राजेश बादल 

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की चिंता जायज है। सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर जानकारियों से छेड़छाड़ की बाढ़ है। फर्जी खबरें भी नहीं रुक रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन तक ने इसे कोविड के दरम्यान इनफोडेमिक कहा है। ऐसे में निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता वक्त की आवश्यकता है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने दो दिन पहले नागरिकों के सत्ता से सच बोलने के अधिकार पर अपने व्याख्यान में इस बात पर जोर दिया है कि राष्ट्र को ऐसी पत्रकारिता चाहिए, जो एकदम स्वतंत्र और निष्पक्ष जानकारियां दे सके। मौजूदा दौर में निश्चित ही इस राय का स्वागत किया जाना चाहिए।

दरअसल भ्रामक और फर्जी समाचारों का निजी इस्तेमाल कम और सियासी दुरुपयोग अधिक होता है। पत्रकारिता के अनेक आधुनिक रूप चुनाव के दौरान और बाद में लोक धारणा बनाने में एक कारगर हथियार की तरह काम आते हैं। राजनीतिक दल आपसी होड़ के चलते एक दूसरे के शिखरपुरुषों के बारे में निंदनीय और गलत सूचनाएं फैलाते हैं। पुरखों की चरित्र हत्या करते हैं। यह अब छिपी हुई बात नहीं है। ऐसा करके वे एक अपराध भी करते हैं। वे उन शिखर पुरुषों के जमाने के ऐतिहासिक और प्रामाणिक तथ्यों- आंकड़ों को भी झूठा साबित करते हैं। सोशल मीडिया के इन अवतारों का उपयोग करने वाला आम आदमी इतिहास में कोई शोध उपाधि प्राप्त नहीं होता। समाज के आम वर्गों को तो छोड़ दीजिए, पढ़े लिखे डॉक्टरों, वकीलों, शिक्षकों, बैंकरों, इंजीनियरों और प्रशासनिक तथा पुलिस अफसरों की पढ़ाई अपने अपने संकायों में होती है इसलिए भारतीय इतिहास की दस्तावेजी जानकारी उन्हें नहीं होती। जब यह फेक या फर्जी समाचार उन तक पहुंचता है तो बहुधा वे भरोसा भी कर लेते हैं। उनके कामकाज और व्यवहार में भी गलत सूचनाओं के आधार पर बदलाव आता है।झूठ का यह विस्तार यकीनन जुर्म है और माननीय न्यायालय सुओ मोटो इस पर कार्रवाई करेगा तो आम जनता को राहत मिलेगी। यह बात सर्वोच्च अदालत भी जानती है कि भारत का एक आदमी निजी तौर पर झूठ और पाखण्ड से लड़ने में उदासीन है। सोसाइटी में आया यह परिवर्तन सामाजिक ढांचे की सेहत के लिए शुभ संकेत नहीं है। ऐसे में न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ का सच के साथ जुड़ने पर जोर देना सामयिक जरूरत भी है।

महात्मा गांधी अपने को पूर्णकालिक पत्रकार मानते थे। वे हिन्दुस्तान के सबसे बड़े संप्रेषण पुरूष थे। करीब आधी सदी तक उन्होंने जिम्मेदारी भरी और सरोकारों वाली पत्रकारिता की। वे हमेशा समाचारों के जरिए सच से संवाद पर बल देते रहे। उनके सत्याग्रह की सबसे बड़ी ताकत यही थी। सच सिर चढ़कर बोलता है और झूठ के पांव नहीं होते। इसलिए गांधी की सच वाली पत्रकारिता ही आज की आवश्यकता है। झूठ और फर्जी खबरें अपने आप गायब हो जाएंगीं। इस हकीकत को समझ लिया तो आने वाली चुनौतियों और नकली समाचारों से मुकाबला करना आसान हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

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