राजेश बादल।।

भारतीय संसद का नया टेलिविजन चैनल शुरू हो चुका है। करीब एक दशक तक ‘राज्यसभा टीवी‘ और डेढ़ दशक तक ‘लोकसभा टीवी‘ पर लगभग एक हजार करोड़ रुपये खर्च करने के बाद उन्हें ‘स्वर्ग की सीढ़ी’ दिखा दी गई। अब ‘संसद टीवी‘ ने कोरी स्लेट पर इबारत लिखनी शुरू कर दी है। इन दोनों चैनलों के रहते भारत उन-गिने चुने देशों में शुमार था, जिसके दोनों सदनों के अपने चैनल थे।

सिफर से किसी भी नए काम की शुरुआत आसान नहीं होती। नए चैनल के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती है। इस चैनल को पूर्व के दोनों चैनलों से बड़ी लकीर खींचनी होगी। यह नामुमकिन तो नहीं, पर बेहद कठिन जरूर है। अपने अनुभव से कह सकता हूं कि संसद में फाइलों के जंगल और कायदे कानूनों के जाल से निकलकर चैनल को दौड़ाना अत्यंत टेढ़ी खीर है। चैनल के नियंताओं को यकीनन इसका अंदाजा होना चाहिए। शायद इसलिए उन्होंने ‘कब्र में दफन‘ हो चुके चैनलों की खाक को माथे से लगाना शुरू कर दिया है।

अपनी बात स्पष्ट करता हूं। आप लोगों ने नई बोतल में पुरानी शराब वाली कहावत अवश्य सुनी होगी। ‘संसद टीवी‘ के यूट्यूब तथा अन्य डिजिटल अवतारों पर दोनों ‘स्वर्गीय चैनलों‘ के कार्यक्रमों की कुल दर्शक तथा सबस्क्राइबर्स की संख्या भी ‘संसद टीवी‘ में जोड़ दी गई है। यानी जो चैनल अलग लाइसेंस के साथ अवतरित हुए थे, वे अब मर चुके हैं, मगर उनके कार्यक्रम ‘संसद टीवी‘ के खाते में धड़क रहे हैं।

जो चैनल आज पैदा हुआ है, उसके कार्यक्रम पुराने चैनलों के लिए बनाए गए हैं तो उन चैनलों के लाइक्स, दर्शक संख्या और सबस्क्राइबर्स की संख्या का कोई नया चैनल कैसे इस्तेमाल कर सकता है? मान लिया जाए कि वे कार्यक्रम संसद के ‘मृत चैनलों‘ की संपत्ति हैं तो 2021 में जन्म लेने वाला चैनल अपने खाते में 2010 से 2020 तक के कार्यक्रमों की लाइक्स, टिप्पणियां और सबस्क्राइबर्स की संख्या कैसे जोड़ सकता है? कोई निजी प्रसारण कंपनी ऐसा करती तो शायद उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो जाती। लेकिन चूंकि मामला संसद का है तो बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे?

तनिक सख्त भाषा का इस्तेमाल करना चाहूं तो कह सकता हूं कि यह दर्शकों के साथ कंटेंट की धोखाधड़ी से अलग मामला नहीं है। बेहतर होता कि ‘संसद टीवी‘ का आलाकमान अपनी कमाई हुई पूंजी से यश पाने की कोशिश करता। उधार का सिंदूर उसकी प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाएगा। आज दर्शक इतने अक्लमंद हैं कि वे समझते हैं कि जो कार्यक्रम उन्हें परोसे जा रहे हैं, वे साल भर से लेकर दस साल तक पुराने हैं और अगर वही पुराने कार्यक्रम दिखाने इतने जरूरी हैं तो फिर ‘संसद टीवी‘ की जरूरत ही क्या थी? संसद के इस भव्य और गरिमापूर्ण नए नवेले चैनल से यह उम्मीद तो नहीं ही थी।

यह ठीक वैसा ही है कि एक अखबार चलाने वाली कंपनी पुराना अखबार बंद कर दे और जब नया टाइटल लेकर नया समाचारपत्र प्रारंभ करे तो पुराने अखबार के साल भी उसमें जोड़ दे। वैसे जानकारी के लिए बता दूं कि आजकल दर्शक बढ़ाने, लाइक्स और सबस्काइबर्स बढ़ाने का उद्योग भी खूब फल-फूल रहा है। अभी इस कारोबार पर लगाम लगाने की भी जरूरत है। क्या इस तरफ कोई ध्यान देगा मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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