नई दिल्ली. इंडिया डेटलाइन. भारतविरोधी और हिंदू विरोधी बुद्धिजीवी हिंदुत्व को समाप्त करने के नारे के साथ अमेरिका में शुक्रवार से एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन कर रहे हैं। लगभग पचास विश्वविद्यालयों द्वारा आयोजित किए जा रहे सम्मेलन की मंशा साफ है और हिंदू विचार वाले लोगों ने वैश्विक स्तर पर इसका विरोध किया है। जिसके कारण कई वक्ताओं ने इससे किनारा कर लिया है। यह हैरत की बात है कि जब दुनिया भर में धर्म के नाम पर हिंसा और आतंकवाद चल रहा है, तब उनसे ध्यान हटाकर सदियों से शांति के पैरोकार धर्म को खत्म करने पर विचार करने बुद्धिजीवी जुट रहे हैं।

यह सम्मेलन तब हो रहा है जब अमेरिका के शिकागो में स्वामी विवेकानंद के उस विश्वप्रसिद्ध भाषण की 128 वीं वर्षगांठ(11 सितंबर) मनाई जाएगी, जिसमें उन्होंने हिंदू को सभी धर्मों से श्रेष्ठ साबित किया था।  “वैश्विक हिंदुत्व को खत्म करना: बहुआयामी परिप्रेक्ष्य”विषय पर यह सम्मेलन 10 से 12 सितंबर तक आयोजित किया जा रहा है।  इसके खिलाफ दुनिया भर से आवाज उठ रही है। सोश्यल मीडिया पर लोग अपनी बात रख रहे हैं दिल्ली  में छुटपुट प्रदर्शन हुए हैं। इधर,  आयोजकों ने बयान जारी किया कि वक्ताओं को भारत और अमेरिका दोनों में विभिन्न हिंदू समूहों से धमकियां मिल रही थीं, जिसके कारण उन्होंने हाल तक कई वक्ताओं के नाम का खुलासा नहीं किया। द गार्डियन ने लिखा-‘अमेरिका में हिंदू राष्ट्रवाद को संबोधित करने वाले एक अकादमिक सम्मेलन को दक्षिणपंथी हिंदू समूहों द्वारा लक्षित किया जा रहा है, जिन्होंने प्रतिभागियों को मौत की धमकी दी है और कई विद्वानों को वापस लेने के लिए मजबूर किया है।’

डिसमैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व नामक सम्मेलन को हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड, प्रिंसटन, कोलंबिया, बर्कले, शिकागो विश्वविद्यालय, पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय और रटगर्स सहित 53 से अधिक विश्वविद्यालयों द्वारा सह-प्रायोजित किया गया है। हालांकि बाद में कुछ विश्वविद्यालयों ने अपने को इससे अलग कर लिया यार्क और हावर्ड ने इस बारे में स्पष्टीकरण दिया है।

अमेरिका विद्वान ने कहा-विरोध करें

एक अमेरिकी विद्वान डेविड फ्राले मानते हैं कि यह हिंदुत्व की अन्तर्निहित व उभरती शक्ति के खिलाफ साजिश है और इसका विरोध करने हिंदूु जागरण का प्रतीक है। उन्होंने ‘फर्स्ट पोस्ट’ में लिखा है कि डीजीएच सम्मेलन को बेनकाब करने और उसका विरोध करने का प्रयास हिंदू जागरण का उदाहरण है। हमें इसके पीछे काम कर रहे व्यक्तियों और समूहों का सम्मान और समर्थन करना चाहिए, विशेष रूप से हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (एचएएफ) जिसने हिंदू प्रतिक्रिया में एक मार्गदर्शक भूमिका निभाई है। वैश्विक हिंदुत्व (डीजीएच) सम्मेलन  हिंदू धर्म पर अकादमिक हमला है। यह एक विघटनकारी सम्मेलन है जो हिंदू आंदोलनों को मानवता के लिए खतरे के रूप में निंदा करता है। खुले तौर पर पक्षपाती इस सम्मेलन में कोई हिंदू आवाज या हिंदू दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व नहीं है। यह पुरानी ब्रिटिश “हिंदुओं की अनुमति नहीं है” नीति का एक अभिव्यक्ति है, एक प्रकार का अकादमिक रंगभेद। इसके वक्ता बड़े पैमाने पर भारतीय हैं, जिनमें प्रसिद्ध मार्क्सवादी पत्रकार और प्रचारक सबसे आगे हैं। इसकी राजनीतिक प्रेरणा स्पष्ट है।

‘फर्स्ट पोस्ट’ ने लिखा-डिसमैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व (डीजीएच), अमेरिका में अज्ञात आयोजकों द्वारा नियोजित, एक पक्षपातपूर्ण और राजनीतिक रूप से प्रेरित घटना है। जिसे एक प्राचीन धर्म और उसके अनुयायियों को बदनाम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। कॉलम और रिपोर्ट किए गए टुकड़ों के माध्यम से, यह फ़र्स्टपोस्ट श्रृंखला उजागर करती है कि इस तरह के कार्यक्रम भ्रामक, एजेंडा-चालित, और कुछ भी नहीं बल्कि बहुत कम छिपे हुए हिंदूफोबिया हैं।

ये लोग हैं आयोजकों में

सम्मेलन के आयोजकों में कौन लोग हैं। 21 साल का जियाद अहमद  जिसने कुछ समय पूर्व हिलेरी क्लिंंटन के चुनाव अभियान में अहम भूमिका निभाई और स्टैंड विथ कश्मीर नामके संगठन से पाकिस्तान की लाइन पर युवाओं को लामबंद करता है। भारतविरोधी इतिहासकार ऑड्रे ट्रस्के के समर्थक रटगर विवि के छात्र, जेएनयू की एक्टिविस्ट आयशा किदवई, हिंदू व भाजपा विरोधी मैसाचुसेट्स की प्रोफेसर बानु सुब्रमण्यम,  भंवर मेघवंशी, हिंदू समाज के खिलाफ लिखने  वाले वाम बुद्धिजीवी क्रिस्टोफे जेफरलोट, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की नेता कविता कृष्णन, ब्राह्मणों के खिलाफ ट्वीटर से जहर उगलने वाली मीना कंडास्वामी, दिल्ली के पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन की पत्नी व एक्टिविस्ट नंदिनी सुंदर, द वायर की पत्रकार नेहा दीक्षित आदि। कई वक्ताओं के नामों का आयोजकों ने खुलासा नहीं किया। टस्के मुगल अत्याचारी औरंगजेब को महिमा मंडित करने में लगे हैं और भारतविरोधी दुष्प्रचार का हिस्सा हैं।

इन तिथियों के पीछे का गणित

हिंदूफोबिया इस सम्मेलन की तारीखों के चुनाव से शुरू होता है। 10 सितंबर, सम्मेलन का पहला दिन, गणेश चतुर्थी, हिंदुओं के लिए एक शुभ दिन है। दूसरा दिन, 11 सितंबर है, जब जिहादी आतंकवादियों ने 20 साल पहले वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को ध्वस्त कर दिया था, जिसमें 2,000 से अधिक निर्दोष लोग मारे गए थे। इन तिथियों को चुनकर, आयोजक दोहरे उद्देश्यों को प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं। पहला, हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाना और दूसरा, जिहादी आतंकवाद की यादों को सफेद करना। किसी को यह समझना चाहिए कि तिथियों का चुनाव महज संयोग नहीं है बल्कि सावधानीपूर्वक नियोजित रणनीति का हिस्सा है।

डेविड फ्राले ने लिखायह हिंदू शक्ति के उभार के खिलाफ षड़यंत्र

अमेरिकी विद्वान डेविड फ्राले ने लिखा-इसके अलावा, भारत आज आर्थिक और राजनीतिक रूप से एक राष्ट्र के रूप में उभर रहा है, जो अब विश्व मंच पर अपने हिंदू अतीत का सम्मान करने वाली एक प्रमुख शक्ति है। भाजपा और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के तहत भारत के हाल ही में पुनर्जीवित हिंदू लोकाचार अब हिंदू विरोधी ताकतों का प्राथमिक लक्ष्य बन गए हैं, क्योंकि इससे उनकी शक्ति और प्रभाव को खतरा है।

यूरोपीय वर्चस्ववाद के औपनिवेशिक युग की शुरुआत के बाद से हिंदू धर्म लंबे समय से पश्चिमी शिक्षाविदों के हमले के अधीन रहा है, जिसमें पश्चिमी शिक्षाविदों ने खुले तौर पर मिशनरी गतिविधि, दमनकारी ब्रिटिश शासन और नस्लीय और सांस्कृतिक रूप से हिंदुओं की बदनामी को बढ़ावा दिया। इस औपनिवेशिक अकादमिक हमले को मीडिया के प्रभावों के साथ जोड़ा गया था, जो संयुक्त राज्य और यूनाइटेड किंगडम के प्रमुख समाचार पत्रों और पत्रिकाओं तक फैला हुआ था, और विंस्टन चर्चिल तक के राजनीतिक नेताओं द्वारा प्रतिध्वनित किया गया था।

भारत की स्वतंत्रता के बाद, इस हिंदू विरोधी आंदोलन का नेतृत्व मार्क्सवादियों और कम्युनिस्टों में स्थानांतरित हो गया। उन्होंने मिशनरी और धर्मांतरण बलों के साथ नए गठजोड़ के साथ औपनिवेशिक रूढ़िवादिता को कायम रखना जारी रखा, जिसका वे पहले विरोध करते थे, हिंदुओं को एक आम दुश्मन मानते थे। हिंदू धर्म के मार्क्सवादी दृष्टिकोण की एक अलग शब्दावली है लेकिन इसी तरह हिंदुओं को अंधविश्वासी और पिछड़ा और राजनीतिक रूप से गलत मानता है।

हालाँकि, १८९३ में स्वामी विवेकानंद के बाद से दुनिया भर में भारत की धार्मिक परंपराओं के प्रसार ने हिंदू विरोधी ताकतों के लिए एक नई चुनौती पेश की, योग, वेद, आयुर्वेद और संस्कृत को वैश्विक मान्यता प्राप्त हुई जो आज भी जारी है। इसने उन्हें हिंदू धर्म पर अपने हमले को हिंदू गुरुओं, आश्रमों और योग प्रथाओं पर हमले के साथ जोड़ दिया, उन्हें पंथ के रूप में लेबल किया।

इसकी एक वक्ता मीना कंडासामी ने भी एक लेख में हिंदू धर्म पर हमले किए हैं और भारत में हिंदुओं के अत्याचारों के आरोप लगाए हैं। कंडास्वामी ने बचाव में कई कुतर्क और हास्यास्पद तर्क दिए हैं। उन्होंने लिखा है-इसका उद्देश्य “जेंडर, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, जाति, धर्म, स्वास्थ्य देखभाल और मीडिया में विशेषज्ञता वाले दक्षिण एशिया के विद्वानों को एक साथ लाना है ताकि जटिल और बहुल  को समझने की कोशिश की जा सके।

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