानून है,और चलिए मान लीजिये की तस्लीम ने आधार कार्ड के मामले में जालसाजी की तो उसके खिलाफ जालसाजी के बजाय पास्को क़ानून के तहत मुकदमा क्यों दर्ज किया गया ?
तस्लीम की पिटाई के मामले में अनेक अद्भुद संयोग हैं.उसे पीटने और जाति पूछने वाले भगवाधारी हैं.पुलिस को वो नाबालिग फरियादिया भी मिल गयी जिसके साथ कथित तौर पर तस्लीम ने छेड़खानी की. कोई बताये कि रोजी-रोटी कमाने वाला कोई अपने ही ग्राहक के साथ छेड़खानी क्यों करेगा ? तस्लीम के मामले को लेकर सरकार को अचानक क्यों लगा कि ये पूरा मामला प्रदेश का साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की एक कथित साजिश है.पुलिस को थाने पर प्रदर्शन भी इसी साजिश का हिस्सा लगता है. इंदौर के पास उज्जैन में भी ऐसा ही एक मामला दर्ज किया जाता है .
इंदौर प्रदेश का अकेला ऐसा शहर है जहां के सफाई पसंद लोग कभी भी किसी को भी धुन सकते हैं,फिर वो चाहे चूड़ी वाला हो या सब्जी वाला .इंदौर और मष्यप्र्देश का साम्प्रदायिक सौहार्द कांच की चूड़ियों से भी नाजुक जान पड़ता है .इंदौर के इस मामले में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग भी सक्रिय हो गया है .अब सवाल यही है कि क्या मध्यप्रदेश में कोई भी कारोबार करने से पहले अपनी जाति बताना अनिवार्य कर दिया गया है,यदि तस्लीम का नाम मुन्ना या पप्पू होगा तो उसे जाति छिपाना माना जाएगा ?
मध्यप्रदेश में साम्प्रदायिक सौहार्द को फिलहाल कोई खतरा है नहीं लेकिन सरकार की लगातार नाकामियां जरूर इस तरह का हौवा खड़ाकर जनता का ध्यान बांटने की कोशिश कर सकती हैं. इस घटना को लेकर शुरू हुई सियासत के बारे में अभी कुछ कहना उचित नहीं है. जनता को खुद सारे घटनाक्रम पर नजर रखते हुए ये तय करना होगा कि क्या वाकई मध्यप्रदेश का साम्प्रदायिक सौहार्द कांच की चूड़ियों से भी ज्यादा कमजोर है जो ज़रा से झटके में टूट सकता है ?
मध्यप्रदेश की इस वारदात के बाद एक बार फिर लखनऊ के मुनव्वर राणा याद आते हैं जिन्होंने कुछ ही दिन पहले कहा था कि तालिबान हमारे यहां भी हैं .हो सकता है कि आप चूड़ी वाले की पिटाई करने वालों को तालिबानी मानसिकता वाला न मानें ,लेकिन विश्लेषण जरूर करें ,क्योंकि ये जरूरी है .बिना इसके ये खेल चलता ही रहेगा .
(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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