विभिन्न देशों में हिंदी रेडियो प्रोग्राम,गीत-संगीत,फ़िल्मी संगीत के कार्यक्रम तो अब बहुत ही आम बात हो गए हैं |अनेकों देशों में हिंदी में उच्च स्तर का साहित्य सृजन हो रहा है जो कि भारत से किसी तरह कम नहीं है | हिंदी में वेब पत्रिकाएं निकल रही हैं |

महिमा वर्मा

विश्व में तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा हिंदी!!मैं भी उन सत्तर करोड़ लोगों में से एक हूँ जो गर्व से हिंदी बोलते हैं|हमारे लिए यह वो भाषा है जिसमें हम सोचते हैं,सपने देखते हैं,सृजन करते हैं,पढ़ते हैं,लिखते हैं,घर-परिवार,समाज से जुड़े रहते हैं|यही भाषा भावों और विचारों की संवाहक होती है,दिल से जब रेशमी भाव बह कर कुछ अनकहा कहने की कोशिश करते हैं तब इसी भाषा का संबल मिलता है|और जब यही भाषा अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी सराही जाए तो मन गर्व और खुशी से भर उठता है|सन 1977 में अटल बिहारी बाजपेयी द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में दिया भाषण याद करिए वह क्षण हर हिंदी भाषी के दिलों में जीवित है|हिंदी भाषा का स्वरुप आज काफी व्यापक हो चला है|सभी क्षेत्रों में इसकी पहुँच साहित्य,कला,फ़िल्में,विज्ञापन,संचार,संस्कृति या वैश्विक बाज़ार तक हो गयी है|आज किसी भी चीज का स्वरुप वैश्विक होने में देर नहीं लगती अतः हिंदी भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जानी पहचानी जाने लगी है|

भाषा में सहजता है

भाषा और संस्कृति दो नैसर्गिक सरिताएँ हैं जो जहाँ रास्ता मिले एक नए रूप में बहते चले जाते हैं और नए नए क्षेत्रों में बसते चले जाते हैं|कुछ उसी रूप में,कुछ बदलते परिवेश में ढलते हुए रूप परिवर्तन करते हुए|भाषा का स्वरुप देश, काल, स्थान,  परिवेश के अनुसार निरंतर परिवर्तित होता रहता है|इसीलिये हर भाषा,उसके हर रूप को सम्मान से स्वीकार करना चाहिए|भाषा में जितनी सहजता और लचीलापन रखेंगे अन्य भाषा-भाषी भी उस भाषा को सहजता से अपनाएंगे|भाषा संस्कृति का एक अभिन्न अंग हैं|हमारा भोजन,गायन,नृत्य,लोक –कला,साहित्य,कला,फ़िल्में भाषा को एक वैश्विक पहुँच देने में सहायक हैं|आज ‘करी’ विश्व भर में भारतीय भोजन की परिचायक बन चुकी है|भारतीय फिल्मों का जादू  पूरी दुनिया के सर चढ़ कर बोलता है और गीत पूरी दुनिया में गुनगुनाये जाते हैं|परिधानों के जलवे भी कम नहीं हैं|हिंदी सीखने बोलने सुनने वालों की संख्या बढ़ रही है जो कि एक बहुत अच्छा संकेत है|भले ही इसका कारण भौगोलिक सीमाओं का आसानी से पार करने की सुविधाओं का बढ़ना रहा हो|विभिन्न देशों में हिंदी रेडियो प्रोग्राम,गीत-संगीत,फ़िल्मी संगीत के कार्यक्रम तो अब बहुत ही आम बात हो गए हैं|अनेकों देशों में हिंदी में उच्च स्तर का साहित्य सृजन हो रहा है जो कि भारत से किसी तरह कम नहीं है| हिंदी में वेब पत्रिकाएं निकल रही हैं|डिजिटल सुविधाओं ने भारत एवं विदेश के साहित्य साधकों को साझा पटल प्रदान कर साहित्य साधना को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाने की राह प्रदान की है|हिंदी की उपस्थिति विभिन्न देशों  में मौजूद होने का एक बहुत बड़ा श्रेय प्रवासी भारतीयों को भी जाता है जो अपने साथ अपनी भाषा और संस्कृति साथ लेकर गए|नए देश को अपनाया,वहां की भाषा, संस्कृति और परिवेश को अपने में समाहित किया,सामाजिक, आर्थिक विकास में सम्पूर्ण हिस्सेदारी निभायी किन्तु साथ-साथ नयी पीढ़ी को भी अपनी भाषा-संस्कृति से अपरिचित नहीं रखा|उस देश में रहकर भी हिंदी को जिन्दा ही नहीं रखा बल्कि उसके प्रसार के लिए अनेकों प्रयास किये|ये प्रयास साहित्य,गीत-संगीत,मनोरंजन आदि विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े रहे पर मंजिल सबकी एक ही रही|अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हिंदी का प्रचार-प्रसार और मान- सम्मान|और वे सफलता की ओर बढ़ते प्रतीत भी हो रहे हैं|

अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हिंदी का सम्मान

भाषा अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी पहुंचे उसके लिए तकनीक तो बहुत मददगार रही ही है किन्तु नए शब्दों को अपनी भाषा में समाहित करना,स्थान एवं परिवेश के अनुसार लचीलापन रखना बहुत आवश्यक है|इतिहास गवाह है जहाँ जंजीरों को ज्यादा कस कर कर बाँधा वो भाव आगे बह कर नहीं जा पाया|हम हमारी भाषा को दिलो-जान से प्यार करें परन्तु अन्य भाषाओँ का भी वैसा ही सम्मान करें|

हिंदी हमको जान से प्यारी है पर पूर्ण सहिष्णुता के साथ अन्य भाषाओँ को पूरा आदर करते हुए,नए युग के साथ चलते हुए,रास्ते में मिलने वाले कुछ नए शब्दों को ग्रहण करते हुए,साथ साथ नई भाषाएँ सीखने की मन में इच्छा रखते हुए हिंदी को आगे बढ़ते हुए देखेंगे|और आज अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हिंदी भाषा की प्रतिष्ठा  देख कर और भी गर्व और सम्मान का भाव मन में आता है|ऐसे ही सबके प्रयासों से हिंदी भाषा देश विदेश में अपने सम्पूर्ण गौरव गरिमा से अपनी उपस्थिति बनाये रहे|भाषा-संस्कृति की यह सरिता निर्बाध बहती रहे|क्योंकि हममें हिंदी है,हिंदी से हम हैं|

पास पड़ोस और दूर-दराज़ की

इतनी आवाजों का बूँद-बूँद अर्क

कि मैं जब भी इसे बोलता हूँ

तो कहीं गहरे

अरबी तुर्की बांग्ला तेलुगु

यहाँ तक कि एक पत्ती के

हिलने की आवाज़ भी

सब बोलता हूँ ज़रा-ज़रा

जब बोलता हूँ हिंदी

(मेरी भाषा के लोग – केदारनाथ सिंह)
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